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लोकदेवता बाबा रामदेव और अम्बेडकरी विचारधारा

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” लोक देवता बाबा रामदेव ( रामसा पीर ) के संदर्भ में या उनके मंदिर या उससे संबंधित संगठनों पर कुछ लिखा जाता है तो अंबेडकर विचारधारा के लोग मनुवादी चश्में से देखते हुए प्रतिरोध प्रकट करते हैं”
प्रथम दृष्टया उनका विरोध सही दिखता है. जहाँ भी मंदिर, देवता, पूजा-पाठ जैसे शब्द आ जाते हैं तो स्वभाविक है कि चश्मा मनुवाद का चढ ही जाता है, परन्तु जिसने भी लोक देवता बाबा रामदेव का जीवनवृत, व्यक्तित्व-कृतित्व, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, भौगोलिक स्थिति, शासन व्यवस्था और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया है तो फिर उसकी विचारधारा बिल्कुल बदल जायेगी.
बाबा रामदेव को पूरी तरह मनुवाद के चोले में इतना लपेट दिया गया है कि हम उनके अंदर के मनुवाद के विरोध को देख ही नहीं पाते, या यूँ कहें कि डॉ अंबेडकर से पहले किसी के भी व्यक्तित्व- कृतित्व को अंबेडकर विचारधारा से जोड़ ही नहीं पाते. यह सब तथ्यात्मक और सही जानकारी के अभाव का परिणाम है.
तथागत गौतम बुद्ध का जीवनवृत, बौद्ध धर्म की स्थापना और उनके बाद आर्यों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति भारत में घटित घटनाक्रम, डॉ अंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद भारत में बौद्ध धर्म का विकास, डॉ भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा का समग्र अध्ययन नहीं करने पर हम स्वत: ही बाबा रामदेव जी को मनुवादी व्यवस्था का ही एक अंग समझेंगे. कारण भी है कि बाबा रामदेव के व्यक्तित्व- कृतित्व को मनुवादियों ने अवतारवाद के चोले में लपेटकर छुपा दिया.रामदेव जी के अनुयायियों की आँखों में भी अवतारवाद, ब्राह्मणवादी व्यवस्था का चश्मा चढा दिया. उनके कार्यों को चमत्कार के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया गया.
बाबा रामदेव के मंदिर बहुतायत में बहुजन समाज के मोहल्लों बस्तियों में मिलते हैं. बहुजन समाज की आस्था का प्रतीक है. मेरा आग्रह है कि जब भी बाबा रामदेव के संबंध में कुछ कहा लिखा जाये तो जब तक विषय की परिस्थिति, समय, काल की जानकारी नहीं रखें तब तक एक पक्षीय विचार व्यक्त करना उचित नहीं रहता है.
आप आज के ही परिदृश्य को देखें- डॉ भीमराव अंबेडकर को आज मनुवादी किस दिशा में ले जा रहे हैं ? यह तो तब है जब डा अंबेडकर की विचारधारा, संविधान,और लोकतंत्र की उपस्थिति है. बाबा साहब के अनुयायियों को बाबा रामदेव के कार्यों का आंकलन तत्कालीन समाज, काल,परिस्थिति, स्थान,सामाजिक व्यवस्था, शासन व्यवस्था को देखते हुए करना पड़ेगा. हम उनके कार्यों को केवल इसलिए नहीं नकार सकते या महत्वहीन बता सकते क्योंकि मनुवादियों ने उन्हें मनुवादी आवरण में सदियों से लपेट रखा है.
बाबा रामदेव के बारे में तो लगभग 60-70 पहले ही शोध होने और लिखा जाने लगा है. उन्हें तो देवता के रूप में महिमामंडन कर सामंती लोग पैसा कमा रहे हैं. केवल 600 वर्ष पूर्व की अवधि है लेकिन बाबा रामदेव जी के जीवनकाल से संबंधित सभी जानकारियां दिग्भ्रमित कर दी गईं हैं. आज भी उनके जन्म, मृत्यु एवं कार्यों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारे विद्वान समीक्षा करते हैं तो मनुवादियों की घिग्घी बंध जाती है. आज तक भी किसी देवता ने अवतार लिया है ? लेकिन एेसा महिमामंडन कर दिया है कि अवतार को मन मस्तिष्क में बैठा दिया है.
आज भी हजारों-लाखों लोगों को यह तथ्यात्मक जानकारी नहीं है कि भादवा सुदी दशमी शुक्लपक्ष पर रामदेव मंदिरों में उत्सव क्यों मनाते हैं ? कैलेंडर इस दिन को रामदेव जयंती, रामदेव पुण्यतिथि लिखते हैं. कोई एकमत नहीं है. मेरे विरोध पर कई कैलेंडर अब केवल रामदेव मेला लिखने लगे हैं.रामदेव जी के कार्यों को चमत्कार के रूप में परोस दिया गया.
उल्लेखनीय है कि बाबा रामदेव जी ने तत्कालीन सामंतवादी व्यवस्थाओं के बीच धार्मिक भेदभाव, जात पांत, छुआछूत, का जमकर विरोध किया था. सामाजिक समानता के पक्षधर रहे हैं. बाबा रामदेव जी को उस समय का अंबेडकर भी कह सकते है ! बस हमें उनको समझना होगा और व्यक्तित्व-कृतित्व को मनुवादियों के चंगुल से बाहर निकाल कर बहुजन समाज के सामने प्रस्तुत करना होगा.
बाबा रामदेव कोई काल्पनिक रूप या नाम नहीं है, जो भी कुछ है मारवाड़ की धरा के भौतिक धरातल पर ही था. मनुवादियों के देवता जैसा कुछ भी नहीं है. आज यह प्रमाणिक रूप से कहा जा रहा है कि बाबा रामदेव दलित वर्ग के सूफी संत सायर जैपाल के जैविक पुत्र थे . बस हमें उनके मंदिर का नहीं उनके कार्यों एवं विचारों का प्रसार करना चाहिये .वैसे भी पोकरण के पास स्थित रुणेजा में बाबा रामदेव का सिर्फ मजार (समाधि स्थल ) है ,कोई मंदिर नहीं ,लेकिन विगत कुछ सालों से उनकी समाधि को मंदिर का रूप देकर मनुवादी तत्व जमकर फायदा उठा रहे है .

– डॉ गुलाब चन्द जिन्दल “मेघ”
अजमेर।

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