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पे बैक टू सोसाइटी: सर्व फॉर योर सोसाइटी

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( पवन बौद्ध )

वर्तमान परिपेक्ष में रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य हर किसी व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताओं में से एक है। आजादी से पहले आजादी के पश्चात देश में कई ऐसी श्रेणीगत असमानता, राजनीतिक स्तर का सामाजिक रवैया, वैचारिक विचारों में अनियमितता के कारण समाज में व्याप्त समाज मे वर्गवाद के बीज बोए जा चुके हैं। ब्रिटिश सरकार से आजादी से पहले बाबा साहब ने कई आंदोलनों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर जागरूकता के माध्यम से बहुजनो को जगाने का प्रयास किया था। बाबा साहब अंबेडकर के अनुसार, वर्ण-व्यवस्था अवैज्ञानिक, अमानवीय, अलोकतांत्रिक, अनैतिक, अन्यायपूर्ण एवं शोषणकारी सामाजिक योजना रही थी ।

ब्रिटिश हुकूमत के नौकरशाही रवैया से बाबा साहब भली-भांति परिचित थे क्योंकि उन्हें लगता था कि नौकरशाह केवल अपना ही भला कर सकते हैं आमजन का नहीं। स्वर्ण जाति के नौकरशाहों से मदद नहीं मिल पाने के कारण उन्होंने अपने समाज के नौकरीपेशा लोगों से कहा था कि शोषितों और वंचितों को ऊपर उठाने के लिये वे आर्थिक रूप से मदद करें जिसे पे-बैक टू सोसायटी के सिद्धांत से जाना जाता हैं।पे-बैक टू सोसाइटी के जनक बड़ौदा रियासत के महाराज सयाजीराव गायक़वाड ने बाबा साहब की मदद करके सर्वप्रथम पे-बैक टू सोसाइटी की मदद की पेशकश की थी।

महाराजा गायक़वाड़ ने सामाजिक स्तर पर शिक्षा, पर्दा प्रथा ,बालविवाह ,कन्या बिक्री बंद करके अन्तरजातिय विवाह को प्रोत्साहन दिया। अस्पृश्यता निवारण और विधवा विवाह जैसे समाजिक सुधार के कार्यों को अपनी रियासत में सर्वप्रथम शुरुआत की, तत्कालीन संकीर्ण मानसिकता वाले हिंदुओं ने शिक्षकों ने शूद्र वर्ग के बालक बालिकाओं को पढ़ाने से मना कर दिया जिसके चलते महाराज गायकवाड ने मुस्लिम शिक्षकों की भर्ती की। डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना निबंध ”दी इवोलूशन आँफ प्रोव्हीन्शल फ़ायनांन्स इन ब्रिटिश इंडिया “ उन्हें सम्मान और कृतज्ञता स्वरूप महाराजा सयाजीराव को अर्पित की थी। अपनी रियासत में पे बैक टू सोसाइटी सिद्धांत को पूर्णता लागू करने के पश्चात जनता ने उन्हें “भारत का आखिरी आदर्शवादी राजा” की उपाधि प्रदान की।

बहुजन पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी पे-बैक टू सोसाइटी सिद्धांत पर चर्चा करते हुए कहा था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ी जातियों तथा धर्मान्तरित अल्पसंख्यक समाजों के सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने में लगा हुआ हैजिनमें कर्मठ कार्यकर्ता ‘संरचनात्मक राष्ट्रवाद’ की झलक देखते हैं। पेन का कैप 15 प्रतिशत अभिजात, सामंतवाद एवं पूंजीवादी को इंगित करता है जिन्होंने 85 प्रतिशत बहुजनों को धन, धरती, सत्ता आदि से वंचित कर दिया है।

