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वे उत्तर भारत के अम्बेडकर थे !

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आज महामना रामस्वरूप वर्मा का जन्मदिन है. आज ही के दिन 1923 में उन्होंने वर्तमान कानपुर देहात के गौरीकरन ग्राम को अपने जन्म से धन्य किया था. चार भाइयों में सबसे छोटे वर्मा जी ने यूं तो एक किसान परिवार में जन्म लिया था,पर परिवार की तरफ से शिक्षार्जन और अपनी पसंद का पेशा अख्तियार करने की उन्हें भरपूर छूट मिली थी. इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने 1949 में इलाहबाद विवि से हिंदी में एमए और कुछ दिनों बाद कानून की डिग्री ले ली. अल्प अन्तराल के मध्य वह भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में बैठे और उतीर्ण भी हो गए. किन्तु प्रशासनिक सेवा और प्रोफेसरी को लात मारकर उन्होंने राजनीति का कठिन क्षेत्र चुना.

1952 में वह भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ें पर मामूली अंतर से हार गए. किन्तु 1957 में वह भोगनीपुर से ही विधायक बनने में कामयाब रहे. बाद में वह 1967, 1969, 1980, 1989 और 1991 में भी विधायक बनने का अवसर पाए. डॉ.राम मनोहर लोहिया को वर्मा जी का जीवन के प्रति फकीराना नजरिया और ईमानदार व विचारशील व्यक्तित्व बहुत भाया और वे लोहिया के सबसे विश्वसनीय व वैचारिक मित्र बन गए. क्योंकि वह भी लोहिया की ही तरह देश और समाज के लिए कबीर की तरह अपना घर फूंकने वाले राजनैतिक कबीर थे.

वर्मा जी को मंत्री ,वह भी वित्तमंत्री भी बनने का अवसर मिला .1967-68 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सविद सरकार में वित्त मंत्री के रूप में 20 करोड़ के लाभ का बजट प्रस्तुत कर दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों तक को चौका दिया था. उन्होंने एक दूरगामी लक्ष्य के तहत 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना और ‘अर्जक साप्ताहिक’ का संपादन व प्रकाशन शुरू किया. अर्जक संघ अपने समय का सामाजिक क्रांति का ऐसा मंच था जिसने अन्धविश्वास पर न सिर्फ भरपूर हमला किया बल्कि उत्तर भारत में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की भांति सामजिक न्याय का बिगुल फूंका .इन कार्यों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें उत्तर भारत का आंबेडकर कहकर आदर दिया. उनके जीवन में एक और स्वर्णिम अध्याय तब जुड़ा जब 1971 में वह बिहार के लेनिन के नाम से मशहूर जगदेव प्रसाद के संसर्ग में आये.

1967 में शोषित दल की स्थापना करने वाले जगदेव प्रसाद भी वर्मा की तरह एक क्रांतिकारी नेता थे. उन्होंने सामाजिक क्रांति की व्याख्या करते हुए कहा था-” सामाजिक क्रांति का मतलब है –विशेष अवसर का सिद्धांत”.विशेष अवसर के सिद्धांत को साकार करने के लिए लोहिया ने कहा था-’राजनीति, व्यापार, पलटन और ऊँची नौकरियों में शोषितों के लिए 60 सैकड़ा स्थान सुरक्षित कर देना चाहिए’ किन्तु लोहिया के विपरीत जगदेव प्रसाद ने इसके लिए उपरोक्त क्षेत्रों में 90 प्रतिशत स्थान सुरक्षित करना अनिवार्य माना था. सामाजिक क्रांति के इसी सपने को साकार करने के लिए जगदेव प्रसाद और वर्मा जी साथ मिलकर 7 अगस्त,1972 को लिखित सिद्धांत ,कार्यक्रम , नीति और विधानवाला’शोषित समाज दल ‘ की स्थापना किया .दल के सिद्धांत, वक्तव्य,कार्यक्रम और विधान की धारा-7 में लिखा गया गया था-’शोषितों का राज ,शोषितों के द्वारा, शोषितों के लिए ही सही जनतंत्र हैं. इसी धारा में शक्तिसंपन्न सवर्णों से दूरी बनाये रखने के लिए स्पष्ट तौर से लिखा गया था,’ किसी भी स्थिति में शोषित समाज दल का नेतृत्व उच्च वर्णीय लोगों के हाथों में नहीं रहेगा. सत्ता में आने पर शोषित समाज दल इसी नीति का दृढ़ता से अनुसरण करेगा. मुख्यतः अनुसूचित जाति / जनजाति, मुसलमान तथा अन्य अल्पसंख्यक और पिछड़े लोग शोषित हैं.

