“ हिन्दुत्व के हिमायती हमको बोलने क्यों नहीं देते प्रधानमंत्री जी ?”

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( खुला पत्र  )

प्रिय प्रधानमंत्री जी, 

जय भीम ! 

मैं राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के एक गाँव से यह पत्र आपको लिख रहा हूँ.मैं एक लेखक ,पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हूँ और खेती किसानी करता हूँ तथा दलित,आदिवासी और घुमंतू जैसे वंचित तबकों के संवैधानिक अधिकारों के लिये आवाज़ उठाता हूँ,उनके हक़ में बोलता और लिखता हूँ. 

इसे संयोग कह सकते हैं कि मैंने अपनी किशोरावस्था आपके प्रिय संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के साथ गुजारी,मैं अपने गाँव की शाखा का मुख्य शिक्षक रहा और बाद में जिला कार्यालय प्रमुख भी,मैंने सन 1990 में आयोजित पहली कारसेवा में हिस्सा लिया और गिरफ़्तार होकर दास दिन आगरा की बहु उद्धेशीय स्टेडियम की अस्थाई जेल में भी रहा.मैं आपकी तरह पूर्णकालिक प्रचारक बनना चाहता था,लेकिन मेरी जाति उसमें आड़े आ गई और मुझे यह भी कहा गया कि “संघ को प्रचारक चाहिए,विचारक नहीं.” संघ कार्य के दौरान हुये जातिगत भेदभाव के पीड़ादायक अनुभवों के पश्चात मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को छोड़ दिया और बाबा साहब अम्बेडकर व अन्य बहुजन महापुरुषों व महास्त्रियों के आन्दोलन से जुड़ कर सामाजिक काम में सलंग्न हो गया.जहाँ आज भी मैं सक्रिय हूँ. 

एक पत्रकार,लेखक और सक्रिय समाजकर्मी होने के नाते मैंने हिन्दुत्व के पैरोकारों द्वारा जाति,वर्ण का समर्थन करने और वंचित समूहों को प्रदत्त संवैधानिक संरक्षणों का विरोध किये जाने के दोगलेपन को बार बार उजागर किया है,जिसके चलते हिन्दुत्ववादी राजनीति में संलग्न लोग,समूह और संस्थान सदैव मेरे विरुद्ध रहे हैं और उन्होंने बहुत बार चरित्र हनन से लेकर शारीरिक हमले तक करने के प्रयास किये है. 

मेरे लेखन और सार्वजनिक रूप से बोलने के प्रति संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों ने कभी भी सहिष्णुता का रवैया नहीं अपनाया है,मैं विगत तीन दशक से हिन्दुत्वजन्य नफ़रत और अपमान को सहन करने के लिये अभिशप्त हूँ.इस बात को बार बार मैं उजागर भी करते रहा हूँ.इस प्रकार की घृणा का ताज़ा उदहारण दस से बारह सितम्बर तक ऑनलाइन आयोजित हो रही “ डिस्मैंट्लिंग ग्लोबल हिंदुत्व “ नामक सेमिनार के विरुद्ध चलाया जा रहा घृणा का अभियान है .चूँकि मैं भी इस सेमिनार के एक सत्र में वक्ता हूँ और मुझे “जाति और हिंदुत्व” पर अपनी बात रखनी है, इसके लिए मैने आयोजन समिति को अपनी लिखित सहमति प्रदान की है और मैं इस विषय पर अपनी बात रखने वाला हूँ, इस सेमिनार से दुनिया भर के 51 नामचीन विश्विद्यालय और अकादमिक जगत के सैंकड़ों लोग जुड़े हुये हैं,करीब छह हजार लोगों ने इसमें पंजीकरण किया है. मैं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित हूँ कि हिंदुत्व के पैरोकार मुझे बोलने से रोकना चाहते हैं.

जातीय घृणा से ओतप्रोत ये हिंदुत्व के हिमायती एक नियोजित आक्रामक अभियान चला रहे है और बहुत सारी ग़लत जानकारियाँ फैला कर ऐसा माहौल बना रहे हैं कि जिससे इस सेमिनार के वक्ताओं के प्रति लोगों में आक्रोश फ़ैल रहा है ,लोग सोशल मीडिया पर उनको ट्रोल कर रहे हैं.माहौल इतना हिंसक किया जा चुका है कि कभी भी किसी भी वक्ता की मॉब लिंचिंग हो सकती है. मुझे भी निरंतर धमकी भरे मेल मिल रहे है, जिसमें चेतावनी दी जा रही है कि मैं इस आयोजन के वक्ताओं की सूची से अपना नाम हटा लूँ, अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहूँ.सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर तो गालियों और गंदे भद्दे कमेन्ट्स किये ही जा रहे हैं,ऑपइण्डिया,फर्स्ट पोस्ट ,इण्डिया न्यूज़,न्यूज़एक्स,रिपब्लिक इंडिया सहित दर्जनों मीडिया हाउस इस तरह का नफ़रत का अभियान चला कर भारत में लोगों को हिंसा के लिये उकसाने का काम कर रहे हैं.

