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कला एवम् साहित्य

दलित आक्रोश की भीममय भावाभिव्यक्ति हैं ‘सुलगते शब्द’

( मोहनलाल सोनल 'मनहंस' ) 65 साहित्यकारों की तकरीबन 156 कविताओं का 280 पृष्ठीय बहुत ही चेतनादायी काव्य संकलन है संपादक 'श्याम निर्मोही' संकलित 'सुलगते शब्द' जो पाठक मन में आक्रोश की अगन भरते हुए दलित समाज के साथ अतीत से होते आये जुल्म के

नहीं रहे टंकण और भाषा के उस्ताद सुभाष जी

 ( संजय जोशी )नवारुण को विस्तार देने के क्रम में जब 2018  में एक नये टाइपिस्ट की खोज चल रही थी तब बनास जन जे संपादक और मित्र पल्लव ने किन्ही सुभाष जी का नाम बहुत जोर देकर सुझाया.फिर राजीव कुमार पाल की किताब 'एका' से सुभाष जी से जो रिश्ता

साहित्य से ही अभिनय में बौद्धिक पूर्णता संभव – अनूप त्रिवेदी

हिन्दू कालेज में 'जेनिथ 2021' के अंतर्गत व्याख्यान  ( श्रेया राज ) नई दिल्ली। 'साहित्य एक अभिनेता को बौद्धिक रूप से पूर्ण विकसित करता है। एक अभिनेता को वास्तविक कलाकार बनाने में साहित्य की अहम भूमिका

रमेश उपाध्याय हत्याकाण्ड की कथा

( शम्सुल  इस्लाम  ) मेरे हमज़ुल्फ़ (साढ़ू) और प्यारे साथी रमेश उपाध्याय ! क्षमा करना की मैं आपकी हत्या का मूक-दर्शक बना रहा .डॉ. रमेश उपाध्याय, महानतम जनवादी लेखकों में से एक, विचारक, हरदिल-अज़ीज उस्ताद, संपादक, जनसंघर्षों में पहली

सुलगते शब्द पर एक समीक्षात्मक नजर

( बीकानेर के युवा साहित्यकार श्याम निर्मोही के संपादन में हाल ही में सिद्धार्थ बुक्स गौतम बुक सेंटर दिल्ली से प्रकाशित कृति *सुलगते शब्द (दलित काव्य संकलन) पूरे भारतवर्ष में परचम लहरा रही है । भारत के विभिन्न क्षेत्रों से साहित्यकारों ने

नाटक की सार्थकता उसके पढ़े जाने में नहीं, उसके देखे जाने में : असग़र वजाहत

(प्रो. असग़र वजाहत) हिन्दू कालेज में वेबिनार - दिल्ली। नाटक पढ़ने की चीज नहीं है, वह देखे जाने की चीज है। नाटक की सार्थकता उसके मंचन किये जाने में होती है। नाटक में निहित अथाह संभावनाओं के कारण इसमें लोगों की रुचि बनी रहती है, क्योंकि

राष्ट्रीय युवा दिवस पर मेरी स्वरचित कविता ” 21 वीं सदी का युवा ” पढ़िए !

( राजमल रेगर ) "21 वी सदी का युवा "  में 21वी सदी का युवा देख रहा हूँ, सामाजिक कार्यकर्ताओं के जेलों मेंभरे जाने पर इनकी चुप्पी देख रहा हूँ, में इनका  घूट - घूट कर जीना देख रहा हूँहाँ मैं 21 वी सदी का युवा  देख रहा हूँ |सत्ता की

आरएसएस से एक दलित स्वयंसेवक के मोहभंग की कहानी है -“ व्यामोह “

(भंवर मेघवंशी)मेरी कुल उम्र ( 47 वर्ष ) जितना समय आरएसएस में गुज़ारने वाले दलित स्वयंसेवक मूलचंद राणा ने न केवल संघ का परित्याग कर दिया , बल्कि ‘व्यामोह’ नाम से आत्मकथा लिखकर संघ से मोह , व्यामोह और मोहभंग की पूरी कहानी बयान की है .एक

ज्ञान के लिए पुस्तकों से बेहतर कोई विकल्प नहीं : पंकज चतुर्वेदी

( प्रखर दीक्षित )हिन्दू कालेज में 'राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह' के अंतर्गत 'किताब की जरूरत' विषय पर वेबिनार नई दिल्ली। 'डिजिटल माध्यम के इस दौर में जबकि हर व्यक्ति अपने हिसाब से किसी भी बात को कह सकता है, हमारे आसपास अनावश्यक एवं झूठी सूचनाएं
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