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कोई हिंदुत्व की बात करे तो आप बंधुत्व की बात कीजिये

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– भंवर मेघवंशी 
( 19-20 नवंबर 2022 को हैदराबाद में आयोजित हुई भारत बचाओ कान्फ्रेंस में रखे गये विचार का सार संक्षेप )
मंच पर मौजूद महानुभावों और सभागार में उपस्थित साथियों ,सबसे पहले मैं तेलगु भाषा में नहीं बोल पाने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.मुझे तेलगु न बोलनी आती है और न ही समझ में,इसलिए अपनी बात हिंदी में रखूँगा.
आज के इस सत्र का विषय सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण पर बात करने के सम्बंध में हैं,कुछ महत्वपूर्ण बातें मुझे ज़रूरी लग रही है,वो मैं कहना चाहूँगा.आप मेरी बातों से असहमत हो सकते हैं और अपनी असहमति दर्ज भी करवा सकते हैं, मुझे आपका अलहदा विचार जानकार ख़ुशी होगी.
निसंदेह देश में नफ़रत बहुत बढ़ गई है.इन दिनों सत्ता प्रतिष्ठान, एजेंडाबाज़ मीडिया और  कट्टरपंथी वैचारिक समूह नफ़रत फैलाने के काम में लगे हुए हैं.जाति,धर्म,वर्ग,वर्ण,संप्रदाय,भाषा,प्रांत न जाने किस किस के आधार पर नफ़रत फैलाई जा रही है.सब तरह नफ़रत ही नफ़रत नज़र आने लगी है,पर इसका मुक़ाबला जवाबी नफ़रत से नहीं किया जा सकता है.नफ़रत को नफ़रत ख़त्म नहीं कर सकती है .इसके लिए मोहब्बत ज़रूरी है.
हमें हर प्रकार की कट्टरता को नकारना होगा.जो भी व्यक्ति,समूह, संगठन,दल घृणा और कट्टरता के विचार से संचालित है,उन सबको सिरे से नकारना है.एक क़िस्म की कट्टरता की गोदी में बैठकर दूसरे तरह की कट्टरता को कोसना खुद को धोखा देना है,इस हिप्पोक्रेसी से बचना ज़रूरी है.
हमें सेक़ुलर राष्ट्र चाहिये,न हिंदू राष्ट्र,न मुस्लिम राष्ट्र,न जैन राष्ट्र, न बौद्ध राष्ट्र और न सिख राष्ट्र,हमें थियोक्रेटिक स्टेट के विचार को अस्वीकृत करना होगा.हमें संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रति अपनी पक्षधरता मज़बूती से प्रकट करनी होगी,तभी देश का सेक़ुलर चरित्र बचेगा.
जो लोग सद्भाव के लिए प्रयासरत है,उनकी भाषा में इतनी नफ़रत क्यों है ? क्या हम जिनसे लड़ रहे हैं, उनके जैसे होना ज़रूरी है ? क्या हमको भी नफ़रत सनी ज़बानों में चीख़ना चिल्लाना चाहिये. हम प्रेम स्थापित करना चाहते हैं तो हमको अपनी भाषा में सद्भाव और करुणा लानी होगी, हमारी भाषा और बोली में उपस्थित हिंसा को निकाल बाहर करना होगा.
हमारी ज़बान धार्मिक सद्भाव की ज़बान नहीं है.ज़हर उगलती हुई ज़बानों ने कहीं भी लोगों को जोड़ा नहीं, तोड़ा ही है,हमें विभाजक नहीं बनना हैं,हमें सिमेंटिंग फ़ोर्स बनना है,हम सेतु बन जाएँ,हमारी बोली, हमारी अभिव्यक्तियाँ लोगों के दिलों को साथ लाने वाली हों, इस पर काम करना होगा,इसके बिना भारत न जुड़ सकता है और न ही बच सकता है.
बहुत सारी अप्रिय स्मृतियों को भुला देना होगा.कड़वी यादों को कुरेदने से राष्ट्र नहीं बनते.बहुत कुछ भुलाना भी पड़ता है.पहले किसने किसके साथ क्या क्या किया.कौन कहाँ से आया,अब रोज़ रोज़ इतिहास का उत्खनन करने की ज़रूरत नहीं है.अतीत की लड़ाइयों को हमें लड़ने की आवश्यकता नहीं है.न ही इतिहास को अब सुधारना है.इतिहास न गर्व करने की विषय वस्तु है और न ही उसके आधार पर ताज़ा संघर्ष छेड़ने की,इतिहास के सबक़ पढ़े जाने चाहिए और उन भूलों से सबक़ लेकर आगे बढ़ना चाहिये.
 याद रखिये कि हम 26 जनवरी 1950 को संविधान द्वारा किये गये इस वायदे के साथ बंधे हुए हैं कि आज से हम सब भारत के नागरिक है,न कोई छोटा,न बड़ा.किसी भी नागरिक के साथ जन्म स्थान,वंश,रंग, जाति,धर्म तथा लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है.इसका सरल सा आशय यह है कि कोई आर्य, कोई अनार्य,कोई शक,कोई द्रविड़,कोई हूण,कोई कुषाण,कोई मुग़ल,तुर्क,यवन,पठान,कोई मंगोल,कोई सर्ब,कोई मुल्तान,कोई हिंदू,कोई सिख,कोई मसीही तो कोई जैन,बौद्,मुसलमान.कोई ब्राह्मण, कोई पिछड़ा,कोई दलितकोई आदिवासी,कोई मज़दूर,कोई किसान,कोई यूरेशियाई तो कोई मूलवासी ये तमाम पहचानें भारतीयता में विलीन हो जाती है.संविधान लागू होने के बाद से सब अव्वल और आख़िरी केवल और केवल भारतीय है और सब बराबर है,सब यहीं के हैं और यहीं रहेंगे.कोई किसी को कहीं भगा देगा, ऐसी ग़लतफ़हमी न पालें और न ही प्रचारित करें.
