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सतत विकास लक्ष्य से कितनी दूर है घुमंतू, अर्ध घुमंतू और विमुक्त जातियाँ ? 

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( भंवर मेघवंशी )
संयुक्त राष्ट्र संघ सतत विकास लक्ष्य ( एसडीजी) निर्धारित करता है, वर्तमान में ‘कोई पीछे ना रहे ‘के नारे के साथ लक्ष्य निर्धारित है, जिन्हें सन 2030 तक हासिल करना है.सतत विकास के ये लक्ष्य तभी प्राप्त किए जा सकते हैं जब समाज का हर वर्ग इन्हें अचीव कर लें, अगर वंचित और हाशियाकृत समुदाय इसी प्रकार की वंचना में जीते रहे तो यूएन के सतत विकास लक्ष्य की हासिल कर पाना नामुमकिन ही होगा.


राजस्थान में ज़रूरत संस्था ‘ बजट अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र ‘ ( बार्क ) सतत विकास लक्ष्य और वंचित समुदाय शृंखला प्रस्तुत कर रहा है, जिसके तहत राजस्थान में इन समुदायों के मुद्दों, नीतियों, बजट और योजनाओं का विशद विश्लेषण और उनकी हक़ीक़त को सामने लाने का काम किया जा रहा है,बार्क इस तरह की रिपोर्ट्स सार्वजनिक भी कर रहा है. हाल ही में उनकी पहली रिपोर्ट “विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध घुमंतू जातियाँ और सतत विकास लक्ष्य” शीर्षक से आई है जो विमर्श के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है, लेकिन हैरत की बात है कि इस पर नगण्य चर्चा हुई है, न सरकार के सम्बंधित विभागों ने और न ही इन समुदायों का नेतृत्व करने वाले लोगों ने और न ही सिविल सोसायटी के उन समूहों में यह चर्चा का विषय बनी है,जो इन वर्गों के उन्नयन के लिए काम करने का दावा करते रहे हैं. मनुधारा के मीडिया से तो वैसे भी कोई अपेक्षा नहीं है, लेकिन बहुजन मीडिया की भी इस पर खामोशी रही है.इसके क्या कारण रहे हैं,उन पर चर्चा बेमानी है. हो सकता है कि यह रिपोर्ट उनकी नज़रों से गुज़री ही न हो, हालाँकि यह रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में मौजूद है.


बार्क के निदेशक डॉ नेसार अहमद द्वारा प्रस्तुत यह रिपोर्ट सबसे पहले इन समुदायों की पहचान के बारे में बात करती है और बताती है कि इन हाशिए के समुदायों की आज तक कोई सर्वमान्य पहचान या परिभाषा नहीं बन पाई है.चूँकि ये समूह आजीविका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास करते रहते हैं, कुछ पूरे समय तो कुछ कभी कभी, इसलिए इनमें घुमंतू भी है तो अर्ध घुमंतू भी, कुछ समूह तो ऐसे भी हैं जो अपने जानवरों को चराने के लिए पलायन करते हैं और दो चार महीनों में घर भी लौट आते हैं, इनका विचरण भी जीवन यापन से जुड़ा है, लेकिन कुछ जातियाँ है जो विमुक्त कही जाती है, ये वो सामाजिक समूह है जिनको अंग्रेजों ने सन 1871 में अपराधी जातियाँ घोषित कर दिया था , आज़ादी के बाद इस क़ानून को तो समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसके स्थान पर आदतन अपराधी क़ानून लाया गया और उपरोक्त जाति समूहों को विमुक्त घोषित किया गया. ये शिकारी , चरवाहे, मनोरंजनकर्ता और छोटे छोटे व्यापार वाणिज्य करने वाले समूह है, इन जाति समूहों की संख्या तक़रीबन 269 बताई गई है, रेनके आयोग के अनुसार पूरे देश में इनकी आबादी 10 से 12 करोड़ बताई गई है.राजस्थान में ये 32 जातियाँ हैं जिनकी जनसंख्या 35 लाख है.इनमें से कुछ जातियाँ अनुसूचित है तो कुछ पिछड़े वर्ग में और अधिकांश किसी भी सूचि में नहीं हैं, वे अपनी पहचान खोज रही है.

घुमंतू, अर्ध घुमंतू और विमुक्त जातियों की स्थितियों का अध्ययन करने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने बाल कृष्ण रेनके की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया, आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की, लेकिन सरकार लागू नहीं कर पाई, इसके बाद   आई मोदी सरकार ने भी इदाते कमीशन बनाया है.लेकिन रेनके कमीशन ने व्यापक अध्ययन के बाद जो रिपोर्ट तैयार की, वह इन समुदायों की वास्तविकता से परिचित कराने में कामयाब रहती है.