भारत का मनुस्ट्रीम जातिवादी मीडिया और हिंदुत्व के समर्थक तत्व जो मुख्यतः आपके समर्थक भी हैं, वे रात दिन हम वक्ताओं के बारे में दुष्प्रचार तो कर ही रहे हैं, इस ऑनलाइन सेमिनार की ग़लत व्याख्या भी कर रहे हैं,वे इतने कुपढ़ है कि डिस्मेंट्लिंग ग्लोबल हिन्दुत्व का मतलब हिन्दू धर्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़त्म करने अथवा टुकड़े टुकड़े कर डालने के रूप में प्रचारित कर रहे हैं,जबकि अगर वे शब्दकोष का ही सहारा लेते तो समझ पाते कि इस शब्द के कईं व्यापक अर्थ है जैसे कि निराकरण,निवारण,समाधान तथा किये हुये प्रश्न अथवा उठाई गई आपत्ति का तर्क पूर्ण खण्डन करना भी है.


इसके अलावा भी विवस्त्रीकरण ,विघटन ,शमन ,विलग करना ,रद्द करना .निष्पन्नता,पूर्णता और उध्वंस करना भी है .जब भी कोई बुद्धिजीवी वर्ग इस शब्द का इस्तेमाल करता है तो वह एयर स्ट्राइक करने की तरह ख़त्म कर देना अथवा टुकड़े टुकड़े कर देना नहीं होता,यह किसी भी विचार को नकारने,उसका पर्दाफाश करने ,उक्त विचार या विचारधारा का खंडन करने के संदर्भ में प्रयुक्त होता है,लेकिन हिन्दुत्व के पैरोकार इसकी हिंसक और असहिष्णु व्याख्या करके माहौल को विषाक्त बनाने में लगे हुये है,जो कि बेहद चिंताजनक बात है. मेरा मानना है कि हिंदुत्व विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक सिद्धांत है जो ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता व वर्चस्व को थौपने का एक ज़रिया है,इसका धर्म और आस्था से कोई लेना देना नहीं है,हिन्दुत्व की अवधारणा को उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में वंचित समुदायों के सामाजिक न्याय और बराबरी के संघर्षों को रोकने के लिया आविष्कृत किया गया है.हिन्दुत्व अपनी जन्म घूटी में मिले दलित आदिवासी विरोधी संस्कारों से आज भी सुसज्जित है और इन वर्गों की आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रहा है. 

श्रीमान ,भारत अभी तक एक धर्म निरपेक्ष लोकतान्त्रिक राष्ट्र हैं ,जिसमें एक संविधान लागू है जो हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है,लेकिन जैसा कि आप भी भली भांति जानते ही है कि हिंदुत्ववादी न लोकतंत्र में यकीन करते है और न ही उनको धर्म निरपेक्षता पसंद है ,वे तो भारत को एक धार्मिक राष्ट्र राज्य हिन्दू राष्ट्र बनाने पर तुले हुये है,उनका भारतीय संविधान से अधिक आदर मनु स्मृति पर है,ऐसे तत्व वंचित वर्गों को संविधान प्रदत्त प्रतिनिधित्व ( आरक्षण ) संरक्षण ( एससी एसटी एक्ट ) और बोलने की आज़ादी को छीन लेना चाहते हैं.यही लोग और समूह विगत पंद्रह दिन से मुझे धमकी भरे मेल लिख रहे है और ऐसी चिट्ठियां भी भेज रहे हैं कि मैं खुद को इस सेमिनार से दूर कर लूँ और उसमें बोलने से बचूं,क्योंकि मेरे बोलने से करोड़ों हिन्दुओं को ठेस पहुंचेगी.  

हिंदुत्ववादी समूहों के समर्थन में कोई कैप्टन अजित वडकाईल है जो किसी कल्कि आर्मी और सनातन संस्था आदि से जुड़े हुये हैं,वे और उनके समर्थक निरंतर धमकी भरे और अपमानजनक मेल भेज रहे है, चूँकि वे अपने हर मेल को प्रधानमंत्री,गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इत्यादि को कॉपी कर रहे है तथा ख़ुफ़िया एजेंसियों से माँग कर रहे है कि हम जैसे सनातन धर्म और भारत विरोधी तत्वों को सबक़ सिखाया जाये. हमारे पासपोर्ट छीन लिया जाये और हमारी नागरिकता रद्द कर दी जाये,कुछ अति उत्साही तो फांसी पर चढाने और गोली मार देने की मांग भी कर रहे हैं.मैं इन धर्मांध लोगों के इरादों से वाकिफ हूँ और हमने विगत वर्षों में नरेन्द्र दाभोलकर ,कलबुर्गी ,पानसरे और गौरी लंकेश सहित कईं लोगों को क़त्ल कर दिये जाने के घटनाक्रम देखे हैं.हम इस हिंसक हिन्दुत्व के एक सिपाही नाथू राम गोडसे का गाँधी हत्या का कारनामा जानते हैं,इसलिए इसके मारक और खतरनाक असहिष्णु स्वरुप के बारे में खामोश नहीं रहना चाहते है.इसलिए भी यह पत्र आपको मैं लिख रहा हूँ कि आप इन तत्वों पर लगाम लगायें ताकि ये भारत की छवि को ख़राब करने से बच सकें.  

