क्या कबीर, गोरख और नानक यही चाहते थे ?

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 ( संजय श्रमण )

कबीर क्या अब भी गरीबों दलितों आदिवासियों के लिए क्रान्ति की मशाल बने हुए हैं? यह सवाल बहुत जटिल और खतरनाक है. इसका उत्तर खोजने की बड़ी इच्छा होती है. कबीर को मानने और जानने वालों से गहराई से चर्चा कीजिये तो पता चलता है कि जिस तरह बुद्ध का ब्राह्मणीकरण हुआ है उससे ज्यादा कबीर, नानक और गोरख का ब्राह्मणीकरण हुआ है. कबीर, गोरख और नानक इस खतरे के लिए शायद उतने सावधान नहीं थे जितने बुद्ध और महावीर थे. या शायद बुद्ध और महावीर वेदान्त के पूर्व के हैं और उन्होंने सावधान होने की इतनी आवश्यकता ही अनुभव न की थी. फिर भी वे पूरी तरह पचा लिए गये या उखाड़ दिए गये.


लेकिन कबीर को तो पता था कि वेदान्त कैसे खेल रचता है? बुद्ध और महावीर शायद कृष्ण, गीता, रामायण, महाभारत आदि से पुराने हैं. इसलिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है लेकिन हम कबीर के बारे में क्या सोचें? जो काशी जैसी पाखंड की राजधानी में रहते हुए वेदान्तिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए शूद्रों, अछूतों और गरीबों से बात कर रहे हैं. आज भी गाँव में जाकर गरीबों से बात कीजिये. कबीरपंथियों से बात कीजिये जो कि अधिकतर दलित हैं. उनकी चर्चा से सामाजिक विषमता, शोषण और भेदभाव की टीस और सामाजिक बदलाव की बात सिरे से गायब हो गयी है.


वे सामान्य चर्चाओं में इस दर्द को जाहिर नहीं करना चाहते बल्कि ध्यान, भजन, सुमिरन की चर्चा करते पाए जाते हैं. यही कुछ बौद्धों के साथ हो रहा है, वे भी ध्यान, समाधी, विपस्सना और निर्वाण में जरूरत से ज्यादा खोते जा रहे हैं. कबीरपंथी, सतनामी, राधास्वामी, निरंकारी, जय गुरुदेव इत्यादि सभी पंथ जो किसी तरह संत परम्परा से प्रेरणा लेते हैं अब वे गरीब दलितों को भाग्यवादी और परलोकवादी बनाने के सबसे खतरनाक अड्डों में बदल गये हैं. ग्रामीण दलित सत्संगियों से बात कीजिये. वे मांसाहार, बीडी, शराब छोड़कर अपने ही परिवार और जाति में एक नई जाति बनाकर बैठ गये हैं. अब खाली समय (जो एक मजदूर समाज के लिए दुर्लभ है) में सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक समस्याओं पर चर्चा नहीं करते.


अब खाली समय में वे ‘सत्संग’ करते हैं. नाम सुमिरन, भक्ति, शब्द-साधना, पुनर्जन्म, गुरु वंदना, सुन्न महल, बंकनाल, कुण्डलिनी इसकी चर्चा करते हैं. थोड़ा कुरेदो तो पता चलता है कि स्थानीय आश्रम या डेरे में सवर्ण द्विज हिन्दू उनसे भेदभाव करते हैं. उनसे साफ़ सफाई का गंदा काम करवाते हैं जिसे वे ‘सेवा’ कहते हैं. सवर्ण हिन्दू ये काम नहीं करते. आश्रमों के भीतर सब साथ बैठकर खाते पीते और भजन करते हैं लेकिन आश्रम की दीवार के तुरंत बाहर छुआछूत शुरू हो जाता है. आश्रम के भीतर थोड़ी सी इंसानियत और समानता मिलती है उसी के लालच में ये इन डेरों और बाबाओं के गुलाम हुए जा रहे हैं.


नई पीढ़ी के युवा और शिक्षित गरीब दलित भी बड़े हैरान होते हैं कि ये क्या चक्कर है. लेकिन आश्रम में प्रवचन होते हैं कि पञ्च तत्व की सबकी काया, एक नूर के सब बन्दे, सबका मालिक एक, सब एक रब की संतान इत्यादि इत्यादि, इसे सुनकर गरीब बड़े खुश होते हैं और उनका असंतोष बड़ी सफाई से खत्म कर दिया जाता है. लेकिन समाज में जमीन पर कदम रखते ही उनका शोषण दुगुनी रफ़्तार से शुरू हो जाता है. यह सबसे सूक्ष्म और चमत्कारिक बदलाव है. शोषित भी खुश और शोषक भी खुश.
कबीर की आजकल प्रचलित तस्वीरें देखिये. वे बलकुल वेदांती पंडित की तरह एक भक्त की तरह वैष्णव या अन्य पारम्परिक साधू की तरह चित्रित होते हैं. मोर मुकुट, कंठी माला, मस्तक पर तिलक या आशीर्वाद की मुद्रा में भजन करते हुए बैठे हैं. ऐसी तस्वीरों को देखकर सीधा निर्वाण और मोक्ष ही ख्याल में आता है उनका सामाजिक दर्शन क्या है इसकी कोई जिज्ञासा ही नहीं उठती. कितनी सफाई और होशियारी से कबीर और कबीर की विरासत को ब्राह्मणवाद के पक्ष में खड़ा कर दिया गया है. ये सच में चमत्कार है.


इस सबका क्या मतलब है?
जिन दलितों को समाज राजनीति और मालिक मजदूर संबंध बदलने के लिए संगठित होना चाहिए वे बाबाओं के चक्कर में भजन कीर्तन कर रहे हैं. और बाबा लोग राजनेताओं और उद्योगपतियों के साथ मिलकर व्यापार,राजनीति और कूटनीति चला रहे हैं. ऐसे में समाज में बदलाव कैसे होगा? क्या कबीर यही करना चाहते थे? आज कबीर ये सब देखते तो क्या सोचते?

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