कल पद्मावत फ़िल्म देखी

- शशि कांत

236

सपरिवार क़ल पद्मावत देखी.जो था, उसपर बातें भी हुईं। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह अनुभव था कि बच्चों में अपनी स्वतंत्र दृष्टि आकार ले रही।

“आदित्य” (11 वर्ष कक्षा 5) ने कहा कि बड़ी बोरिंग फ़िल्म है। गाने भी। न जाने किस जमाने की कहानी है! ऐसी फिल्में लोग बनाते क्यों हैं?

‘श्री’ (14 वर्ष, कक्षा 8 ) फ़िल्म देखते हुए लगातार असहज हो रही थी , ने एक सिरे से फ़िल्म को खारिज किया। उसके सवाल अधिक मौलिक थे।

“पीरियड फ़िल्म लोग बनाते क्यों हैं? उन्हें कैसे मालूम कि खिलजी इतना क्रूर था? किसी समुदाय को बुरा दिखाने के लिए कुछ भी गढ़ लेंगे? हमलोगों ने तो ऐसा नहीं पढ़ा है। बताइये सती प्रथा को क्यों जस्टिफाई किया है? क्या यह ठीक था? एक तरफ लिखते हैं कि सती या जौहर का समर्थन नहीं करते और उसका महिमामंडन भी करते हैं?

अच्छा हुआ अंग्रेजों का शासन आया जिन्होंने ऐसी खतरनाक प्रथाओं को खत्म तो किया? इंडियन पास्ट वाज सो डेंजरस एंड फुल ऑफ वॉर एंड वायलेंस ।”

“लेकिन इसे जानने या देखने में क्या बुराई है? – मैने पूछा।
“इसका लोगों पर अच्छा प्रभाव नही होगा।”-श्री ने कहा।

“फ़िल्म देखकर कुछ अच्छा नहीं लग रहा। रणवीर, शाहिद और दीपिका इन तीनों ने अच्छा अभिनय किया है। भंसाली के सेट्स भव्य होते हैं। कंटेंट बेवजह इतना लोडेड है कि याद करने लायक कुछ है क्या?’- डॉ ऋतु ,बहस के मूड में न थीं।

इधर मैं कॉरपोरेट पोषित (फ़िल्म प्रोड्यूसर अम्बानी) ‘हिंदुत्व’ के सबटेक्स्ट प्रभुत्व जातीय ” ठकुरैती ” के महिमामंडन के बावजूद संघियों और उसके पोषित जातीय/करणी सेनाओं के बेवजह बवालिया मूर्खता पर सोच रहा था।

सब कुछ एक पूर्व नियोजित स्क्रिप्ट का हिस्सा – जहां अतीत की कपोल कल्पनाओं और इतिहास के खतरनाक मिश्रण से वर्तमान राजनीति के लिए उन्मादी ‘हिंदुत्व’ और साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की वैचारिकी के सांस्कृतिक रसद के रूप में फ़िल्म, कला आदि का इस्तेमाल किया जा रहा हो।

धार्मिक प्रतीकों /डार्क बिंबों/रंगों/दृश्यों के धड़ल्ले से प्रयोग द्वारा एक धर्म-विशेष से जोड़ ख़िलजी की आक्रांता, क्रूर, असभ्य, असहिष्णु, भोग-विलासी, अनैतिक तथा इसके बरक्स इनके सुनियोजित कॉन्ट्रास्ट के रूप में रतन सिंह की नैतिक/सभ्य/सौन्दर्यप्रेमी/मानवीय/योद्धा छवियों , दृश्यों का सुनिश्चित संयोजन -और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूरे कथानक में पितृसत्तात्मक धर्म-जाति गौरव को “नारी” अस्मिता से जोड़ना है, जहां उसका युद्ध में योद्धा बन कर नहीं “जौहर में प्राणाहुति” उसके समग्र अस्तित्व का प्रतिफलन है। -एक आरोपित नियति।

साम्प्रदायिक/जातिगत सेनायें खड़े किए जाना और धार्मिक सांस्कृतिक नायकों /प्रतिनायकों की कल्पित साहित्यिक-सांस्कृतिक-सिनेमाई युक्तियों से गौरव- पराजयबोध और भयदोहन की जिस प्रक्रिया की शुरुआत रामानंद सागर के “रामायण” धारावाहिक से हुई वह अनेक तथाकथित फिल्मकारों को खाते चबाते भंसाली तक आ पंहुची है और बड़ी, दुष्ट और सजग पूंजी/सत्ता की गोद में सांस्कृतिक उत्पादों के नाम पर जहर परोसने का कार्य कर रही।

“इसमें लड़ने लायक तो कुछ भी नहीं है? फिर इतना बवाल क्यों कर रहे हैं सब?”- बाबूजी (75 वर्ष) ने कहा।

( फेसबुक पोस्ट )

Leave A Reply

Your email address will not be published.