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घरों को मकानों में तब्दील कर रही है महिलाओं के साथ बढ़ती घरेलू हिंसा

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( महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा का विश्लेषण करता महत्वपूर्ण आलेख )

( हेमलता शर्मा )

लॉकडाउन के समय में लगभग पूरी दुनिया में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा ज्यादा बढ़ी है,कोरोना काल ने महिलाओं के सामान्य जीवन पर बहुत गहरा असर डाला है .घरों के भीतर होने वाली हिंसा इतनी दर्दनाक है कि सोचते हुए ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.हिंसा के ऐसे ऐसे प्रकार कि सुनकर रूह कांप जाती है .

“घर” जिसमें रहने वाले लोग प्रेम,सहयोग,सम्मान,त्याग जैसे जीवन मूल्यों से मकान को घर बनाते हैं .एक ऐसी जगह जहाँ  हम सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं,और अगर उसी जगह पर आपके साथ हिंसा हो तो कैसा लगेगा ? जिन अपनों पर आप भरोसा करते हैं वो ही आप के साथ ऐसा बर्ताव करें जो रिश्तों की बुनियाद ही हिला कर रख दे . अगर अपने हैं तो फिर हिंसा जैसी मानसिकता कैसे हो सकती है अपने साथी के लिए और अगर हिंसा करने वाला अपना है तो वो अपना कहाँ हुआ ?

ऐसे कई सवाल हैं जो हम सब के आस पास कहीं न कहीं दिखाई व सुनाई देते हैं,पर हम खामोश, मूक दर्शक बने देखते हैं. महिलाओं के साथ हिंसा न सिर्फ उनके  शरीर पर बल्कि मन और आत्मा पर भी  गहरी चोट पहुंचाती है.एक ऐसा घाव देती है जो रिश्ते और स्थितियां सामान्य हो जाने पर भी भीतर ही भीतर नासूर बन कर दुखता रहता है.

यूएन वीमेन की अप्रैल 2020 में आई एक  रिपोर्ट “ वोइलेंस अगेंस्ट वीमेन एंड गर्ल्स : द शैडो पेन्डेमिक” के अनुसार “पूरी दुनिया के लगभग 90 देशों में लॉकडाउन की स्थिति में एक नया खतरा बना महिलाओं के साथ घरों में हो रही हिंसा . कई देशों की महिलाओं के लिए काम कर रही हेल्पलाइन्स पर घरेलू हिंसा के मामले अधिक दर्ज कराये गए.कनाडा , फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में भी इस तरह के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई .

सिंगापुर और साइप्रस  की हेल्पलाइन्स पर 30 प्रतिशत ज्यादा मामले एवं आस्ट्रेलिया में 40 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है . यदपि कोविड-19 के पहले भी महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा मानव अधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है.पिछले एक साल में (2019) पूरी दुनिया में 243 मिलियन महिलाओं और बालिकाओं (15-49वर्ष ) के साथ शारीरिक एवं यौनिक हिंसा के मामले दर्ज हुए . लॉकडाउन की स्थिति ने मामलों को कई गुना बढ़ा दिया है.सामान्य स्थिति में 40 फीसदी हिंसा पीड़ित महिलाओं में से मात्र 10 प्रतिशत ही पुलिस के पास मदद  के लिए पहुंचती है.

लॉक डाउन की स्थिति में जब महिलाएं घरों में रहने को मजबूर हैं तब हालात और भी गंभीर नज़र आते हैं” . यूएन  सेक्रेटरी जनरल ने सभी सदस्य  देशो की सरकारों को इस स्थिति से निपटने के लिए अहम् कदम उठाने के लिए कहा है . भारत में भी राष्ट्रीय महिला आयोग ने लॉकडाउन समय के दौरान चिंतनीय स्थिति को देखते हुए एक हेल्पलाइन की शुरुआत की थी .घरेलू हिंसा झेल रही महिलाएं या बालिकाएं इस न. पर व्हाट्सअप मैसेज कर मदद ले सकती हैं. (राष्ट्रीय महिला आयोग हेल्पलाइन -0721-7735372) 

बात करें राजस्थान की स्थिति पर तो प्रदेश के महिला सुरक्षा एवं सलाह केन्द्रों पर पिछले कुछ महीनों से बड़ी तादाद में आ रहे घरेलू हिंसा के मामले दर्शाते हैं कि प्रदेश में भी लॉकडाउन के समय में घरेलू हिंसा ज्यादा बढ़ी है कोरोना काल ने महिलाओं के सामान्य जीवन पर बहुत गहरा असर डाला है .