मान्यवर कांशी राम ने कैडर कैंप में से ‘पे बैक टू सोसाइटी’ के तहत अपील की थी कि अगर उन्हें अपना उत्थान करना है तो मनुवादी सामाजिक व्यवस्था को तोड़ना ज़रूरी है। आपको जो नौकरी मिली है वह बहुजन प्रतिनिधित्व के कारण मिली है, इसके पीछे संघर्ष प्रतिनिधित्व पुरखों द्वारा चलाये आंदोलन का समर्थन किया है। जो कि आप से आपके ऊपर ऋण और आपका सामाजिक उत्तरदायित्व है कि आप अपने समाज को अपना समय, अनुभव, शिक्षा से समाज के बाकी युवाओं को प्रेरणा देते हुए समाज को पे-बैक टू सोसाइटी का विचार समर्पित करें।

वर्ग संघर्ष की कहानी का पदार्पण आजादी से पहले हो चुका है क्योंकि विश्व में कई क्रांतियां सिर्फ वर्ग संघर्ष के कारण हुई जिनमें फ्रांस की क्रांति का उदाहरण जॉर्ज की राजनीतिक उदासीनता, दरबारियों का बढ़ता हुआ हस्तक्षेप फ्रांस की जनता को दीमक की तरह खा गया। अपने अधिकारों के हनन से फ्रांस की जनता सड़कों पर उतर कर के अपने राजा के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा दिया। डा. बाबासाहेब अंबेडकर का योगदान केवल संविधान निर्माण तक ही नहीं सीमित रहा था बल्कि सामाजिक, राजनैतिक स्तर पर भी उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया। समाज में निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को सामाजिक स्तर पर बराबरी का दर्जा दिलाया, अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े, नारियों के सम्मान के लिए सदैव संघर्ष करते रहे। 24 सितंबर 1932 को डॉ॰ बाबा साहेब, महात्मा गांधी एवं अन्य हिंदू नेताओं के प्रयत्न से सवर्ण हिंदुओं तथा बहुजन के मध्य एक समझौता किया गया। इस समझौते से बहुजनों को सामाजिक राजनीतिक स्तर पर पे-बैक टू सोसाइटी का लाभ मिला जिसके चलते सन 1935 में आम मताधिकार का प्रयोग पूरे भारतवर्ष में किया गया।

पे-बैक टू सोसाइटी के तहत बाबा साहब ने शिक्षा, संगठन संघर्ष बहुजन समाज के लिए अति आवश्यक बताते हुए कहा था कि समाज में अनपढ़  लोगों की संख्या अधिक है यह हमारे समाज की गलती नहीं है अभिजात एवं सामान्य वर्ग के लोगों ने हीन भावना रखते हुए हमें शिक्षा से वंचित रखा। शिक्षा वो शेरनी है जो इसका दूध पिएगा वो दहाड़ेगा “शिक्षित बनो, संगठित रहो और उत्तेजित बनो” के नारे के साथ पे-बैक टू सोसाइटी मिशन को आगे बढ़ाया।भारतीय समाज में व्याप्त असमानता की इस भावना की वजह से आज भी हम देखते हैं कि जब किसी उच्च श्रेणी के व्यक्ति की हत्या हो जाती है तो सोशल मीडिया से लेकर टीवी एंकर रोज़-रोज़ नए-नए तरीकों की बहस शुरू कर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ बहुजन जाति के व्यक्ति की हत्या होने पर वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं आती हैं।

फ़्रांसीसी समाजशास्त्रियों ने ‘स्टेटस और पावर’ के सिद्धांत से समझाने की कोशिश की है जिसमें ‘स्टेटस और पावर’ साथ-साथ नहीं चलते। जैसे दलित समाज के किसी व्यक्ति के डीएम या एसपी के पद पर बैठने के बावजूद उसे उस सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता, जिस दृष्टि से किसी सवर्ण समाज के डीएम या एसपी को देखा जाता है। आज वर्तमान परिपेक्ष में नौकरशाहों राजनेताओं एवं अन्य पद पर बैठे हुए लोगों को समाज के निचले लोगों को पे-बैक टू सोसाइटी के सिद्धांत पर सहायता प्रदान करनी चाहिए जिससे कि हम बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।

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