यह दीवाली इस तरह मनी !

228

( भंवर मेघवंशी )

राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले की माण्डल पंचायत समिति की सीडियास ग्राम पंचायत के गाँव गणेशपुरा के पाँच अनाथ बच्चों की दर्दनाक हक़ीक़त वरिष्ठ पत्रकार आनंद चौधरी जी की कलम के ज़रिये हम सबके सामने उजागर हुई.पढ़कर स्तब्ध रह गया, मेरे ही पड़ौस का गाँव है . इस परिवार को चार साल पहले तत्कालीन उपखंड अधिकारी की मौजूदगी में पालनहार योजना तथा खाद्य सुरक्षा योजना के तहत राशन देना सुनिश्चित करवाया गया था, फिर यह स्थिति क्यों आ गई .
खबर छपी तो साथियों ने साझा की, रिया बड़ी ( नागोर ) में पदस्थापित एसडीएम सुरेश मेघवाल जी का भी संदेश मिला कि आपके इलाक़े का मामला है , इस परिवार की कैसे मदद की जा सकती हैं , बतायें ? उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिये भी लोगों से सहयोग की अपील की.


मामले की गंभीरता के मद्देनज़र मैने माण्डल के विधायक राम लाल जी जाट और उनके निजी सहायक हंस राज जी चौधरी को अवगत कराया और स्थानीय प्रशासन से भी बात की , साथ ही साथी कार्यकर्ताओं से विचार विमर्श करके तय किया कि यह दीवाली हम गणेशपुरा के इन वंचित बच्चों के साथ ही मनायेंगे.


आज दोपहर मैं अपने साथी देबी लाल मेघवंशी जी और बद्री विशाल जी सालवी , भतीजे राहुल मेघवंशी और प्रह्लाद मेघवंशी के साथ गणेशपुरा पहुँचा. बच्चों के लिए गर्म कपड़े , मिठाई और फल आदि लिये और उनके घर पहुँचे.
घर क्या एक कमरा और वो भी बीस साल पहले इंदिरा आवास योजना के तहत निर्मित , जो अब जीर्ण शीर्ण बन चुका है .गाँव के अंतिम छोर का आख़िरी मकान , जहां बाक़ी गाँव गोबर डालता है , वहाँ यह मकान और उसमें पाँच अनाथ बच्चे ! एकदम हाशिये पर जैसे कि ग्राम समाज से बहिष्कृत ! घर कम घरोंदा कह लीजिए. एक दरवाज़ा वो भी टूटा हुआ, दूसरा दरवाज़ा मिट्टी की ईंटें लगा कर बंद किया हुआ . आँगन में एक चूल्हा नज़र आया.


मकान में घुस कर देखा तो दारुण ग़रीबी का दृश्य उपस्थित था . सामान के नाम पर कुछ भी तो नहीं . एक टूटी चारपाई मकान के बाहर और एक अंदर , जिस पर चिथड़े चिथड़े हो चुके बिस्तर और नीचे की फ़र्श टूट कर धूल धूसरित. शायद चूहों ने खोद रखी थी . खाने की रोटियाँ रखने को भी कोई बर्तन नहीं , प्लास्टिक की एक थैली पर खुले में रोटियाँ रखी थी . आटा रखने के लिए कनस्तर भी नहीं , पोलिथिन बैग में आटा रखा हुआ था , जिस पर से एक पुरानी परात झांक रही थी . ऊपर की ताकों में कपड़े जो कि पुराने हो चुके थे , वो बेतरतीब रखे हुये थे . 


एक दिया कल जलाया गया होगा , वह बुझा बुझा सा उदास रखा हुआ था , उसके पास ही खाने के एक लीटर तेल की बोतल दिखाई दी, कुछ और टूटे फूटे सामान भी थे , जो दरिद्रता और मजबूरी की कहानी बयान करने को काफ़ी थे .कुछ भी ऐसा सामान नहीं , जिसका उल्लेख किया जा सके. खाने के लिए थाली कटोरी तक भी नहीं दिखा. कमरे की पट्टियाँ टूट गई है , जिनको लकड़ी की थोगली लगा कर रोका हुआ था, कभी भी टूट कर ऊपर गिरने को तैयार .

 
गाँव के बाहर एक मकान जिसकी पट्टियाँ टूट गई है और साँप गोयरे जब चाहे घुस सकते हैं . पाँच दिन पहले भी एक काला नाग घुस आया तो बच्चे पड़ोसियों के यहाँ शरण लिए रहे . घर में दिन में भी अंधेरा था , रात में तो घनघोर अंधेरा रहता होगा, क्योंकि इस बीपीएल परिवार का बिजली बिल छह हज़ार आने के बाद बिजली विभाग के कर्तव्य निष्ठ कर्मचारियों ने कनेक्शन काट दिया है और मीटर भी उखाड़ ले गये. तब से यह परिवार अंधेरे को ही अपनी नियति समझ बैठा है .


