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इसमें इंसाफ़ किधर है ?

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( भंवर मेघवंशी ). प्रसिद्ध मानव अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार जी ने उत्पीड़ित समुदायों के लिए अनथक लड़ाई लड़ी है. वे दन्तेवाड़ा जिले में अपने आदिवासी चेतना आश्रम के ज़रिये आदिवासियों पर अन्याय अत्याचार के मामले दशकों से पुरज़ोर तरीक़े से उठाते रहे हैं, उनका तरीक़ा सदैव अहिंसात्मक रहा है,उन्हें गांधीवादी कार्यकर्ता के रूप में भी जाना पहचाना जाता है,वे तीखे सवाल पूछने के लिए मशहूर रहे हैं और उन्होंने कईं सत्ताओं को अपने प्रश्नों और आंदोलनों की वजह से असहज किया है.वे सत्ता की आँख की किरकिरी रहे हैं, अहिंसात्मक सत्याग्रहों और गांधी विचार के कारण सशस्त्र विद्रोहियों के भी निशाने पर रहे , स्थानीय प्रशासन, मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों का नेक्सस भी उनके ख़िलाफ़ रहा है, वे हर समय ख़तरे की ज़द में रहकर भी काम करते रहे, उन्होंने अन्यायपूर्ण उत्खनन, आदिवासियों के उत्पीड़न और जल जंगल ज़मीन जैसे कुदरती संसाधनों को बचाने के लिए हर जगह लौहा लिया.
हम जानते हैं कि हिंसा प्रभावित क्षेत्रों के निवासी पुलिस, सुरक्षा बलों और सशस्त्र विद्रोहियों के बीच बुरी तरह से पिस जाते हैं, सुरक्षा एजेंसियाँ उनको हिंसक आंदोलनों का समर्थक मान कर भून देते हैं और सशस्त्र दस्ते उनको सरकारी मुखबिर समझ कर मार डालते हैं, हज़ारों लोग अचानक ग़ायब हो जाते हैं, मारे जाते हैं, स्त्रियों पर यौन हमले होते हैं, बच्चों का बचपन छिन जाता हैं, ज़िंदगी तहस नहस हो जाती है, उनकी कहीं भी कोई सुनवाई नहीं होती,इन बेबस, बेसहारा लोगों की आवाज़ को जो भी मुखरित करते हैं, वे भी टार्गेट पर आ जाते हैं, उनका जीवन हर पल मौत के साये में बीतता है. आम तौर पर कोई भी व्यक्ति इतने जोखिम भरे इलाक़े और मुद्दों पर काम नहीं करना चाहता है, लेकिन हिमांशु कुमार जी जैसे जुनूनी लोग भी होते हैं जो सपरिवार जा बसते हैं सुदूर दुर्गम अरण्य में और संगीनों के साये और फ़ौजी बूटों के बीच अमन की बातें करने लगते हैं, जंगल, जंगल के पहरुओं और आदिवासियत को बचाने का प्रयास करते रहते हैं, इनके पीछे बड़े कारपोरेट भी पड़ जाते हैं क्योंकि उनकी खानें और अन्य परियोजनाएँ ऐसे ही कार्यकर्ताओं के प्रतिरोध के चलते नहीं चल पाती है.
कुल मिलाकर कर सामाजिक कार्य में रत लोगों को यही पता नहीं चल पाता हैं कि इस व्यवस्था में कौन कौन उसके ख़िलाफ़ खड़ा है, वह तो न्याय के लिए हर दरवाज़ा खटखटा रहा होता है, भले ही इंसाफ़ मिले या नहीं, सतत संघर्ष जारी रहता है.हिमांशु कुमार जी ने भी न्याय की लड़ाई लड़ी और लड़ते ही रहे, वे भी कारपोरेट, प्रशासन, पुलिस, सुरक्षा बलों और बिके मीडिया की आँख की किरकिरी बन गए, फिर भाजपाई मुख्यमंत्री रमन सिंह की छत्तीसगढ़ सरकार ने उनके आश्रम पर बुलडोज़र चला दिया, आश्रम ज़मींदोज़ कर दिया गया और उन पर अनगिनत मुक़दमे और जाँचें बिठाई गई, प्रदेश बदर किया गया, हिमांशु कुमार जी फिर भी डरे नहीं, उन्होंने साइकिल उठाई और निकल पड़े देश को बताने अपने साथ और आदिवासी जनों के साथ हो रहे अन्याय के बारे में बताने.
