धारू मेघ को इतिहास क्यों याद नहीं करता ?

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मरुधरा की धोरा धरती मे रिख धारूजी मेघ का नाम किसी परिचय का मोहताज नही है , जिनकी अमर उपदेशी  वाणिया आज भी घर घर (ढाणी – ढाणी) मेघ रिखो की आध्यात्मिक लोक धारा मे गुँजती है , मगर खेद है कि उनका प्रमाणिक इतिहास आज तक किसी इतिहासकार ने  नही लिखा .
धारु मेघ की आध्यात्मिक लोकक्राँति से प्रभावित होकर मेहवा नगर के राजा रावल मालदे ने अपनी राजशाही हुकुमत छोड़ दी और सामंतशाही  का कङक अन्दाज त्याग कर उनकी शरण ली और  धारु मेघ के घर आयोजित मेघमहाधर्म के जम्मे ‘जागरण’ अनुष्ठान मे राणी रुपादे का अनुशरण करतै हुऐ भाग लिया और अंततः  मालदे ने भक्ति मार्ग को अपना कर “मल्लीनाथ” के नाम से ख्याति प्राप्त की .
आज भी मेहवा नगर (मालाणी) तिलवाङा मे मल्लीनाथ के नाम से प्रतिवर्ष चैत्र माह मे भव्य पशु मेले  का आयोजन होता है, जिसमे लोक आस्था का सैलाब उमङता है मगर धारु  मेघ के नाम से कोई मेला आयोजित नही होता । सवर्ण कवि हरजी भाटी ने भी रावळ मालदे ओर राणी रुपादे की लोक गाथा को केवल “रुपादे री बेल ” के नाम से गाया . उस लोक गाथा मे केवल राणी रुपादे ओर रावल मालदे की वार्ता बढ चढ के गाया , मगर धारु जी मेघ के वास्तविक इतिहास को उजागर नही किया .उन्हीं की तरह अन्य विभिन्न मनुवादी साहित्यकारो ने भी रावल मालदे (मल्लीनाथ) और राणी रूपादे के इतिहास पर  बढ चढ कर हजारो पन्ने लिखे ,मगर रिख धारु मेघ का इतिहास उकेरने के लिए आज भी प्रबुद्ध साहित्यकारों और गंभीर अध्येयताओ के इन्तजार मे है .
हरदयाल सिह की ‘मारवाङ मर्दुमशुमारी रिपोर्ट – सन 1891’ मे तो  धारु मेघ के इतिहास व उनकी आध्यात्मिक लोकक्राँति को मनमाना नकाब चढाते हुऐ  यहाँ तक लिख दिया कि– ” धारु मेघवाल मल्लीनाथ का बङा भगत था ” …..जबकि वास्तविकता मे मल्लीनाथ स्वयं धारू मेघ का अनुयायी था । इसी प्रकार धारु मेघ का इतिहास मनुवादी इतिहासकारो ने अपना मनोकल्पित नकाब चढाकर प्रस्तुत किया .
लोक वाणी वार्ताओं के पुख्ता प्रमाणो से प्राप्त जानकारी के अनुसार – धारु मेघ का जन्म दुदवा गाँव मे पंवार गोत्रीय कल जी मेघवाल  के घर विक्रम सॅवत 14 वी शताब्दी मे हुआ था . उनका बचपन से ही आध्यात्मिकता से बेहद लगाव था । उनके गुरु का नाम उगमसी था । नजदीकी गाँव के राजपूत बालभद्र (बाला बदरा) जो जागीरदार ठाकुर थे , उनके रावळै की बेठ बेगार ( हाली प्रथा के रुप मे  ) धारु मेघ उनकी गायो को चराने  का कार्य बङी इमानदारी व निष्ठा के साथ करते थे । इसलिए बाला बदरा के परिवार से धारु मेघ का घनिष्ठ लगाव था । बाला बदरा की पुत्री बाई रुपादे ,धारु मेघ को मुहबोला भाई मानती थी .
रुपादे का विवाह जब मेहवा नगर के राजा रावल मालदे के साथ हुआ था ,उस वक़्त की परम्परा के मुताबिक धारु मेघ को दहेज मे दे दिया गया  (यह मध्यकालीन सामन्तकाल की प्रचलित प्रथा थी  कि वे सामन्त दास दासियो के रुप मे पिछङै शोषित समाज के आज्ञाकारी सेवाभावी सेवक को दहेज मे देते थे ) तब से धारु मेघ मेहवा नगर मे रहने लगे , मगर क्रूर स्वभावी रावल मालदे ने धारु मेघ से कोई स्नेह नही रखा . सदा हीन भावना से देखा .