पिता की बीमारी से डेथ हो गई और माँ भी दो महीने बाद ही नाता विवाह करके छोड़ गई, पीछे बच गए पाँच बेसहारा, जिनमें तीन लड़कियाँ और दो लड़के. सब नाबालिग . सबसे बड़ा चौदह बरस का और सबसे छोटी गुड़िया चार साल की . शुरुआत में भाई बंधुओं ने साथ रखा , मदद भी की .पर विगत दो साल से सबने छोड़ दिया. सरकार से मिलने वाली पालनहार योजना की मदद भी रुक गई. सिर्फ़ राशन के गेहूँ मिलते रहे. बस उसी के सहारे जैसे तैसे जीवन जीने का संघर्ष करते पाँच बच्चे , न माँ न बाप और न ही किसी से मदद की आश !
लॉकडाउन के बाद तो स्थितियाँ और भी विकट हो गई. जब नौबत भूख से मरने की आ गयी तो दोनो भाई बाल मज़दूरी करने निकले. अब वे राजसमंद जिले में क्रेन पर छोटा मोटा काम कर लेते है और खेलने खाने की उम्र में घर चलाने का अभ्यास कर रहे हैं .


एकदम हाशिये के इस परिवार की मर्मांतक हालात को आनंद जी ने लिखा और दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया, तभी लोग जान पाये कि ऐसी विकट हालात में पाँच अनाथ बच्चे ज़िंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं . मैं भी जानकर अंदर तक हिल गया और तय किया कि यह प्रकाश पर्व तभी सार्थक है , अगर इन बच्चों की ज़िंदगी के संघर्ष में सहभागी बना जाये और इस अंधरे घर में उम्मीद का एक दीप जलाया जाये.
आज का दिन उम्मीदों के सफ़र का था. हम तो पहुँचे ही , हमारे तुरंत बाद में क्षेत्रिय विधायक के निर्देश पर नायब तहसीलदार सोहन जी बैरवा भी पहुँच गये , बच्चों के लिए मिठाई व अन्य सामग्री लेकर, इसके बाद सरपंच प्रतिनिधि देबी लाल जी गुर्जर भी राशन लेकर आये . थोड़ी ही देर बाद पंचायत समिति से पवन मंडोवरा जी भी कपड़े, कम्बल, राशन किट और मिठाई आदि बहुत सारा सामान ले कर आ गये.युवा उध्यमी शंकर जी राव भी आये . उन्होंने मकान की मरम्मत की ज़िम्मेदारी ली और जयपुर से आये एक अन्य भामाशाह ने भी मदद हेतु हाथ बढ़ाया.
आज जो तुरंत सहयोग हो सकता था, वह तो हर तरह से दिया ही गया है .

बाकी भी पूरी मदद के लिए विधायक जी , उपखंड अधिकारी जी और तहसीलदार जी तथा विकास अधिकारी जी ने आश्वस्त किया है कि भविष्य में कोई समस्या इन बच्चों को नहीं आने दी जायेगी.
बच्चों का एक खाता भी खोल दिया गया है , जिसमें शाम होने तक कईं साथी मदद भेज चुके है . ग्राम पंचायत ने पट्टा बनाने की ज़िम्मेदारी ली है . रुकी हुई पालनहार की राशि को नियमित करने का काम मंगलवार को होगा. प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत मकान बनवाया जायेगा और स्कूल छोड़ चुके बच्चों को पुन: शिक्षा से जोड़ दिया जायेगा.

 
गणेशपुरा के युवा समाजसेवी शोभा लाल जी जाट , प्रकाश जी , राजू जी तथा ईमित्र संचालक महेंद्र मेघवंशी सहित कईं युवाओं ने यह भी वादा किया कि वे हर तरह से भाग दौड़ करके इस परिवार को सहायता दिलाने का काम करेंगे. निकटवर्ती भीमड़ियास ग्राम पंचायत के वार्ड पंच बद्री विशाल जी भामाशाहों के ज़रिए इनकी आर्थिक मदद के लिए भी प्रयासरत हैं. 
कुल मिलाकर गणेशपुरा के इन वंचित बच्चों के लिये दिन भर किए गये प्रयासों के सफल परिणाम के पश्चात घर लौट कर अब मन को सुकून है और ऐसा लग रहा है कि जैसे इस साल की दीवाली ठीक से मन गई है .
सब मित्रों और सहयोग करने वालों का दिल से शुक्रिया !
 

( संपादक – शून्यकाल डॉटकॉम )

Leave A Reply

Your email address will not be published.