आम जन का मीडिया
X Health Minister to give the resignation!

…तो हेल्थ मिनिस्टर के बदले एक्स हेल्थ मिनिस्टर को देना पड़ा रिजाइन !

-प्रमोदपाल सिंह

राजस्थान में हेल्थ डिपार्टमेंट की पिछले साल भर से जितनी हेल्थ बिगड़ी हुई हैं,उतनी ओर किसी डिपार्टमेंट की नही हैं। हड़ताल टूटने के बाद स्थिति में सुधार तो हो रहा हैं। लेकिन एक विधायक के इस्तीफे से राजनीति के मंच पर उछाल आ गया हैं। इस इस्तीफे के साथ 12 दिन की हड़ताल से साढ़े तीन सौ मरीजों की मौत के आंकड़े ने सरकारी संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदेश में डॉक्टरों की किश्तवार हड़ताल और इससे उपजे हालात के बीच नैतिकता के नाते त्यागपत्र देने का रिवाज कांग्रेस के पिछले कार्यकाल के स्टेट हेल्थ मिनिस्टर डॉ.राजकुमार शर्मा ने हेल्थ मिनिस्टर कालीचरण सर्राफ को अपने विधायक पद से इस्तीफा देकर याद दिलाया।

निर्दलीय विधायक शर्मा के इस कदम को सुर्खियां बटोरने वाला राजनीतिक स्टंट मान ले और सन्निकट विधानसभा चुनाव से भी जोड़कर देख लिया जाए। लेकिन राज्य में कई दिनों तक बनी रही ‘अराजकता’ के चलते मरीजों के साथ हुए खिलवाड़ पर तो प्रदेश भर का ध्यान खींचा ही हैं।

सरकारी अस्पतालों में सर्व साधारण लोग अपने इलाज के लिए पहुंचते हैं और खासकर वे लोग पहुंचते हैं जो प्राइवेट अस्पतालों में नही जा पाते। इन लोगों में बड़ी तादाद ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे दलित,पिछड़े,गरीब लोगों की हैं। ऐसे में इलाज के अभाव में दम तोड़ चुकी जिंदगियों की आवाज विधायक डॉ. शर्मा बने ही हैं।

साथ ही डॉ. शर्मा ने राज्य के हेल्थ मिनिस्टर को ‘कथित मिनिस्टर’ कहकर भी डिपॉर्टमेंट पर उनकी ढ़ीली पकड़ का उपहास भी उड़ाया ही हैं। उनके इस्तीफे में लिखा गया संदेश यहीं हैं कि वसुंधरा राजे सरकार को इलाज के अभाव में हुई मौतों के लिए ‘जिम्मेदार’ को बर्खास्त कर देना चाहिए और सरकार ऐसा न करें तो अपराध बोध से ही सही खुद ही इस्तीफा दे दे। यह इस्तीफा तब हुआ हैं जब डॉक्टर हड़ताल भी तोड़ चुके हैं।

इस इस्तीफे पर विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने अभी तक कोई निर्णय नही लिए जाने की बात कही हैं। लेकिन राज्य सरकार की तरफ से भी डॉ. शर्मा को गलत और सही ठहराने वाले बयान नही आए हैं। अपने मंत्री सर्राफ को बर्खास्त करने की बात तो बहुत दूर की बात हैं।

राज्य सरकार ने प्रदेश में हो रहे आंदोलनों को लेकर लगातार सख्ती बरतने की कोशिशें की। लेकिन यह सख्ती राजनीतिक विवशताओं के आगे हर बार ढ़ीली पड़ती दिखी। लेकिन इसके बावजूद सरकार का गुरुर अपनी जगह रहा। समझौता करने के बाद हड़ताल का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर को नीचा दिखाने की सनक को सरकारी डॉक्टरों ने खारिज कर दिया। 12 दिन बाद सरकार को पुनः ‘नेता डॉक्टर’ को यथावत पोस्टिंग देनी पड़ी। इस अहम की लड़ाई में आम आदमी पीसता गया और उसे इसकी कीमती अस्पतालों के चक्कर लगाते हुए मौत से चुकानी पड़ी। इस संवेदना को एक निर्दलीय विधायक ने महसूस करने की कोशिश की।

जो डॉक्टर अब तक आयुर्वेद डॉक्टरों को ऐलोपैथिक ट्रीटमेंट लिखने पर एतराज किया करते थे। वे सरकार व डॉक्टरों का हठधर्मिता का विकल्प बन कर इन्ही डॉक्टरों की सीटों पर बैठ कर वे ‘पैरासिटामोल’ लिखते रहे और सभी तरह के इलाज करने वाले ‘डॉक्टर’ की पैठ बनाते रहे।

ऐसे में एक डिपार्टमेंट के डॉक्टर की हड़ताल का दूसरे डिपॉर्टमेंट के डॉक्टर का भला ही हुआ हैं। लेकिन ‘हठधर्मिता’ का नतीजा सिर्फ और सिर्फ विवश मरीज भुगतता रहा हैं। जिसकी सुध लेने में सरकार ने देरी की और प्रतिपक्ष संवेदनहीनता बरती। तब हेल्थ मिनिस्टर को नैतिकता या अपराधबोध का एहसास एक निर्दलीय विधायक को अपना इस्तीफा देकर कराना पड़े तो उन्हें दाद देनी चाहिए।

1 Comment
  1. RAJMAL REGAR says

    BJP GOVT. WILL NOT COME BACK AGAIN WITH MAJORITY IF CM( CHIEF MINISTER ) FACE IS SAME.
    BJP GOVT. MAY REPLACE WITH CONGRESS GOVT. BUT WHAT WILL CHANGE IN THIS MANNER.

Leave A Reply

Your email address will not be published.