आम जन का मीडिया
Yesterday a press conference was held in Dantewada of Chhattisgarh!

कल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई !

- हिमांशु कुमार

कल छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई ,इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो आदिवासी बच्चों और दो आदिवासी महिलाओं ने पत्रकारों को संबोधित किया ,इस पत्रकार वार्ता में सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी और सर्व आदिवासी समाज के कार्यकर्ता भी मौजूद थे.

करका गांव से जो 2 बच्चे आए थे ,उन्होंने बताया कि हम 4 बच्चे जंगल में खेल रहे थे,तभी सुरक्षाबलों ने हम पर गोली चलाई और एक बच्चा जिसकी उम्र 9 साल थी वह वहीं मर गया और दूसरा बच्चा जो 11 साल का था उसे कमर में गोली लगी .गांव वाले घायल बच्चे को अस्पताल लेकर गए.बाद में पुलिस मृत बच्चे की लाश पुलिस थाने ले कर चली गई .

पुलिस ने पत्रकारों को बताया कि हमने एक नक्सली को मारा है,अस्पताल में घायल बच्चे ने सारी सच्चाई अपने माता-पिता और गांव वालों को बताई ,पुलिस डर गई .इसके बाद पुलिस ने कहना शुरू किया कि घायल बच्चे को गलती से गोली लग गई है.

इसी तरह से गोमपाड़ गांव से दो महिलाएं आई थी ,जिन्होंने बताया कि हम चार महिलाएं मछली पकड़ने तालाब की तरफ जा रहीं थीं,तभी पुलिस ने हम पर गोली चलाई

रामे नाम की एक महिला के कुल्हे में गोली लग गई ,पुलिस वाले चले गए.साथ की महिलाओं ने गांव वालों को सूचित किया और गांव वाले इस महिला को लेकर थाने गए ,थाने वालों ने उनसे कहा कि जाओ किसी अस्पताल में इलाज करा लो,परिवार के लोग घायल महिला रामे को लेकर आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में ले गए

बाद में पुलिस अपनी पोल खुलने से डर गई,पुलिस वालों ने जाकर डॉक्टरों को डराया ,जिससे महिला का 10 दिन तक कोई इलाज नहीं हुआ .परिवार के लोगों ने मदद के लिए सोनी सोरी को बुलाया

सोनी सोरी के पहुंचने के बादऔर मेरे इस बारे में लिखने के बाद ,अगले दिन सुकमा के एसपी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करी और कहा कि यह महिला नक्सलवादी है और अस्पताल से निकलते ही हम इसे गिरफ्तार कर लेंगे.

पुलिस की यह एक यह गैरकानूनी हरकत है ,पुलिस झूठ बोल रही है.यदि वह महिला नक्सलवादी होती तो पुलिस उसे कभी का गिरफ्तार कर लेती ,लेकिन हमारे लिखने के अगले दिन ही उसको नक्सलवादी घोषित करना पुलिस की चाल है.पुलिस नहीं चाहती कि कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता किसी आदिवासी की मदद करें.

पुलिस आदिवासियों को डराने के लिए झूठे केस में फंसा रही है ,ताकि आइंदा कोई भी आदिवासी किसी सामाजिक कार्यकर्ता की मदद लेने में डरे .कल जो महिलाएं इस घटना के बारे में बताने के लिए प्रेस के सामने आई है.उनके बारे में भी हमें डर है कि पुलिस उन्हे भी फर्जी मामले बनाकर परेशान कर सकती है,लेकिन इन महिलाओं ने बहुत साहस के साथ कहा कि अगर हमें पुलिस फर्जी मामले में फंसाती भी है .तो हम डरेंगी नहीं और सामने आकर सच जरूर बताएंगी.

करका गांव से जो बच्चे आए हैं ,वह अपने साथ पुलिस द्वारा चलाए गए कारतूसों के खाली खोखे बीनकर भी लाए हैं .सोनी सोरी ने प्रेस के सामने वह खोखे दिखाते हुए कहा कि देखिए पहले आदिवासी महुआ बीनते थे .आजकल हम सरकार की गोलियों के खोखे बीन रहे हैं

बस्तर के आदिवासी भारतीय राज्य की हिंसा और आदिवासियों की जमीनें लूटने के प्रक्रिया को झेल रहे हैं ,आदिवासियों के खिलाफ बड़ी कंपनियों की तरफ से की जा रही सरकारी हिंसा को रोकने में अदालत अपने आप को असहाय महसूस कर रही है.

पत्रकार डरे हुए हैं ,पत्रकारों को जेलों में डाला जा रहा है.सामाजिक कार्यकर्ताओं को उस इलाके से निकाल दिया गया है और आदिवासियों पर रोज हमले हो रहे हैं.

यह एक भयानक दौर है,जिसका सामना आदिवासी अपनी हिम्मत से कर रहे हैं.

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