आम जन का मीडिया
yesterday's mythology is today's media

कल का पुराण ही आज का मीडिया है !

-संजय जोठे

आदिवासी (शेड्यूल्ड ट्राइब्स) और बौद्ध (श्रमण) सँस्कृति का नामों निशान मिटा दिया गया, इतिहास में उनका उल्लेख तक नहीं मिलता, जो मिलता है वो हाल ही में खोजा गया है।

लोग पूछते हैं ये सँस्कृति इतिहास और धर्म मिटाने का काम कैसे हुआ? इसका उत्तर इस फोटो में देखिए। तीस हजार से अधिक दलित, आदिवासी और ओबीसी (शूद्र) किसान मुम्बई में रैली और प्रदर्शन कर रहे हैं।मीडिया ने खबरों और न्यूज चैनल्स और अखबारों में इन्हें जगह न देकर “सूचना जगत” में इन्हें मिटा दिया है।

इन खबरों को छुपाकर काली चुड़ैल, अश्वत्थामा, पाताल की गुफा, बगदादी किंम जोंग,ओसामा आदि की खबरें चलाई जाती हैं।इतिहास में भी ठीक यही किया गया है।आदिवासी, दलित, ओबीसी के रोजमर्रा के मुद्दों को छुपाकर यज्ञ, हवन, मंदिर, अध्यात्म साधना, मोक्ष आदि की बकवास चलाई गई है।

रणनीति वही की वही है। कल का पुराण ही आज का मीडिया है। इस मीडिया से और उस पुराण से आजादी तब तक संभव नहीं है जब तक कि समाज इन पुराणों को पैदा करने वाले धर्म से आजाद नही हो जाता।

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