सामाजिक कार्यकर्त्ता एवं डब्ल्यू. आर. जी. संस्था की सचिव डॉ.रेणुका पामेचा का कहना है कि “प्रदेश में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं , लॉकडाउन की स्थिति ने महिलाओं के जीवन स्तर को कई प्रकार से प्रभावित किया है .राजस्थान में महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा का आकलन प्रदेश के एम.एस.एस.के. पर  आने वाले मामलों से लगाया जा सकता है.प्रदेश में रिलीफ मैकेनिज्म बहुत कमज़ोर स्थित में है,प्रदेश में संस्थागत फ्रेमवर्क और मोनिटरिंग सिस्टम की कमी है.

राजस्थान राज्य महिला आयोग का पद ही पिछले डेढ़ साल से खाली है. कोविड-19 के चलते महिलाओं के लिए आश्रय स्थल बंद हैं. लॉकडाउन के दौरान घरों से न निकलने की स्थिति के कारण, गरीब तबके की महिलाओं का ऑनलाइन शिकायत की सुविधा तक पहुँच न हो पाना , शराब की दुकानों का खुल जाना ,रोज़गार ख़त्म होना ,माईग्रेशन इत्यादि कारणों ने महिलाओं पर शारीरिक , मानसिक, यौनिक , भावनात्मक,  आर्थिक हिंसा, जैसी  कई तरह की घरेलू हिंसा को बढ़ाया है”.

एम.एस.एस.के. जयपुर पूर्व  पर महिलाओं से हुई बातचीत में निकल कर आया कि घर की चारदीवारी के भीतर होने वाली हिंसा आपको भीतर तक झकझोर देती है ,जिन्हें अपने कहा जाता है वो ही हिंसा करते हैं . क्या ऐसे लोग अपने हैं ?क्या ऐसी जगह जहाँ घर के भीतर हिंसा होती है उसे घर-परिवार कहा जाये . कई मामले तो बच्चियों के साथ घरों में यौन उत्पीडन के भी थे पिता द्वारा यौन उत्पीडन . रक्षक ही भक्षक बन जाये ऐसी जगह घर कैसे हो सकती है. 

महिलाओं के कई अधिकारों को प्रभावित करती है घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा महिलाओं को उनके कई अधिकारों से वंचित कर देती है. उनके जीवन के समग्र विकास में बहुत बड़ी बाधा है . मानव अधिकार, सम्मान के साथ जीने का अधिकार,जीवन एवं स्वतंत्रता का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार,आजीविका का अधिकार,समान क़ानूनी संरक्षण का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, विचार अभिव्यक्ति का अधिकार, शिक्षा का अधिकार इत्यादि. एक भी महिला के साथ यदि घर में हिंसा होती है तो यह उसके मानव अधिकारों का उल्लंघन है. यह भारत के संविधान द्वारा प्रद्दत समानता के अधिकार(अनुच्छेद 14,15,16 ) एवं सम्मान के साथ जीने के अधिकार(अनुच्छेद 21) का अतिक्रमण होने के साथ अपराध भी है. घर जिसे सबसे सुरक्षित जगह कहा जाता है, जब महिलाएं घर के भीतर ही महफूज़ नहीं हैं तो एक  यक्ष प्रश्न समाज के सामने उठता है कि आखिर महिलाएं जायें तो जाये कहाँ ?

घरों में होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत करने वाली ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने अपने आत्मसम्मान,स्वाभिमान के लिए घर से बाहर कदम रखा . प्रदेश के महिला थानों में सरकार ,महिला बाल विकास विभाग,पुलिस एवं महिलाओं के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं  के साझा प्रयासों से  संचालित महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र इस दिशा में अहम काम कर रहे हैं .

एम.एस.एस.के.जयपुर पूर्व के  पिछले 5 वर्षों के आकंड़ो का अध्ययन करने पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये .कई प्रकार की हिंसा और उत्पीडन के मामले बेहद शर्मनाक एवं दर्दनाक हैं . हिंसा के स्वरूपों का यहाँ ज़िक्र नहीं कर रही हूँ. क्यों कि इतनी तरह की हिंसा को जान कर मन उद्वेलित हो उठेगा . किन्तु लगभग 250 तरह के हिंसा के प्रकार इन मामलों में देखने को मिले . समाज के सामने कई  सवाल खड़े करती  हिंसा की ये तस्वीर बेहद चिंतनीय है.

