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कला एवम् साहित्य

आधुनिक युग बहुजन लेखिका मुक्ता साल्वे !

( पवन बौद्ध )भारतीय संस्कृति में साहित्य सर्जन एवं शिक्षा का मौलिक अधिकार सभी वर्ग के महिला पुरुषों को है परंतु आजादी से पूर्व बहुजन, पिछड़ों, शोषित, वंचितओं को शिक्षा के अधिकार से पीढ़ियों दर पीढ़ी तक वंचित रखा गया।  महिला वर्ग के लिए

हमारे समय की एक उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण आत्मकथा

( ‘मैं एक कारसेवक था’ पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की टिप्पणी ) मैं एक कारसेवक था- भंवर मेघवंशी की सिर्फ आत्मकथा नहीं है, हमारे समय का एक बेहद महत्वूर्ण दस्वावेज भी है। हमारे यहां, खासतौर पर हिन्दी में लिखी आत्मकथाओं में बहुतेरे लोग

भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर करारा प्रहार करती है पुस्तक “कब तक मारे जाओगे”

( डॉ. प्रवीन कुमार )पुस्तक 'कब तक मारे जाओगे' युवा कवि नरेंद्र वाल्मीकि द्वारा सम्पादित दूसरा काव्य संग्रह है। इससे पूर्व वे "व्यवस्था पर चोट" नामक एक अन्य काव्य संग्रह भी सम्पादित कर चुके हैं। नरेंद्र वाल्मीकि को मैं लगभग पिछले पंद्रह

वाल्मीकीकरण बनाम हिन्दूकरण

पंजाब हरियाणा क्षेत्रों में चुहड़ा जाति के लोग बालाशाह एवं लालबेग को अपना धर्म गुरु मानते थे। ये मांसाहारी थे। राम तथा कृष्ण की पूजा नहीं करते थे। गोमांस एवं सूअर मांस खाते थे ये लोग सूअर और बकरे की बलि देते थे। मुर्दों को बगली कब्र

दलित आत्मकथाओं से झाँकती देहाती दुनिया

( डॉ. माणिक )समाज के किसी भी वर्ग का आँकलन करने और उससे जुड़ी सही समझ विकसित करने हेतु संबद्ध वर्ग के विभिन्न पक्षों को बहुत गहराई और बारीकी से पढ़ना ज़रूरी होता है। वर्ग विशिष्ट से जुड़े रचनाकारों का सृजनात्मक साहित्य भी इसमें प्रमुख रूप

संघर्ष, संगठन और संभावना की किताब – कितनी कठपुतलियाँ

( विनीत अग्रवाल ) प्रस्तावना -कल बहुत दिनों के बाद ऐसा एक घटनाओं से भरा दिन आया था. परसो ही डाक से पीली पर्ची मिल गयी थी. सिर्फ लिखा था की कोई पोस्ट हैं जिसे लेने के लिए डाकघर जाना हैं. बाकी कौन सी डाक हैं, ये पूरा सस्पेंस था. हालांकि

माणिक को मिली पीएचडी की उपाधि

27 अक्टूबर 2020 । मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के हिंदी विभाग के शोधार्थी माणिक की चौदह अक्टूबर को विद्या वाचस्पति की उपाधि हेतु मौखिकी सम्पन्न हुई। 'हिंदी की दलित आत्मकथाओं में चित्रित सामाजिक मूल्य' विषय पर बीते साढ़े चार साल

सबसे बड़े दलित साहित्यकार तो रवींद्रनाथ टैगोर है !

( पलाश विश्वास )दुनिया के सबसे बड़े दलित साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर जो जन्म से अछूत पिराली ब्राह्मण थे और इसी अस्पृष्यता के दंश से बचने उनका परिवार कोलकाता चला आया। प्रिंस द्वारका नाथ ठाकुर के लन्दन शेयर बाज़ार में स्टॉक और टैगोर

‘कितनी कठपुतलियां’ लिखकर स्व. प्रभाष जोशी के स्वप्न को पूरा करने की कोशिश की- मेघवंशी

देसूरी ( प्रमोद पाल सिंह ) चर्चित पुस्तक 'कितनी कठपुतलियां' के लेखक एवं बहुजन चिंतक भंवर मेघवंशी ने देसूरी पहुंचने पर कहा कि किताबों के काले शब्द क्रांति,व्यवस्था एवं परिवर्तन के वो हथियार हैं जो कभी असफल नही होते। किताबों ने हमें अपने

इस उपन्यास पर फिल्म बननी चाहिए

भंवर मेघवंशी का हाल ही में प्रकशित हुआ उपन्यास "कितनी कठपुतलियां" अपने आपमें एक मिसाल है, जिसमें उन्होंने जीती जागती घटनाओ का बखूबी चित्रण किया है. जिसे अपनी  नज़रों से देखा और महसूस किया। यह उपन्यास सामाजिक कार्यकर्ता और रंगकर्मी शंकर