महोदय ,कल ही मुझे यूनाइटेड हिन्दू फ्रंट के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष जय भगवान गोयल का एक पत्र भी मिला है जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि मैं इस सेमिनार में वक्ता के रूप में अपना नाम हटा लूँ,क्योंकि यह हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य होगा.इस प्रकार के पत्रों ,सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग,फोन काल्स पर गाली गलौज और सेमिनार के प्रायोजकों व सह प्रायोजकों पर दबाव बनाकर सेमिनार को रद्द करवाने की जी तोड़ कोशिशें की जा रही है,वक्ताओं पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे नहीं बोलें अन्यथा इसके दुष्परिणाम होंगे.एक न्यूज़ चैनल पर आपकी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने इस आयोजन के आयोजकों व वक्ताओं को पापी ,दुष्ट ,देश द्रोही ,अय्याश और भारत माता को डसने वाले सांप तक कहा है.किसी हिन्दू जन जागृति समिति और ऐसी ही अन्य संस्थाएं लगातार विष वमन करके देश में हिंसक माहौल बना रही है और नागरिकों को वक्ताओं के खिलाफ उकसा रही है,मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या इनको भारत सरकार ,सत्तारूढ़ दल और आरएसएस का समर्थन प्राप्त है ?मेरे मन में यह सवाल बार बार उठ रहा है कि सदियों तक वंचित समूहों के लोगों को पढ़ने ,लिखने ,सत्ता ,संपत्ति और शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया,अब जबकि संविधान ने उनको यह अधिकार दिया है तो आपके लोग यह अधिकार हमसे क्यों छीनना चाहते हैं ? आखिर आप हम लोगों को बोलने क्यों नहीं देना चाहते हैं ? प्रधानमंत्री महोदय ,मैं संघ के मुख पत्र पाँचजन्य का तीस साल से पाठक रहा हूँ, शायद आप भी पढ़ते होंगे,वैचारिक राहें अलग होने के बावजूद भी मैं इसे पढ़ते रहा हूँ,लेकिन मुझे हैरानी हुई ,जब मुझे पता चला कि पांचजन्य ने मेरे बारे में लिखते हुये यह लिखा कि “राजस्थान के दलितवादी लेखक भंवर मेघवंशी की कुल योग्यता इतनी है कि वे हर साल मनु स्मृति जलाते है”,जबकि मैंने तो आज तक कोई किताब नहीं जलाई,वैसे भी बाबा साहब अम्बेडकर जो काम लगभग सौ साल पहले कर गये,उसे अब हर साल मैं क्यों करूँगा ?  हिन्दुत्व के हिमायती अपने लेखों में यह भी लिख रहे हैं कि मैं लिबरल लोगों का नया हीरो हूँ और भारत के कम्युनिस्ट और कांग्रेस तथा अन्य सेकुलर राजनीतिक दल मेरा इस्तेमाल कर रहे हैं, इसका मतलब यह है कि सवर्ण सनातनी अब भी यह समझते हैं कि हम दलितों में अपना कोई दिमाग़ नहीं होता है.हम किसी न किसी के इशारों पर यह काम करते हैं और उपयोग व उपभोग की वस्तु हैं.यह कितना अपमानजनक है,यह तो सीधे सीधे उत्पीडन है और निंदनीय कृत्य है .


यह कैसा लोकतंत्र है मोदी साहब, जहाँ आज भी एक अम्बेडकरवादी मानव अधिकार कार्यकर्ता अपने मन की बात नहीं कह पा रहा हैं.मुझे बोलने से रोकने की हर कोशिश मेरे अपने अभिव्यक्ति के संविधान प्रदत्त अधिकार को छीनने की कोशिश है और नागरिकों को विभिन्न माध्यमों से मेरे खिलाफ भड़का कर मेरे जीवन की सुरक्षा ख़तरे में डालने का कुत्सित प्रयास है,यही वह भयावह हिन्दुत्व है जो आज वैश्विक चुनौती बन गया है और इसके निराकरण की महती आवश्यकता है. उम्मीद है कि आप हमारे बोलने के अधिकार को बचाए रखने में मददगार होंगे और हिन्दुत्व के नाम पर नफरत फैला रहे तत्वों को नियंत्रित करेंगे.

 इसी आशा और विश्वास सहित

 सदभावी 

भंवर मेघवंशी

(लेखक एव सामाजिक कार्यकर्ता)

180, अम्बेडकर भवन ,गाँव – सिरडियास,जिला – भीलवाड़ा( राजस्थान ) 311026

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