वर्तमान में इन जातियों की सबसे बड़ी और मुख्य समस्याओं में से एक है आवास और भूमि पर पहुँच या मालिकाना हक़ का अभाव.रेनके आयोग रिपोर्ट ( 2008 ) के अनुसार 89 प्रतिशत विमुक्त और 93 प्रतिशत घुमंतू और अर्ध घुमंतू व्यक्तियों के पास ज़मीन का मालिकाना हक़ नहीं हैं. दलित आदिवासी एवं घुमंतू अधिकार अभियान राजस्थान ( डगर ) के साथ अपने काम के दौरान मैने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया कि इन समूहों के पास न रहने को आवासीय ज़मीन है, न खेती के लिए कृषि भूमि है, न व्यापार के लिए व्यावसायिक भूमि है, स्थिति इतनी बदतर है कि इनके पास मृत्यु के बाद शवों को जलाने या दफ़नाने तक के लिए ज़मीन नहीं है, जिसके कारण अकसर उनको अपने मुर्दों के अंतिम संस्कार के लिए संघर्ष करना पड़ता है., ऐसे भी संगीन मामले पता चले हैं जहां पर ज़िंदा और मुर्दा लोग एक ही तम्बू तले पाये जाते हैं, जिन स्थानों पर ये लोग तम्बू लगा कर रहते हैं, उन्हीं के नीचे उनके मुर्दे भी गड़े हुये हैं, इससे बदतर और क्या स्थिति हो सकती हैं ?

भूमि हीनता के बाद दूसरी बड़ी समस्या पहचान के दस्तावेज़ों का नहीं होना है,इन लोगों के पास राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और जाति प्रमाण पत्र नहीं होते हैं, जिसके कारण वे सरकारी योजनाओं I लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं. रेनके आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 50 प्रतिशत विमुक्त और 60 फ़ीसदी घुमंतू, अर्ध घुमंतू के पास जाति प्रमाण पत्र नहीं है.55 प्रतिशत विमुक्त और  72 घुमंतू अर्ध घुमंतू व्यक्ति राशन कार्ड तक से वंचित है.सबको शिक्षा और चिकित्सा का दावा किया जाता है लेकिन रेनके कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि 72 प्रतिशत घुमंतू और अर्ध घुमंतू तथा  58 फ़ीसद विमुक्तों के बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं ,इनके 80 प्रतिशत बच्चे आंगनबाड़ी तक नहीं पहुँच पाते हैं ,इन जातियों में साक्षरता केवल 42 प्रतिशत है, इनके एक चौथाई लोगों की शमशान तक पहुँच नहीं हैं. इलाज के अभाव में कईं स्थानों पर प्रसूताओं ने खुले में सड़कों पर ही बच्चों को जन्म दिया है. रेनके कमीशन के मुताबिक़ इन समूहों की महज़ 25 फ़ीसदी महिलाएँ ही प्रसव हेतु सरकारी अस्पताल पहुँच पाती है .इन वर्गों की महिलाओं और बच्चों की स्थिति बेहद दयनीय है, इनका बड़ा भाग शहरों में कचरा बीनने में लगा हुआ है.जिससे इनके स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा पूर्ण सुरक्षित जीवन का अधिकार बाधित हो रहा है. घुमंतू समुदायों की महिलाएँ  विभिन्न प्रकार की असमानताएँ और शोषण सहती है. जिसकी रोकथाम के लिए फ़िलहाल कोई व्यवस्था नज़र नहीं आतीं है.

चूँकि ये समुदाय अपनी रोज़ी रोटी एक जगह से दूसरी जगह प्रवास करते हुए कमाते रहे हैं, इनका कभी कोई स्थाई ठिकाना नहीं रहा, लेकिन कोविड काल में इनके विचरण , प्रवास और पलायन तथा भ्रमण शील रोज़गारों पर पाबंदी लग गई, इससे इन समुदायों की स्थितियाँ और भी विकट हो चली है. ये लोग जहां तहाँ फँस गये और इनका काम काज भी बंद हो गया, नतीजतन इनको क़र्ज़े लेने पड़े और अब ये क़र्ज़ों के बोझ तले दब चुके हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्यों , जिनमें ग़रीबी, साक्षरता, स्वास्थ्य, साफ़ पीने के पानी तक पहुँच, महिलाओं की स्थिति और सम्पत्तियों पर मालिकाना हक़ तथा राजनीतिक भागीदारी आदि प्रमुख है, इस आइने में अगर विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू तबकों को देखें तो इनकी स्थिति बाक़ी आबादी से बहुत पीछे दिखाई पड़ती है.बार्क की यह रिपोर्ट भी कहती है कि – रेनके आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि -“मानव विकास सूचकांक पर ये समुदाय काफ़ी पीछे है और साथ ही ये समुदाय राजनीतिक रूप से भी हाशियाकृत है “.

