तुम असमय चले गये नीलाभ !

-नारायण बारेठ

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” तुम धूप में छावं की तरह याद आये
तुम शहर में गावं की तरह याद आये
तुम धुंधलके में दिए की तरह याद आये
नीलाभ तुम हर शख्स को बहुत याद आये ”

उस अंजुमन में हर शख्श गमज़दा था। जयपुर के विनोबा ज्ञान मंदिर में सोमवार को नीलाभ मिश्र को बहुत शिद्द्त से याद किया गया। नीलाभ महज एक पत्रकार ही नहीं,एक अच्छे इंसान भी थे। इसीलिए हर वर्ग के लोग जमा हुए और नीलाभ को याद किया।

सामने मेज पर रखी नीलाभ की तस्वीर। मुस्कारते हुए नीलाभ। कुछ यूँ निहारते हुए नीलाभ गोया जैसे अभी कुछ कहेंगे। उस तस्वीर के सामने कोई आँख में आंसू लिए पहुंचा ,कोई अंजुरी में फूल लिए हाजिर हुआ। किसी के पास जज्बात थे तो किसी की जबान सहसा कुछ कहते कहते गूंगी हो गई। शायद आँख से गिरी बूँद किसी सागर की मचलती जलधारा से भी प्रचंड होती है।

नीलाभ जयपुर में कई साल तक हैदराबाद के अंग्रेजी दैनिक न्यूज़ टाइम के राजस्थान सवांददाता रहे है। मगर बहुत जल्दी वे राजस्थान के इतिहास ,भूगोल ,सामाजिक व्यवस्था,परम्परा ,साहित्य और लोगो के मिजाज से वाकिफ हो गए। बल्कि कई बार वो किसी संदर्भ ग्रंथ की तरह काम आते थे।

किसी ने उनकी सरलता का बखान किया तो कोई उनकी विद्व्ता की तारीफ कर रह था। किसी के लिए वो एक वैचारिक संबल थे,तो कोई उन्हें जिंदगी के अंधेरो में रोशन मीनार की तरह ले रहा था। इसके साथ सबने उनकी साथी कविता श्रीवास्तव को भी सलाम किया कि कैसे उन्होने नीलाभ मिश्र के उपचार,सार संभाल में साथ निभाया। खुद ने भी हौसला रखा औरो को भी हिम्मत दी।

नीलाभ आपने बारे में कम बात करते थे। इसीलिए बहुत कम लोग जानते है कि उनके दादा प्रजपति मिश्र जंगे आज़ादी के सेनानी रहे है।वे 1942 में भारत छोडो में जेल गए ,सजा भी काटी। उस वक्त छुआछूत के खिलाफ अभियान चलाने पर प्रजापति मिश्र का ससुराल में सामाजिक बायकाट किया गया। लोग उन्हें चम्पारण का गाँधी कहते थे। नीलाभ के पिता प्रमोद कुमार मिश्र बिहार में मंत्री रहे है।

समग्र सेवा संघ और पीयूसीएल की ओर से आयोजित इस श्रद्धांजली सभा में सवाई सिंह ,डॉ राजीव गुप्ता , सन्नी सेबस्टियन , प्रोफेसर हसन , ममता जेटली ,आशा कौशिक ,सलीम इंजीनियर ,मीता सिंह ,राजीव महान ,अनिल मिश्र ,आनंद चौधरी ,रणजीत ,कैलाश मीणा,अनिल गोस्वामी ,हेमेंद्र गर्ग,बंसन्त हरियाणा,निजामुदीन,प्यारे लाल और हरकेश बुगालिया सहित बहुत सारे लोग मौजूद थे।

इंसानियत तुम्हारी निगहबानी की मुंतजिर थी,जमाना तुम्हे सुन रहा था।
वक्त तुम्हे पढ़ रहा था,पर तुम असमय चले गए नीलाभ।

हम सबकी ओर से खिराजे अकीदत।

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