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लोकतांत्रिक समाजों की कुछ श्रेणियां

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दुनिया के जो विकसित देश हैं संभवतः बिना अपवाद सभी लोकतांत्रिक देश हैं। भारत में बहुत लोगों को यह गलतफहमी रहती है कि चीन एक विकसित देश है, इसलिए यहां यह बताना उचित समझता हूं कि चीन विकासशील देश है, विकसित देश होने की शर्तों को पूरा कर पाने की अभी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है जबकि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जीडीपी तथा तीसरी सबसे मजबूत सैन्य शक्ति वाला देश है। यहां तक कि रूस भी विकसित देशों की श्रेणी में नहीं आता है।


दुनिया के ऐसे कई देश विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं जिनकी या तो अपनी सेना नहीं है या बहुत ही छोटी सेना है। सैन्य शक्ति यदि किसी देश के विकसित होने का मानदंड होती तो पाकिस्तान दुनिया के सबसे विकसित देशों में से होता तथा जापान जैसे देशों के लिए विकासशील देशों से भी बहुत नीचे की श्रेणियां बनाई जातीं।


किसी देश की जीडीपी बढ़ने से देश विकसित नहीं हो जाता। यदि ऐसा होता तो जिन देशों की जनसंख्या बड़ी है वे देश बिना कुछ किए धरे ही विकसित देश बन गए होते। क्योंकि बड़ी जनसंख्या भी बड़ी जीडीपी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।


विकसित देश होने का सीधा संबंध उस देश की वास्तविक व जमीनी इकोनोमी से होता है, उस देश के लोगों के जीवन स्तर से होता है। यही कारण है कि न्यूजीलैंड जैसे बहुत ही छोटे देश व नीदरलैंड जैसे बहुत ही अधिक जनसंख्या घनत्व वाले देश भी विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं।


दरअसल विकास के मतलब बाजार का विकास होना नहीं होता। विकास होता है तो बाजार का विकास स्वतः होता है। बाजार का विकास होने से विकास का आगमन नहीं होता। लेकिन अपरिपक्व समाजों व इन समाजों के लोगों को यह बारीक समझ नहीं होती, इसलिए ऐसे समाज विकास के नाम पर सत्ताओं व तंत्रों के हाथों अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख देने में भी गौरव का अनुभव करते हैं।कोई भी समाज अंदरूनी लोकतांत्रिक परिपक्वता के बिना विकसित हो ही नहीं सकता, असंभव है।

परिपक्व विकसित समाज/देश


दुनिया के जितने भी परिपक्व समाज हैं, वे दुनिया के लिए चाहे जैसे हों, लेकिन अपने देश के अंदर बहुत अधिक लोकतांत्रिक हैं, मानवाधिकार सर्वोच्च प्राथमिकता के मूल्यों में से होते हैं। मानवाधिकारों का न्यूनतम आर्गनाइज्ड उल्लंघन करते हैं।


दुनिया के अधिकतर विकसित देशों में राज्य अपने आप में कुछ बिंदुओं को छोड़कर लगभग पूरी तरह से स्वायत्त होते हैं। देश के संविधान से अलग राज्यों के अपने संविधान होते हैं। कुछ तो ऐसे देश हैं जहां राज्यों की अपनी स्वतंत्र संसद होती है। राज्यों के अपने चुनाव आयोग होते हैं जो राज्यों में होने वाले चुनावों के लिए जिम्मेदार होते हैं। राज्यों की विधानसभा/संसद का चुनाव देश का चुनाव आयोग नहीं करवाता है।


एक राज्य के निवासी के लिए दूसरे राज्य जहां का वह निवासी नहीं है, राज्य के द्वारा मिलने वाली शर्ते व सुविधाएं बदल जाती हैं।दुनिया में कई विकसित देश तो ऐसे हैं जहां राज्यों का स्तर अपने आप में स्वतंत्र देशों जैसा है। हम भारतीयों में बहुत भारतीय इन देशों के राज्यों को देश के रूप में मानते हैं। यहां तक कि हमारे विश्वविद्यालयों तक में भी हमें गलत जानकारी पढ़ाई जाती है।


यह इन समाजों व लोगों की परिपक्वता ही है जो स्वतंत्र व स्वायत्त होते हुए भी एक देश के रूप में बिना हिंसा, बिना दबाव व बिना बर्बरता के एक दूसरे के साथ मजबूती से जोड़े रखती है। समाज में परिपक्वता व विकसित होने की बुनियाद नफरत की बजाय सम्मान व प्रेम से पड़ती है।


अपरिपक्व समाज/देश

लोगों की मानसिकता सामंती होती है, लोकतंत्र का मायने नहीं समझते हैं। इनको यही लगता है कि लोकतंत्र विकास में सबसे बड़ी बाधा है। केंद्रीय व तानाशाही चरित्र की सत्ता पर विश्वास करते हैं। नौकरशाही को अनाप-शनाप सुविधाएं व अधिकार होते हैं। आम लोगों के प्रति सम्मान का भाव नहीं होता है।


आम लोगों को शोषित करने के आधार वाला भ्रष्टाचार होता है, भ्रष्टाचार समाज में स्वीकार्य, प्रतिष्ठित व प्रशंसनीय  भी होता है। भ्रष्ट लोग आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। भ्रष्ट लोग नेक्सस के बाहर व आम आदमी के सामने अपने आपको ईमानदार के रूप में प्रस्तुत करने का ढोंग करते हैं, पूरी निर्दयता के साथ। 


निर्दयता का भीषण स्तर यह कि नेक्सस के लिए तो बड़े से बड़ा गलत काम करने को प्रतिबद्ध व तत्पर लेकिन नेक्सस के बाहर व आम लोगों के समक्ष सही काम करने में भी खुद को ईमानदार साबित करने के चक्कर में ईमानदारी का इतना ढोंग करते हैं कि आम आदमी खून के आसूं रो देता है। समाज के लिए हितकारी कामों को उपेक्षित करते हैं, तिरस्कृत करते हैं।ऐसे समाज के लोग यदि समझदारी की ओर नहीं बढ़ते हैं तो फूहड़/बेहूदा समाज बनने की ओर बढ़ जाते हैं।

फूहड़/बेहूदा समाज/देश
अपरिपक्व समाज जैसे चरित्र के तो होते ही हैं साथ ही नफरत में सराबोर रहते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करने, मानवाधिकारों का उल्लंघन करने, सामाजिक नैतिकता का पतन करने में गौरव अनुभव करते हैं। तालियां पीटते हैं। नफरत में इस कदर डूबे रहते हैं कि न तो अपना सम्मान करते हैं न दूसरों का। नफरत के नशे में इस कदर डूबे रहते हैं कि समय के साथ भीषण रूप से बर्बर, क्रूर व हिंसक होते चले जाते हैं। साथ ही सत्ताओं व तंत्रों के हाथों में अपनी स्वतंत्रता गिरवी रखते चले जाते हैं, इसी में ही अपना विकास देखते हैं। 

  • सामाजिक यायावर

( चित्र – storybordthat से साभार )

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