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कितनी कठपुतलियाँ

भीटा में अम्बेडकरवादियों का पुस्तकों से स्वागत !

भीलवाड़ा जिले की रायपुर पंचायत समिति की  भीटा ग्राम पंचायत के ग्राम सरेवड़ी ,भटेवर ,थोरिया खेड़ा,   भीलो का खेड़ा,  रूपा का खेड़ा,  दलित आदिवासी साथियों की मीटिंग बाबा रामदेव मंदिर में  न्यू अंबेडकर युवा संगठन ब्लॉक रायपुर रखी गई . बैठक

जातिवाद जिंदा है बस तरीका बदला है।

( रिछपाल 'विद्रोही' ) सामंतवाद को सियासत आज भी शह देती है। कितनी कठपुतलियाँ पढ़ी ,उसकी संक्षिप्त समीक्षा लिखते हुये कुछ ये विचार दिमाग में आये .भले ही 21वीं सदी का दौर चल रहा होगा मगर आज भी सबके सब कठपुतलियां है.कोई सियासत की,कोई

इस उपन्यास पर फिल्म बननी चाहिए

भंवर मेघवंशी का हाल ही में प्रकशित हुआ उपन्यास "कितनी कठपुतलियां" अपने आपमें एक मिसाल है, जिसमें उन्होंने जीती जागती घटनाओ का बखूबी चित्रण किया है. जिसे अपनी  नज़रों से देखा और महसूस किया। यह उपन्यास सामाजिक कार्यकर्ता और रंगकर्मी शंकर

यह कठपुतलियों के बोलने का समय है।

(डाॅ. रेणु व्यास )‘ये दुनिया है रंगमंच, हम हैं इसकी कठपुतलियाँ’ अगर इतना सा ही सच होता तो दुनिया-भर में कुछ ताक़तवर कठपुतलियाँ बाकी सभी को अपने इशारों पर न नचातीं। यानी शेक्सपियर को कहना चाहिए था - ये दुनिया अगर ‘रंगमंच’ है तो कुछ नचाने

अपनी ही मिट्टी के लाल से परिचित करवाता है यह उपन्यास

( डॉ. गोविंद मेघवंशी ) सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक भंवर  मेघवंशी ने द्वारा लिखित कितनी कठपुतलियां उपन्यास इन दिनों पढ़ने का अवसर मिला . इसे लिखकर लेखक ने हमें शंकर सिंह जैसे ज़मीन से जुड़े एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता से अपरिचित होने से

चार दशक के अदम्य संघर्ष की कहानी है “कितनी कठपुतलियाँ”

( एस आर मेहरा ) “कितनी कठपुतलियाँ"में कठपुतलियाँ भले ही अनगिनत हों पर नायक शंकर सिंह जैसा वास्तविक और संघर्ष करने वाला हो और लेखक भंवर मेघवंशी जैसा बेबाक,निर्भिक,स्वतंत्र और जमीनीं स्तर का संजीदगी से भरा हो तो इन्हीं अनगिनत