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कला एवम् साहित्य

नाटक की सार्थकता उसके पढ़े जाने में नहीं, उसके देखे जाने में : असग़र वजाहत

(प्रो. असग़र वजाहत) हिन्दू कालेज में वेबिनार - दिल्ली। नाटक पढ़ने की चीज नहीं है, वह देखे जाने की चीज है। नाटक की सार्थकता उसके मंचन किये जाने में होती है। नाटक में निहित अथाह संभावनाओं के कारण इसमें लोगों की रुचि बनी रहती है, क्योंकि

राष्ट्रीय युवा दिवस पर मेरी स्वरचित कविता ” 21 वीं सदी का युवा ” पढ़िए !

( राजमल रेगर ) "21 वी सदी का युवा "  में 21वी सदी का युवा देख रहा हूँ, सामाजिक कार्यकर्ताओं के जेलों मेंभरे जाने पर इनकी चुप्पी देख रहा हूँ, में इनका  घूट - घूट कर जीना देख रहा हूँहाँ मैं 21 वी सदी का युवा  देख रहा हूँ |सत्ता की

आरएसएस से एक दलित स्वयंसेवक के मोहभंग की कहानी है -“ व्यामोह “

(भंवर मेघवंशी)मेरी कुल उम्र ( 47 वर्ष ) जितना समय आरएसएस में गुज़ारने वाले दलित स्वयंसेवक मूलचंद राणा ने न केवल संघ का परित्याग कर दिया , बल्कि ‘व्यामोह’ नाम से आत्मकथा लिखकर संघ से मोह , व्यामोह और मोहभंग की पूरी कहानी बयान की है .एक

ज्ञान के लिए पुस्तकों से बेहतर कोई विकल्प नहीं : पंकज चतुर्वेदी

( प्रखर दीक्षित )हिन्दू कालेज में 'राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह' के अंतर्गत 'किताब की जरूरत' विषय पर वेबिनार नई दिल्ली। 'डिजिटल माध्यम के इस दौर में जबकि हर व्यक्ति अपने हिसाब से किसी भी बात को कह सकता है, हमारे आसपास अनावश्यक एवं झूठी सूचनाएं

जातिवाद जिंदा है बस तरीका बदला है।

( रिछपाल 'विद्रोही' ) सामंतवाद को सियासत आज भी शह देती है। कितनी कठपुतलियाँ पढ़ी ,उसकी संक्षिप्त समीक्षा लिखते हुये कुछ ये विचार दिमाग में आये .भले ही 21वीं सदी का दौर चल रहा होगा मगर आज भी सबके सब कठपुतलियां है.कोई सियासत की,कोई

आधुनिक युग बहुजन लेखिका मुक्ता साल्वे !

( पवन बौद्ध )भारतीय संस्कृति में साहित्य सर्जन एवं शिक्षा का मौलिक अधिकार सभी वर्ग के महिला पुरुषों को है परंतु आजादी से पूर्व बहुजन, पिछड़ों, शोषित, वंचितओं को शिक्षा के अधिकार से पीढ़ियों दर पीढ़ी तक वंचित रखा गया।  महिला वर्ग के लिए

हमारे समय की एक उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण आत्मकथा

( ‘मैं एक कारसेवक था’ पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की टिप्पणी ) मैं एक कारसेवक था- भंवर मेघवंशी की सिर्फ आत्मकथा नहीं है, हमारे समय का एक बेहद महत्वूर्ण दस्वावेज भी है। हमारे यहां, खासतौर पर हिन्दी में लिखी आत्मकथाओं में बहुतेरे लोग

भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर करारा प्रहार करती है पुस्तक “कब तक मारे जाओगे”

( डॉ. प्रवीन कुमार )पुस्तक 'कब तक मारे जाओगे' युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि द्वारा सम्पादित दूसरा काव्य संग्रह है। इससे पूर्व वे "व्यवस्था पर चोट" नामक एक अन्य काव्य संग्रह भी सम्पादित कर चुके हैं। नरेंद्र वाल्मीकि को मैं लगभग पिछले पंद्रह

वाल्मीकीकरण बनाम हिन्दूकरण

पंजाब हरियाणा क्षेत्रों में चुहड़ा जाति के लोग बालाशाह एवं लालबेग को अपना धर्म गुरु मानते थे। ये मांसाहारी थे। राम तथा कृष्ण की पूजा नहीं करते थे। गोमांस एवं सूअर मांस खाते थे ये लोग सूअर और बकरे की बलि देते थे। मुर्दों को बगली कब्र