वे अपनी व्यथा का विलाप नहीं कर रहे थे, वे इस अन्यायकारी व्यवस्था के चरित्र का पर्दाफ़ाश करने में लगे रहे और तमाम उत्पीड़ित जमातों के लिए बोलते, लिखते रहे और मोर्चे पर जूझते रहे, उन्होंने कश्मीर से लेकर ठेठ दक्षिण तक के मुद्दों पर अपनी बात मुखरता से रखी, हर जुल्म के ख़िलाफ़ उनकी ज़बान और कलम चली, वे चंद्र शेखर आज़ाद की रिहाई के लिए साइकिल लेकर यात्रा पर निकल पड़े थे, वे सांप्रदायिक गुण्डों द्वारा की गई मॉब लिंचिंग के विरुद्ध पीड़ितों से मिलते रहे, जातीय हिंसा के पीड़ितों के मध्य गए, उनका आश्रम उजड़ गया था, काम नहीं था तो कैफ़े खोल लिया और बोलते लिखते और सफ़र करते रहे, छत्तीसगढ़ से भगाया तो हिमाचल के पहाड़ों पर जा चढ़े, वहाँ दिक़्क़त हुई तो गोवा के गांधी आश्रम में सक्रिय हो गये, भूपेश बघेल की सरकार आई तो वे दन्तेवाड़ा वापस पहुँचे और अपनी ज़मीन और अपने लोगों के मध्य वापस जा टिके, लेकिन हर सत्ता का चरित्र एक सा ही होता है, कोई भी सरकार सवाल पसंद नहीं करती, प्रश्न बग़ावत माने जाने लगते हैं, यही हिमांशु कुमार जी के साथ होने लगा.
बढ़ती उम्र, न्यायिक कार्यवाहियाँ, अदालतों के चक्कर और आदिवासियों की सघन होती पीड़ाओं के बरक्स उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, वे ब्रेन हेमरज के शिकार हुये और काफ़ी मुश्किल स्थिति तक पहुँच कर ज़िंदगी की जंग जीत कर वापस लोगों के बीच आ गए.उनका एक सपना रहा कि वापस अपने आश्रम का ईंट गारा जोड़ दूँ और एक ढाँचा तैयार करके अपने आदिवासी भाई बहनों के बीच जा बसूँ !
पर आज तेरह साल पुराने मामले में अदालत का एक फ़ैसला आया है, इंसाफ़ माँग रहे हिमांशु कुमार जी ही नहीं बल्कि हर न्याय के आकांक्षी व्यक्ति के लिए यह सदमा है कि इस फ़ैसले से इंसाफ़ मिलने के बजाय और नाइंसाफ़ी ही हो गई है, उच्चतम न्यायालय ने उनके ख़िलाफ़ जाँच और पाँच लाख का जुर्माना अधिरोपित कर दिया है, हिमांशु कुमार जी ने कहा है कि उनके पास जुर्माना चुकाने के लिए पाँच लाख तो क्या पाँच हज़ार रुपए भी नहीं है, वे सिविल नाफ़रमानी करेंगे और ज़ेल जाने को तैयार है, इस ढलती उम्र, गिरते स्वास्थ्य, ख़स्ता माली हालत के बावजूद उन्होंने अन्याय के विरुद्ध माथा झुकाने के बजाय अपना संघर्ष जारी रखने का एलान करके हम सबकी सोयी चेतना को ललकारा है और जगाने का प्रयास किया है.
एक व्यक्ति जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी लोगों के लिए लगाई और लोगों की लड़ाइयाँ लड़ी, वह अपनी लड़ाई अकेले लड़े,तब तो ठीक बात नहीं होगी, यह हम सबकी साझी लड़ाई है, हम सबको हिमांशु कुमार जी के साथ इस मौक़े पर खड़े होना होगा, हम खड़े होंगे और इंसाफ़ की लड़ाई को जारी रखेंगे, कोई भी दमनकारी सत्ता और उसकी जेलें हमारे हौंसले को तोड़ नहीं सकती, हम लड़ेंगे और जीतेंगे

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