केवल आरक्षित सीटों पर ही महिलाओं को मौका क्यों ?

पूना पैक्ट की दुर्बल संताने (3)

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(भंवर मेघवंशी)

दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों द्वारा महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर सर्वाधिक टिकट सिर्फ और सिर्फ रिजर्व सीटों पर ही देने का चलन बढ़ता जा रहा है ,यह कोटे में कोटे की राजनीति है।

इसके जरिये कई निशाने साध लिए जाते है,पार्टी टिकटों में महिलाओं की भागीदारी की शेखी बघारी जा सकती है ,महिलाओं के नाम पर पुरुष राजनीति करते है और उनका वास्तविक नेतृत्व पनपने पर उनको बदल देते है या टिकट ही नहीं देते है अथवा सक्षम सवर्ण तबके के नेताओं की रबड़ स्टाम्प बना कर काम करने को मजबूर कर देते है ।

यदि राजनैतिक दल वास्तव में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर इतने ही ईमानदार है तो उन्हें महिलाओं को उनकी आबादी के अनुपात में मौके मुहैया करवाने चाहिए,मगर ऐसा होता नहीं है ।आज तक महिला आरक्षण को ससंद में पारित नहीं हो पाना इसका साक्षात उदाहरण है ।

हर बार महिलाओं को दिए जाने वाले टिकटों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह साफ समझ में आता है कि दोनों दल एक ही कोटे में दूसरे कोटे की पूर्ति कर महिलाओं के हितों में अग्रसर दल के रुप में स्वयं को साबित करने की कोशिश में लगे रहते है।

दोनों प्रमुख राजनैतिक दल कोटे में कोटे की पूर्ति करते हुए महिला अधिकार की लड़ाई लड़ने की वकालत तो करते है।लेकिन महिलाओं की भागीदारी के नाम पर दलित महिलाओं का कोटा पूरा कर लिया जाता है।मगर सामान्य सीटों पर महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं देते है ।

यह भी गौर करने योग्य तथ्य है कि नेतागण एक बार से अधिक इन दलित महिला विधायकों को मौका नहीं दिलाना चाहते है , हर बार नई महिला उम्मीदवार को टिकट दिलवाकर सशक्त महिला नेतृत्व के उभार को रोक दिया जाता है। बहुत ही कम दलित महिलाएं है ,जिनको लगातार टिकट दिया जाता है ।

दलित व आदिवासी रिजर्व क्षेत्रों में हम अपनी बहनों की समुचित भागीदारी का स्वागत करते हैं ,मगर महिला कोटे की पूर्ति महज एससी एसटी कोटे से पूरी करने की धूर्त प्रवृति के खतरों को भी हम समझते हैं ,हम चाहते है कि महिलाओं को सभी श्रेणियों में उनकी आबादी के अनुपात में उचित भागीदारी दी जाये।

हमारा सवाल है कि सिर्फ रिजर्व सीटों पर ही महिला प्रतिनिधित्व की खानापूर्ति क्यों,शेष अनारक्षित सीटों पर सभी वर्गों की महिलाओं को समुचित भागीदारी क्यों नहीं ?

क्या यह भी पूना पैक्ट की कमजोर संतानों की आमद की आहट है ?

भंवर मेघवंशी

(संस्थापक-दलित,आदिवासी,घुमन्तु अधिकार अभियान ‘डगर’)

 

(फोटो क्रेडिट-इन्टरनेट)

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