रावल माल ने धारू मेघ को मेहवा नगर के बाहर बस्ती से अलग ही बंजर पहाडी इलाके मे अकेले रहने  को मजबूर किया . वर्तमान जशोल गाँव के पास जो जैन तीर्थ नाकोडा धाम की पहाडी है ,उसी मे धारु मेघ झौंपड़ी बना कर रहते थे और अपनी साधना करते थे ,लोककथाओ के अनुसार एक बार धारु मेघ के घर उनके गुरु उगमसी के आगमन पर धारु मेघ ने एक जम्मा जागरण रखा ,यह  विक्रम सॅवत 1439 चैत्र सुदी शनिवारी दूज (चन्द्रावल बीज) को रखा गया था .इस सम्बन्ध मे एक लोक वाणी मे कहा गया है -” संवत चवदै सौ स्त्रीकार , गुणचालीसो बरस विचार – उजळ बीज शनिचर वार , चैत भयो परचो परचार “
उस जम्मा अनुष्ठान मे रानी  रुपादे के भाग लेने की खबर  पर पहले तो रावल मालदे काफी क्रोधित हुआ , मगर धारुमेघ के आध्यात्मिक उपदेश वाणी वार्ताओ से प्रभावित होकर बाद में  उसने  भी इस जम्मा जागरण में शिरकत करने की इच्छा प्रकट की थी ,लेकिन धारू मेघ ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी ,उनका कहना था कि बिना गुरु का उपदेश लिये ऐसा सॅभव नही था  ,तब धारु मेघ की पत्नी रतनादे  ने रावल मालदे को अपना शिष्य बनाकर उसके  जीवन मे आध्यात्मिक अँकुर प्रष्फुटित किये ,अंततः धारु मेघ ने भी रावल माल दे को अपनी वाणी, उपदेशो से लाभान्वित किया , तब से रावल मालदे मारवाड़ में आध्यात्मिक लोकनायक के रुप मे “मल्लीनाथ” के नाम से प्रसिद्ध हुये.
ऋषि पुराण “मेघवॅश इतिहास” के लेखक संत गोकुलदास  के खोज अनुसार धारु मेघ के भाई का नाम अजबा पॅवार था,अजबा  पॅवार की पत्नी का नाम ” देवु “था । जिनका पीहर ओसिया तहसील के बापिणी गाँव मे था (वहा उनका समाधि स्थल है ) जिन्हें जन मानस मे “माता देवू ” के नाम से जाना जाता है .माता देवु –  लोकनायक क्रांतिकारी महामानव मेघवाल बाबा रामसापीर की समाधि गुरु थी । इसके प्रमाण मे देखियै बाबा रामसापीर कृत एक वाणी का यह काव्याँश –
सन्त रामदे सत्त कर भाखै –
अपणा जीवो ने शरणै राखे ।
देवायत पॅवार धारु जी साखी ,
माता देवु वचन मुख भाखी ।।
 मगर कुछ लोग माता देवू को विक्रम सॅवत 17 वी शताब्दी मे हुए भक्त कवि हरजी भाटी का गुरु मानते  है , जो केवल मनोकल्पित भ्रान्त धारणा है ,क्योकि हरजी भाटी की स्वरचित वाणियो मे कही भी इन्है गुरु के रुप मे नही दर्शाया गया ।  इस प्रकार राजस्थान के महान ज्ञान मार्गी  शिरोमणी  संत  रिख धारु जी मेघ  तथा उनकी धर्म पत्नी रतनादे , भाई अजबा जी पंवार और उनकी पत्नी  “माता देवु” का इतिहास आज  भी सच्चे इतिहासकारों  के इन्तजार मे है,जो सच्चाई को सामने लाते हुये बहुजन लोक संत एवं क्रांतिकारी कवि और आध्यात्मिक साधकों से आम जन को अवगत करा सके ,यह सर्वविदित तथ्य है कि इन लोक संतो से उस वक्त की सामान्य जनता ही नहीं बल्कि राजा महाराजा भी प्रभावित व लाभान्वित हुऐ .
– राम सा मेघवंशी
( आकाशवाणी जोधपुर के लोक भजन गायक )

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