क्या गरीब बच्चे कभी डॉक्टर बन पाएंगे ??

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– नारायण बारेठ 

” दस साल हुए गरीब परिवारों के बच्चों ने डॉक्टर बनने का ख्वाब देखना बंद कर  दिया है । पूरी दुनिया में  जिन डॉक्टरों के हाथो में जादू है वे सब वंचित वर्गो से आये है ”  ये अल्फ़ाज़ है नारायण हृदयालय के मालिक देवी प्रसाद शेट्टी के। शेट्टी ने यह बात दो साल पहले एक अंग्रेजी अख़बार को दिए इंटरव्यू में कही।

           देश में आम आदमी अपने इलाज का 70 फीसदी अपनी जेब से खर्च करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है भारत में तीन प्रतिशत लोग इलाज कराते हुए हमेशा के लिए गरीब हो जाते है। आंकड़े बताते है भारत में पांच लाख डॉक्टरों की जरूरत है। मगर सरकारें इस कमी को पूरा करने में रूचि नहीं रखती। एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है।कुल दस लाख पंजीकृत डॉक्टर है। इसमें उपलब्ध डॉक्टरों की तादाद आठ लाख है। इसका बहुत बड़ा हिस्सा शहरो के पास है।
       भारत में कुल 470 मेडिकल कॉलेज है। इनमे आधे निजी हाथो में है। एक बार कहीं पढ़ा था इनमे 80 मेडिकल कॉलेज नेताओ से संबद्ध है।  देश में  MBBS  की कुल सीटें साठ हजार पार है। आबादी 130 बिलियन है ।पत्रकार रेमा नागराजन ने भारत के मेडिकल सिस्टम पर बहुत लिखा है। रेमा ने एक बार लिखा -आपने  सुना है कही भी कि IIT में शर्तिया दाखिला। मगर आप ऐसे इश्तिहार हमेशा देखते है जो डॉक्टरी में दाखिला कराते है। वे कहती है मेडिकल में एडमिशन का मार्केट 12 हजार करोड़ का है। MBBS   की एक सीट बेंगलोर में एक करोड़ में ,यूपी में पचीस लाख  तक।  MD रेडियोलोजी तीन करोड़ में एडमिशन। क्या सरकार और नेता इस हकीकत से नावाकिफ है ?
     1947 से 1970 तक मेडिकल शिक्षा और सेहत पर बहुत काम हुआ। ज्यादातर सरकारी मेडिकल कॉलेज भी उस दौर में खुले।  फिर सरकारों ने अनदेखी शुरू की। 1980 के बाद धीरे धीरे प्राइवेट का पदार्पण होने लगा। 1990 के बात तो प्राइवेट की तूती बोलने लगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने गौर किया और दर्ज किया कि पिछले पांच साल में प्राइवेट क्षेत्र सात गुना इजाफा हुआ है। सरकार का दायरा घटा है। प्राइवेट चालीस बिलियन डॉलर से बढ़कर 280 बिलियन डॉलर हो गया। जब आप डॉक्टर बनाने की कीमत वसूलने की छूट देते हो तो इलाज एक उद्योग हो जायेगा। इसमें गरीब भारत मर जायेगा।
      केतन देसाई का नाम सुना होगा। वे मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया के प्रमुख थे। दो बार भ्रष्टाचार में पकडे गए। आरोप है कि वे एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से बीस मिलियन रिश्वत ले रहे थे।  कार्यवाही अदालत ने की। सरकार ने नहीं की। उनके हाथ में मेडिकल कॉलेज की मान्यता देने का अधिकार था। नर्सिंग कौंसिल के एक वरिष्ठ अधिकारी जयपुर में पकडे गए गए थे। एक ताजा  अध्ययन के अनुसार भारत में एक डॉक्टर एक मरीज को दो मिनट वक्त देता है। वादा था स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ाएंगे। मगर अब भी केंद्रीय बजट का महज दो फीसदी, 2. 17 प्रतिशत  [48 ,878 करोड़ ] स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित है।
               1981 की बात है।  एक बार स्व इंदिरा गाँधी WHO से मुखातिब हुई।अपने भाषण में इंदिरा गाँधी ने कहा –  मेरी नजर में बेहतर दुनिया तब बन सकती है जब जीवन और मौत को लाभ बटोरने  से दूर रखा जाए। उनका इशारा दवा की कीमत और उसके पेटेंट को लेकर था। इसके बाद सरकार  ने दवाओं को पेटेंट से मुक्त कर दिया। फिर कुछ सालो बाद वही  स्थिति हो गई।
               रेमा नागराजन ने टाइम्स में खबर छापी। हॉस्पिटल स्टेंट लगाने में 270 से लेकर एक हजार गुना ज्यादा कीमत ले रहे थे। क्या कभी ऐसे मुद्दों पर संसद विधान सभा में हंगामा हुआ ? क्या लोग कभी सड़को पर निकले। हर तीन मिनट में दो भारतीय टी.बी से दम तोड़ जाते है। ये प्रायः गरीबो को लीलती है। क्या कभी किसी माननीय ने संसद ठप्प की ?
 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
(Photo – pinterest.com)

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