हालाँकि विगत दो दशकों से इन समूहों में अपने अधिकारों को माँगने के प्रति चेतना भी आई है और इनकी आवाज़ विभिन्न स्तरों से उठी भी है, शायद इसी का नतीजा है कि केंद्र सरकार ने सन 2005 में रेनके आयोग गठित किया जिसने अपनी रिपोर्ट सन 2008 के प्रस्तुत की , उसके बाद वर्ष 2015 में इदाते आयोग गठित किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट वर्ष 2017 में पेश की, इन आयोगों की रिपोर्ट्स और निरंतर उठती माँगों के मद्देनज़र राजस्थान सरकार ने वर्ष 2013 में तथा केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में विमुक्त,घुमंतू एवं अर्ध घुमंतू बोर्ड की स्थापना भी की है और कुछ योजनाएँ भी केंद्र व राज्य सरकार संचालित कर रही है, लेकिन बजट के अभाव में कोई प्रभावी कार्य होता नज़र नहीं आ रहा है. केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2020-21 में मात्र दस करोड़ रुपए की राशि आवंटित की, कितनी अजीब बात है कि जिस समुदाय की संख्या ही दस से बारह करोड़ है, उसे महज़ दस करोड़ रुपए की राशि का आवंटन किसी मज़ाक़ की तरह है, प्रति व्यक्ति एक रुपया भी सरकार ने आवंटित नहीं किया है.जबकि अन्य समुदायों को आवंटन सैंकड़ों करोड़ रुपया हुआ है.

घुमंतू बोर्ड में नियुक्ति का सवाल हो अथवा बजट का आवंटन, विभिन्न राजनीतिक दलों में इस वर्ग की भागीदारी की बात हो अथवा सामाजिक क्षेत्र में इनको उचित प्रतिनिधित्व के प्रश्न हो, सब अनसुलझे हैं. जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इन समुदायों के लिए कोई स्पष्ट नीति और क़ानून तथा योजनाएँ नहीं बनायेगी,उनको लागू करने के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया नहीं होंगे, तब तक घुमंतू, अर्ध घूमंतुओं और विमुक्तों की चिंता महज़ ज़बानी जमाखर्च ही प्रतीत होगा.

बजट अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र राजस्थान की यह रिपोर्ट न केवल समस्याओं की पहचान करती है, बल्कि समाधान की दिशा में भी अपने सकारात्मक सुझाव पेश करती है, उनका मानना है कि भारत सरकार को रेनके और इदाते कमीशन की सिफ़ारिशों को मानते हुए विमुक्त, घुमंतू , अर्ध घुमंतू जातियों के लिए एक स्थायी संवैधानिक आयोग गठित करना चाहिए,अभी होने वाली जनगणना में इन जातियों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के प्रावधान किए जाने चाहिए, इन समुदायों के लिए जारी योजनाओं का बजट बढ़ाया जाना चाहिए. नीति आयोग को सतत विकास लक्ष्यों के अंतर्गत इन समुदायों के विकास के आँकड़े संकेतक के रूप में शामिल करने चाहिए, इनके लिए बने बोर्ड का बजट बढ़ाया जाना चाहिए . इसी तरह कुछ सुझाव राजस्थान सरकार के लिए भी दिए गये है कि इन समुदायों के लोगों के पहचान के दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया को सरल किया जाना चाहिए.भूमि अधिकार दिलाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाना चाहिये. घुमंतू बोर्ड में इसी वर्ग के लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए , उसे कार्यशील बनाया जाना चाहिए, जो घुमंतू, अर्ध घुमंतू और विमुक्त जिस सूची में शामिल है, उनको उसका लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिये.

हाशिए के इन समुदायों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भागीदारी बढ़े, इसके लिए विशेष प्रयास नहीं किए गये तो इन समाजों की सतत विकास की इस धारा से जोड़ पाना मुश्किल होगा. अगर देश की बारह करोड़ आबादी को गरिमापूर्ण पहचान, आजीविका और सुरक्षित जीवन दे पाने में हमारा राष्ट्र विफल रहता है तो यह हम सबके लिए राष्ट्रीय शर्म की बात होगी.


( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है और दलित, आदिवासी एवं घुमंतू समुदायों के प्रश्नों पर कार्यरत है )

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