शोषितों की तादाद भारत में सौ में नब्बे है. दस सैकड़ा शोषक (सवर्ण) बनाम 90 प्रतिशत शोषित (बहुजन) की इज्जत और रोटी की लड़ाई ही इस मुल्क के लिए समता की असली लड़ाई है.दस सैकड़ा आज जिदगी के हर क्षेत्र में छाये हुए हैं जिससे 90 सैकड़ा शोषित बेइज्जती और गैर-इंसानी जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हैं.शोषित समाज दल का विश्वास है कि सामाजिक क्रांति के बगैर आर्थिक क्रान्ति नहीं हो सकती. इसके लिए जरुरी है कि नब्बे सैकड़ा शोषितों के लिए जिंदगी के हर क्षेत्र में नब्बे सैकड़ा जगहें और इंसानी बराबरी हासिल की जाय.’

शोषित समाज दल के घोषणापत्र की धारा 12,13,14 में छोटे बड़े सभी उद्योगों के उत्पादन, विनिमय और वितरण में समान भागीदारी की बात कही गयी है .धारा 14 में उल्लेख है-‘तस्करी ,करवंचना, मिलावट, फर्जी उद्योग-धंधों, कालाधन को समाप्त करने एवं मानववाद के आर्थिक प्रकटीकरण के रूप में समाजवाद लाने के लिए शोषित समाज दल राष्ट्रहित को देखते हुए वस्तुओं के वितरण का समाजीकरण करेगा.’ किन्तु सामाजिक क्रांति के मुकम्मल सूत्रों से लैश ‘शोषित समाज दल’ विविध कारणों से भारतीय राजनीति पर अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाया. इसका सबसे बड़ा कारण बिहार के लेनिन जगदेव प्रसाद का असामयिक निधन रहा ,जिन्हें 5 सितबर,1974 को एक आन्दोलन का नेतृत्व करते समय शोषको ने साजिश कर गोलियों से उड़ा दिया. बहरहाल जगदेव प्रसाद के संगी वर्मा जी को इस बात का भारी अफ़सोस रहा कि 93 प्रतिशत उद्योग-व्यापार पर दस प्रतिशत शोषकों का कब्ज़ा है, जबकि दस प्रतिशत शोषित 7 प्रतिशत पर गुजर-बसर करने के के लिए मजबूर हैं. वर्माजी ने निष्कर्ष दिया था कि अर्जकों की सबसे बड़ी समस्या निरादर और दरिद्रता है.अफ़सोस की बात है कि उनके अनुसरणकारियों ने मुख्य जोर निरादर की समस्या के निराकरण पर दिया.वे भूल गए कि आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से उपजी दरिद्रता के जठर से निरादर,भूख-कुपोषण,विछिन्नता इत्यादि तमाम समस्यायों की सृष्टि होती है.

रामस्वरूप वर्मा उत्तर भारत के सर्वाधिक चिंतनशील व विद्वान राजनेता रहे .उनके विचार मौलिक थे, किन्तु वह डॉ. आंबेडकर, मार्क्स ,चार्वाक और बुद्ध के विचारों से प्रभावित रहे. उन्होंने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिनमें- क्रान्ति क्यों और कैसे , ब्राह्मणवाद का शव ,अछूत समस्या और समाधान, मनुस्मृति :राष्ट्र का कलंक , ब्राह्मण महिमा :क्यों और कैसे ! निरादर कैसे मिटे, आंबेडकर साहित्य की जब्ती और बहाली, मानववादी प्रश्नोत्तरी का खास स्थान है. आज भारत में जिस तरह नयी सदी में शोषकों का नए सिरे सर्वत्र वर्चस्व कायम हुआ है, वर्मा जी की बहुत जरुरत थी. वह रहते तो इनसे लड़ने के लिए शोषितों का समुचित मार्ग दर्शन करते.

-एच.एल.दुसाध
( लेखक जाने माने बहुजन चिन्तक है )

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