अतीत के घाव कुरेदने,धर्म ग्रंथों के पुनर्पाठ करने और पीड़ाओं की अखंड कथाएँ बांचने से कोई सभ्यता और राष्ट्र राज्य आगे नहीं बढ़े हैं.न गौरवशाली अतीत का गुण गाने से और न पीड़ादायक अतीत को गरियाने से,न मंदिरों तले मस्जिदें ढूँढने से और न ही मस्जिदों के नीचे मूर्तियाँ खोदने से कुछ हासिल होगा.खोदते खोदते थक जाएँगे, नए नए रहस्य निकलते जायेंगे.कोई मस्जिद मंदिर निकल आयेगी तो कोई मंदिर बुद्ध विहार साबित हो जायेगा,इसलिए इतिहास के उत्खनन की परियोजना को अविलम्ब रोका जाना होगा.वर्ना हर व्यक्ति अपने अतीत के लिए लड़ते हुए वर्तमान को खो देगा और इस देश को कोई नहीं बचा पायेगा.
प्रतिक्रियावादी ताकतें,फ़ासिस्ट लोग सदैव कुछ लोगों को दुश्मन निरूपित करके बड़ी आबादी को उनके ख़िलाफ़ एकजुट करती है. विश्व इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है.हमें इन ग़लतियों से बचना होगा.अगर देश में उत्पीडितों की भी एकता बनानी है तो वह किसी समुदाय या व्यक्ति को दुश्मन निर्मित करके नहीं बल्कि मुद्दों, विचारों और सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए ताकि ऐसी एकता शाश्वत और बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकअनुकंपाय होगी.हमें सकारात्मक सोच से आगे बढ़ना है,केवल प्रतिक्रिया में हम सक्रिय न हो.
नई समस्याओं के पुराने समाधान नहीं होते. वर्तमान की दिक्कतों का हल हज़ारों साल पुरानी किताबों में और सैंकड़ों साल पुराने घिसे पिटे अवधारणा पत्रकों में मत खोजिए.उस दौर के लोगों ने तत्कालीन समय के लिए बहुत कुछ किया है.वे चिरक़ालीन रेडीमेड समाधान नहीं है.आज के लिए आज सोचना है और हमें सोचना है,न पुरातन ग्रंथ और न ही महापुरुषों की गाथाएँ उनके समाधान देगी. अगर किसी एक दो चार छह या दस बीस लोगों,सम्प्रदायों अथवा मसीहाओं के पास हल होता तो स्थितियाँ इतनी विकट विकराल न होती, इसलिए खोज जारी रखनी होगी.जिस तरह समस्याएँ प्रतिपल नित नूतन है,उसी तरह समाधान भी अध्यतन होंगे तो बेहतर होगा
संवाद एक रास्ता बन सकता है,हमें बात करनी होगी जो हमसे असहमत है उनसे, हमें बात करनी होगी जो हम जैसे नहीं है,जो हम जैसे नहीं दिखते,जो हमारे जैसा नहीं खाते,जो हम जैसे नहीं बोलते, जो हमारी जैसे आस्थाओं से आबद्ध नहीं है,हमें आलरेडी कन्विनश्ड लोगों को और कन्विन्श करने के बजाय उन लोगों से बात करनी चाहिये जो अलग सोच रहे हैं.नए विचारों के लिए जगह बनानी है.
अगर किसी के इस बाँटने वाला विचार है तो हमारे पास जोड़ने वाले विचारों की कमी थोड़े ही है.कोई हिंदुत्व की बात करें तो आप बंधुत्व की बात कीजिए.इंसान का स्वधर्म दुनियाँ के तमाम थोंपे हुए धर्म,संप्रदाय और मज़हबों से ज़्यादा मज़बूत है.वे मूलतः इंसान है और मिलजुल कर रहना चाहते है.मनुष्य का स्वभाव आनंद और उत्सवधर्मिता वाला है,उसे अधिक समय तक हिंसक और अशांत नहीं रखा जा सकता है.
हालाँकि व्यक्तिगत रूप से मेरी ठोस मान्यता है कि धर्मों में मुक्ति नहीं है, मुक्ति तो धर्मों से मुक्त हो जाने में हैं,इस सोच के बावजूद मैं संविधान का समर्थक हूँ और हर नागरिक के उपासना और आस्था के अधिकार की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूँ,मैं उनके मूलभूत मानवीय अधिकारों के लिए लड़ूँगा और अंत तक भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बरकरार रखने के काम में अपना योगदान दूँगा.
मेरा सपना इस राष्ट्र का साझा सपना है,न्याय,समानता,आज़ादी और बंधुता पर आधारित एक देश और दुनियाँ जिसमें सब बराबर हो,कोई किसी का शोषण न करें,किसी को किसी से वैर न हो,ऐसा भारत बनाने और बचाने की हर लड़ाई में मैं शरीक हूँ.
आपने मुझे बुलाया और बात रखने का मौक़ा दिया.मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ. आप सबका आभार

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