      पिछले 4 वर्ष की रिपोर्ट्स के आधार पर केंद्र पर आये घरेलू हिंसा के मामले  

  क्रम संख्या     वर्ष घरेलू हिंसा के मामले 
      1     2015         331
      2     2016         449
      3    2017        387
      4    2018      380  
      5    2019        690 
      6जुलाई 2020तक         291
कुल        2,528

                      ( स्रोत : महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र जयपुर पूर्व की वार्षिक रिपोर्ट्स  )

नीचे की तालिका में दर्शाए आंकड़े केंद्र के  4 वर्षों के हैं . ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं लम्बे समय तक हिंसा सहन करती रहती हैं, जब स्थिति असहनीय हो जाती है तब कहीं जाकर घर से बाहर निकल कर मदद के लिए जाती हैं .हिंसा सहते रहने से उनमें खुद पर अविश्वास पैदा हो जाता है .जब स्थिति गंभीर हो जाती है तब महिलाएं घर से बाहर किसी से मदद मांगती है.

     ( लम्बे समय से हिंसा झेलने के बाद केंद्र पर मदद के लिए आने वाली महिलाओं के आंकड़े )

क्रम संख्यावर्ष5 वर्ष से अधिक समय से हिंसाझेल रही महिलाएं
1201592
22016131
32017133
42018132
कुल488

                                        स्रोत : महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र जयपुर पूर्व की वार्षिक रिपोर्ट्स  

हिंसा का महिलाओं के मानसिक स्वाथ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है 

एम.एस.एस.के.जयपुर पूर्व पर आये मामलों में महिलाओं पर होने वाली  हिंसा के विविध प्रकार देखे जा सकते हैं . ये गालीगलौज जैसी शाब्दिक हिंसा से लेकर यौन उत्पीडन एवं हत्या तक के मामले हैं. जब महिलाऐं अपना दर्दभरा अनुभव बांटती हैं तो हिंसा के नाना प्रकार चौंकाते हैं.

शारीरिक एवं मानसिक हिंसा की ऐसी भयावहता सामने आती हैं जो महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखने की समाज की सोच दर्शाती है. लम्बे समय तक हिंसा सहन करने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर प्रभाव पड़ता है.

एम.एस.एस.के.जयपुर पूर्व की काउंसलर तनुजा का कहना है कि “केंद्र पर आई महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को जानने के बाद यह बात निकल कर आई की महिलाओं पर इस हिंसा का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है .शारीरिक एवं मानसिक क्षमताएं प्रभावित होती हैं.अधिकांश महिलाओं में मानसिक दबाव उनके  प्रति हिंसा तथा यौन दुराचरण के कारण हैं .महिलाओं में डिप्रेशन ,नींद न आना , आत्महत्या की उद्भावना ,विचार आदि देखने में आते हैं . मानसिक तनाव कई और रोगों की बड़ी वजह बनता है . महिलाएं लगातार हिंसा झेलने के कारण अकेलापन महसूस करने लगती हैं”

इस प्रकार की स्थितियां उन्हें मानसिक रूप से कमज़ोर बना देती हैं .परिजनों को व स्वयं महिलाओं को इस दिशा में जागरूक होने की ज़रूरत है . अगर अवसाद या डिप्रेशन लम्बे समय तक बना रहे तो कई गंभीर मानसिक रोगों को जन्म दे सकता है. मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अभी उतनी जागरूकता भी नहीं है कि खुल कर इस विषय पर महिलाएं या उनके परिजन बात करें .लगातार मानसिक स्वाथ्य जैसे अहम विषय के साथ साथ कानूनी जागरूकता की भी आवश्यकता है ,ताकि महिलाओं व आमजन में जागरूकता आ सके .काउन्सलिंग व मनोचिकित्स्कीय काउन्सलिंग की व्यवस्था बढ़ाये जाने की ज़रूरत है, ताकि उन्हें डिप्रेशन व अवसाद की स्थितियों से बाहर निकाला जा सके.

इन आंकड़ो को देख कर लगता है कि ये वो हिम्मत वाली महिलाएं है.  जो हिंसा का विरोध करने के लिए घर से बाहर निकल पाई. अनेकों ऐसी महिलाएं होंगी जो आज भी  घरों में हिंसा सहन कर घुटन भरा जीवन जीने के लिए मजबूर होंगी. ऐसी विकट  परिस्थितियों में सही मायने में महिलाओं की मदद के लिए और ज्यादा मज़बूत मैकेनिज्म, की आवश्यकता है. समाज की यह स्थिति बहुत चिंतनीय है. इस स्थिति में सुधार लाने की हम सबकी और सरकार की साझी ज़िम्मेदारी है. 

( लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता है )

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