सांड नगरी भीलवाड़ा में आपका हार्दिक स्वागत है !

-महेश अग्रवाल

206

भीलवाड़ा वस्त्र नगरी के पश्चात सांड नगरी में भी अपना स्थान बनाता जा रहा है जिसका सारा श्रेय भीलवाड़ा नगर में विभिन्न कुर्सियों पर सुशोभित सांडो को जाता है!भीलवाड़ा शहर सांड मय हो चुका है,एक एक गली में 5 से 7 सांड एक साथ चलते हुए केटवाक करते हुए देखे जा सकते है,ये सांड जब मस्ती के मूड में आते है तो सिवाय मस्ती के इन्हें कुछ नहीं सूझता जो भी सामने आ जाये उनको पस्त करने का ही इनका एक मात्र ध्येय रहता है,विभिन्न रंगो में जब इनका समूह गुजरता है तो लगता है कोई शोभा यात्रा गुजर रही हो,पूरे शहर में इनकी मस्ती का आलम देखते ही बनता है!

सांडो की अपनी संस्कृति है,साहब इनकी संस्कृति से छेड़छाड़ इन्हें बरदाश्त नहीं हैं.हरेक सांड के अपने अपने फोलोवर्स है जो उनके पीछे आँख बंद कर कतारबद्ध चलते रहते है ! सांडो को दिन (वार) के हिसाब से आहार दिया जाता है,गुरूवार है तो पीले सांड को शनिवार काले को तो सभी सांडो का भला हो जाता है,मौका देख कर सांडो को लड़वाने का भी प्रचलन है,सांड आदेश मात्र से मरने मारने पर उतारू हो जाते है,उन्हें महज अपने आका का हुक्म मानना है !

अभी ताजा ताजा गुजरात और हिमाचल में भी सांडो की जबरदस्त मुठभेड़ देखने को मिली, दोनो जगह सांडो ने जबरदस्त सींग भिड़ाई करी.जीतने वाले सांडो की सांड नीति राजस्थान में भी आयात करने की अफवाह है ! बेहतरीन सांडो को *सांड श्री*, *श्री मान सांड*, की मानद उपाधि भी ससम्मान प्रदान करने की गुप्त योजनाएं चल रही है.इसके पीछे भावना ये ही है कि सांड ही आपस में एक दूसरे का ध्यान नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा !

जहां विश्व के तमाम समृद्ध राष्ट्रों में 1000 व्यक्तियों के पीछे एक सांड है, हमारे देश में 100 व्यक्तियों के पीछ एक सांड है,पर हम भीलवाड़ा वाले पूरे देश में प्रथम है यहां 10 व्यक्तियों के पीछे एक सांड है और बापूनगर में तो तीन व्यक्तियों के पीछे एक सांड है!वो दिन दूर नहीं है जब एक व्यक्ति के पीछे तीन सांड हो जायेगे!

जिस तरह एक कबाड़ी के निकलते ही दूसरा कबाड़ी कबाड़ के लिए आवाज लगा जाता है उसी तरह कतारबद्ध सांड गली से गुजरते है तो मस्तानी चाल के हिसाब से तो वो शाही रेल जैसे लगते है, पर उनकी समयबद्धता के हिसाब से वो मेट्रो रेल जैसे लगते है,शाही सवारी तो ये है ही भगवान तक सवारी के रूप में इनको पसंद करते रहे है!!

शासन प्रशासन अनुशासन से इनका कोई लेना देना नहीं हैं!शहर में ट्रेफिक पुलिस के एक भले कर्मचारी ने सांड जी को अनुशासन सीखाने की ठानी,सांड जी ने उन्हें जमीन पर पटक कर उनका आसन तोड़ दिया,यही कोई 30 के करीब टांके आये थे,पर हुआ क्या कुछ नहीं, सांडो के शासन में सांडो के खरोंच तक नहीं आई !!

सांडो पर पूरा एक उपन्यास लिखा जा सकता है पर सामने मुझे एक विशालकाय सांड आता दिखाई दे रहा है, इसके पहले वो मुझे देख कर खुद को पेले समझ ले मेरा यहां से खिसकना ही उचित रहेगा !! सभी सांडो को मेरा सस्नेह वंदन..!!

Leave A Reply

Your email address will not be published.