उफ्फ! एक दशक बाद अब आसाम में एक और भजनपुरा

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डायरी (24 सितंबर, 2021)

( नवल किशोर कुमार )

बाजदफा यह सोचता हूं कि क्या किसी एक मुल्क में एक ही मजहब को मानने वाले लोग हो सकते हैं? यदि हां तो क्या वह मुल्क दुनिया का सबसे सुंदर मुल्क होगा? सबसे सुंदर का मतलब यह कि वहां अपराध नहीं होगा? वहां के लोग हिंसा नहीं करेंगे और सबके हाथों में काम होगा और सभी के पेट में भरपेट रोटियां। मैं चीन को देखता हूं। हालांकि वहां भी केवलए मजहब के लोग नहीं हैं। अलग-अलग मजहबों को माननेवाले लोग हैं। चीन में शासन-व्यवस्था भी एक हदतक मार्क्सवाद के अनुरूप ही है। माओत्से की विचारधारा का असर दीखता है। लेकिन वहां भी अमन-चैन नहीं है। सरकारी तंत्र ने एक तरह से अपने ही देश को अपना उपनिवेश बना रखा है। 

मैं तो अमेरिका के बारे में सोचता हूं। हालांकि अमेरिका धर्म के मामले चीन से अधिक उदार है। मेरे एक परिचित व मेंटॉर रहे रमेश यादव कैलिफोर्निया में रहते हैं। वे हमेशा मुझे बताते रहते हैं कि यहां कैलिफोर्निया में मजहबी अंतर बहुत अधिक मायने नहीं रखती। हिंदुओं के घरों में जब कोई तीज-त्यौहार होता है, अन्य धर्मों के लोग शामिल होते हैं। ऐसे ही अन्यों के उत्सव में हिंदू भी। हालांकि वे यह भी बताते हैं कि अब पिछले सात-आठ वर्षों में भारतीय हिंदुओं के व्यवहार में तब्दीली आयी है। वे अपने धर्म को लेकर अधिक चौकन्ने हो गए हैं और दिखावा करने लगे हैं। लेकिन अमेरिका में भी हिंसाएं होती हैं। मिनियापोलिस की वह घटना जिसमें अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लाॅयड की हत्या एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने उसके गर्दन को अपने घुटनों से दबाकर कर दिया था, कौन भूल सकता है और कौन भूल सकता है कि उसी अमेरिका में “ब्लैक लाइव्स मैटर” आंदोलन हुआ, जिसमें अश्वेत-श्वेत सब शामिल हुए थे?

लेकिन भारत तो दुनिया में सबसे अलग है। इतनी बर्बर और क्रूर मानसिकता के साथ यहां के हुक्मरान व उसके तंत्र के लोग हैं कि पहले एक आदमी को गाेली मारते हैं, वह मर जाता है और फिर उसके बाद  उसकी लाश पर लाठीचार्ज किया जाता है और एक फोटोग्राफर उसके उपर जूते से मारता है। क्या इस तरह की घटना की कोई मिसाल दे सकता है? यह घटना आसाम के दरांग जिले के सिपाझार के एक ऐसे इलाके में कल घटित हुई, जहां 49 घर मुसलमानों के थे और एक घर एक हिंदू का। पुलिस के मुताबिक करीब एक हजार की यह आबादी उस जमीन पर अतिक्रमण कर रह रही थी। पुलिस जमीन को मुक्त कराने गयी थी, जिसका लोगों ने विरोध किया और पुलिस ने पहले तो लाठीचार्ज किया तथा बाद में उनके उपर गोलियां चला दी। इस घटना में दो लोगों के मारे जाने की पुष्टि आसाम पुलिस ने की है। कितने घायल हुए हैं, इसकी सही जानकारी अभी तक मुझे नहीं मिल पा रही है। हालांकि पुलिस का कहना है कि इस घटना में उसके नौ जवान जख्मी हुए हैं। 

ऐसी ही एक घटना 3 जून, 2011 को बिहार के फारबिसगंज के भजनपुरा गांव में हुई थी। वहां भी इसी तरह का मामला था। एक पुलिस का जवान एक नौजवान के शव पर कूद रहा था। मरने वाला नौजवान मुसलमान था और उसकी लाश पर कूदने वाला सिपाही एक यादव जो कि बिहार में ओबीसी में शामिल है। आसाम में जो फोटोग्राफर कल एक शव को जूते मार रहा था, उसका नाम विजय बानिया है। बानिया समुदाय भी आसाम में ओबीसी में ही शामिल है।

तो कहने का मतलब यह है कि ब्राह्मणवादी अपनी साजिशों में सफल होते जा रहे हैं। उन्होंने इस देश के बहुसंख्यकों को उन्मादी बना दिया है। (मैं अपवादों को शामिल करना जरूरी नहीं समझता।)

आप कहीं की भी घटना देख लें, जहां किसी मुसलमान पर जुल्म ढाया गया है, वहां ओबीसी जरूर मिलेगा। आखिर यह वर्ग यह समझने को तैयार क्यों नहीं है कि वह ब्राह्मणों की कठपुतली है? आज भी वह ब्राह्मण वर्ग का लठैत ही है।

खैर, कल देर शाम दफ्तर से घर लौटा तो लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन के नीचे एक गरीब परिवार को बारिश से जुझता हुआ पाया। एक कविता जेहन में आयी।

सुनो, बरसती हुई बारिश की बुंदों,

मंदिरों में नहीं रहते हम मिहनतकश

किसी पत्थर या

परजीवी ब्राह्मण की तरह भीख के आसरे।

सब सहना जानती हैं

हमारी यह झोपड़ियां,

उखाड़े जाने के बाद

फिर उग आती हैं झोपड़ियां 

जिनके छप्पर से होकर

तुम मेरी कोठी के अनाज को

भिगो देना चाहती हो

मेरे घर के चूल्हे को 

बुझा देना चाहती हो।

बेहतर है कि तुम बरसो वहां

जहां खेत प्यासे हैं

और धान की फसलें मर रही हैं

तभी तुम्हारी जीत का मतलब है

वर्ना हार निश्चित है तुम्हारी

बरसती हुई बारिश की बुंदों।

( लेखक फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली में संपादक (हिंदी) हैं )

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