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हर्षोल्लास से मनाई छत्रपति शाहूजी महाराज की 143वीं जयंती

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सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत व आरक्षण के जनक छत्रपति शाहूजी महाराज की 143वीं जयंती पर राजस्थान के सीकर जिले के नीमकाथाना कस्बे में मीना धर्मशाला में डॉ. अम्बेडकर मिशन एवं आदिवासी सार्थक विचार मंच द्वारा संगोष्ठी का आयोजन किया गया. जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में मुझे आमंत्रित किया गया. इस संगोष्ठी में सीकर जिले के लगभग 80 प्रबुद्ध नागरिकों ने भाग लिया.
कार्यक्रम के आरम्भ में छत्रपति शाहूजी महाराज की तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया. इसके बाद वक्ताओं ने अपनी बात शुरू की. छत्रपति साहूजी महाराज के बारे में बताते हुए मुख्य वक्ता गोपाल राम वर्मा ने खा की आज ही के दिन 1874 को छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म हुआ और कोल्हापुर के महाराज बने. वर्मा ने कहा कि छत्रपति शाहूजी महाराज पहले भारतीय थे, जिन्होंने अपनी रियासत में 26 जुलाई, सन 1902 को सरकारी नौकरियों में दलित, आदिवासी एवं पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की. वे सामाजिक न्याय के पक्षधर थे, उन्होंने प्राचीन काल से चली आ रही बेगार प्रथा से दलितों को मुक्ति दिलाई. उन्होंने रुढ़िवादी परम्पराओं, छुआ-छुत, अन्धविश्वास जैसी सामाजिक बुराईयों के नीचे दबे-कुचले समाज को शिक्षा की नई रोशनी दी तथा गैरबराबरी और भेदभाव को दूर करने के लिए हजुर कार्यालय नामक सचिवालय की स्थापना की.
शाहूजी महाराज ने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की, अछूतों की शिक्षा के प्रति लगाव बढ़ाने के लिए उनकी फीस माफ़ करवाई तथा स्कोलरशिप देने की व्यवस्था की. गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए. इनके शासन के दौरान “बाल विवाह” पर प्रतिबंध लगाया तथा अंतरजातीय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के समर्थन की आवाज उठाई. उन्होंने राज्यादेश से अछूतों को सार्वजानिक स्थलों पर आने-जाने की छूट दी तथा इसका विरोध करने वालों को अपराधी घोषित किया. दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने ऐसी प्रथाओं का अंत किया जो युगांतकारी साबित हुई. इसके तहत 1917 में उन्होंने “बलुतदारी-प्रथा” का अन्त किया, जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गाँव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थी. उन्होंने भूमि सुधर लागु कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ भी दिलाया.
शाहूजी ने सन 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में अपने भाषण में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था “मुझे लगता है अम्बेडकर के रूप में तुम्हें तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है, मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे.” छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे औ उन्हें जान से मरने की धमकियाँ दे रहे थे. इस पर उन्होंने कहा था कि वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते, जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असंभव है. डॉ. आंबेडकर को भी उनकी पढाई और उनके अख़बार “मूक-नायक” के प्रकाशन में सहायता प्रदान की. वर्मा ने खा कि आज के दिन हम प्रतिज्ञा लें कि समाज का हर बच्चा शिक्षित हो और खासकर बालिका शिक्षा को बढ़ावा दिया जाये. बाबा साहब ने भी शिक्षा का महत्व बताते हुए कहा था कि शिक्षा तो शेरनी का दूध है जो पिएगा वही दहदेगा. उन्होंने दलितों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में भी कहा कि कहीं भी अत्याचार की घटनाएँ होती हैं तो हमें जरुर अवगत कराएँ पुलिस और प्रशासन पर दबाव बनाया जा सकता है और पीड़ित को न्याय दिलवाया जा सकता है.
सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीना ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि शाहूजी महाराज के कारण ही अम्बेडकर साहब उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके. शाहूजी महाराज ने उस समय दलितों के लिए शिक्षा की बात की जब छुआ-छूत चरम पर थी, आज देश के जो हालात हैं ऐसे में हमें अपने इतिहास पुरुषों को यद् कर उन्हें प्रकाश में लाना चाहिए. शिक्षा के बाद संगठन की ओर हमें बढ़ना चाहिए, शिक्षा ही हमें आगे बढ़ा सकती है. दलित आदिवाशी व पिछड़ों को समझना चाहिए कि सरकार में मनुवादी लोग बैठे हुए हैं उनसे संविधान को किस प्रकार बचाना है. जब तक एक नहीं होंगे तब तक व्यवस्था में सुधर कु गुंजाईस बहुत कम है. हमारे साथ अत्याचार होते हैं तो हम उनका विरोध नहीं कर पाते, हमारी जमीनों पर दबंग कब्जा कर लेते हैं तो हम विरोध नहीं कर पाते, आखिर कब तक अत्याचार सहन करते रहेंगे. सीकर जिले में दलित व पिछड़ा वर्ग की आबादी बहुतायत में है लेकिन एकता के आभाव में हमारा आन्दोलन नहीं बन पाता है इसके प्रयास करने होंगे.
संगोष्ठी में प्रथम श्रेणी कम्पाउंडर बाबूलाल बायल, एडवोकेट जसवंत, डॉ. मुकेश वर्मा, रतिराम अध्यापक, पूर्व प्रधानाचार्य जे.पी. वर्मा, वरिष्ठ अध्यापक लालचंद मीना, पवन मौर्य, अध्यापक राधेश्याम मीना, भागीरथ बडोदिया, मदनलाल सैनी, गोर्धन तितरवाल, के.सी. खाडिया आदि ने भी विचार व्यक्त किये. कार्यक्रम का संचालन सेवानिवृत बैंक प्रबंधक जे.पी. वर्मा ने किया.

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