आम जन का मीडिया
You must touch each other

एक दूसरे को स्पर्श जरूर करें

-प्रेम प्रकाश

जाने पहचाने अनजाने ना जाने कैसे भी लोग हों, जहां भी हों, जैसे भी लोग हों, इंसान को इंसान का स्पर्श प्रिय होना चाहिए। जैसे कपूर मे सुगंध होती है, जैसे फूल मे सुगंध होती है, जैसे बसंत मे सुगंध होती है, जैसे दिगंत मे सुगंध होती है, जैसे रात मे सुगंध होती है, रात की बात मे सुगंध होती है, वैसी ही देह की भी अपनी सुगंध होती है। अभिज्ञानशाकुंतलम मे कालिदास कहते हैं कि जिस बच्चे का शरीर धूल और कीचड़ से सना हुआ हो, उसे गोद मे लेने वाले और जिनके अपने कपड़े मैले हो जाते हों, वे माता पिता धन्य हैं। उस मैल से कपड़े गंदे नही होते, बल्कि पवित्र होते हैं।

यह मनुष्य की सुगंध है। जैसे भीड़ अलग वस्तु है, लेकिन संपर्क बिलकुल अलग वस्तु है। भीड़ मे रहना कोई पसंद नही करता क्योंकि भीड़ मे मनुष्य खो जाता है। क्योंकि भीड़ मे सोहबत नही होती, क्योंकि वहाँ कोई किसी का साथी नही होता है। जहां साथी नही होता है, सोहबत नही होती है, वहाँ स्त्री हो या पुरुष, उसका मन घबराता है। जहां सोहबत होती है, वहाँ सुगंध भी होती है। बहुत धार्मिक और संयमी लोग स्पर्श को दोष बताते नही थकते। वे स्पर्श को ही विषय कहते हैं, वासना कहते हैं, स्पर्शप्रियता को अधम मानते हैं। हाँ होता है, जहां एक इंसान दूसरे इंसान के शरीर को केवल उपभोग की वस्तु मानता हो, वहाँ स्पर्श से पतन भी होता है, लेकिन…!

लेकिन जहां एक इंसान दूसरे इंसान के शरीर को पवित्र मानता है, वहाँ स्पर्श से उद्धार भी होता है और उन्नति भी होती है। इसीलिए देखिये तो हमारे पारिवारिक संस्कारों मे चरण स्पर्श करने के नियम हैं। चरण स्पर्श…न केवल उनका कि जो बड़े हैं, बल्कि चरण स्पर्श उनका भी कि जिन्हे हम पवित्र समझते हैं। अब पवित्र कौन है…? वही पवित्र है जो हमारे हृदय को प्रिय है। ”स्पर्शमणे सुवर्णीकुरु मां मलिनम लोहम” …… यह प्रार्थना है कि हे ईश्वर…! मै मलिन हूँ, लोहा हूँ, मुझे स्पर्श कर दो। मै सोना हो जाऊँ। स्त्री पुरुष के लिए स्पर्शमणि है, पुरुष स्त्री के लिए स्पर्शमणि है। और इतना ही नही, स्त्री भी स्त्री के लिए और पुरुष भी पुरुष के लिए हो सकते हैं स्पर्शमणि…शर्त केवल ये कि हृदयप्रियता होनी चाहिए। हर मनुष्य को दूसरे मनुष्य के लिए स्पर्शमणि बनना चाहिए। इसे ही ह्यूमन डिग्निटी कहते हैं। यही सेक्रेडनेस ऑफ लाइफ है। यही जीवन की पवित्रता और जीवनोद्धार है।

आबाल वृद्ध स्त्री पुरुष हर मनुष्य का विग्रह, हर इंसान का शरीर, हर जीवित देह उतनी ही पवित्र है, जितना स्वयं ईश्वर। यही अध्यात्म है। यदि यह अध्यात्म नही होता तो मनुष्य से मनुष्य का संपर्क टाला जाना चाहिए था। जबकि हमारी सिखावनों मे तो मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करने की हिदायतें हैं, उपदेश हैं, आवाहन हैं। पत्थर की प्रतिमाएँ देखकर तो हम कितना आनंदित होते हैं और कहते हैं कि इसमे बड़ी दिव्यता है। और वहीं मनुष्य मे…? स्त्री पुरुष के स्वरूप मे…? वहाँ क्यो नही दिखती है दिव्यता…? पहाड़ और पत्थर मे दिव्यता क्यो है…? उसमे जड़ता है, क्या इसलिए…? उसे दिव्य मान लेने मे आप पर कोई ज़िम्मेदारी नही आती, क्या इसलिए दिखती है दिव्यता उसमे…? मनुष्य का मनुष्य के साथ या किसी दूसरी सजीव वस्तु के साथ जो संबंध होता है, उसमे ज़िम्मेदारी भी आती है। दायित्व भी आता है। यही ज़िम्मेदारी, यही दायित्व मनुष्य को मनुष्यता प्रदान करता है।

पहाड़ पत्थर कोई दायित्व नही लेते। लेकिन वहीं देखिये अगर वृक्ष हो तो, चूंकि उसमे जीव है, इसलिए उसमे दायित्व आ जाता है। वृक्ष हमारी ज़िम्मेदारी लेते हैं, नदियां हमारी ज़िम्मेदारी लेती हैं, इसीलिए वृक्षों और नदियों को पवित्र कहते हैं। अपने खुद के जीवन के लिए और अपने आसपास होने वालों के जीवन के लिए, उनकी भावनाओं के लिए यह जो दायित्व की भावना है, यही आदमीयत कहलाती है। हम दूसरे की ज़िम्मेदारी लेते हैं, इसीलिए हम मनुष्य हैं और इसीलिए तो मनुष्य श्रेष्ठ है। हर इंसान एक दूसरे का रक्षक है, हर इंसान एक दूसरे का अभिभावक है, हर इंसान एक दूसरे का जिम्मेदार है, यही तो सतयुग है, यही तो सद्गुण है।

( लेखक की फेसबुक पोस्ट से साभार )

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