आम जन का मीडिया
Why are dalit politics angry by saying revolutionary Jai Bhim?

क्रांतिकारी जय भीम कहने से दलित राजनीति के धुरंधर खफा क्यों हैं ?

- कॉमरेड किशन मेघवाल

सवाल यह है कि आखिर जय भीम के अभिवादन को ‘क्रांतिकारी जय भीम’ में बदलने से दलित राजनीति के धुरंधर खफा क्यों हैं ?
वामपंथ में आंतरिक संघर्ष की मौजूदगी ने वामपंथ को निखारने का काम किया है अतः अब दलित राजनीति के आंतरिक संघर्ष को परिभाषित करने की जरूरत महसूस की जा सकती है।

केवल लाल-सलाम ठोकने से कोई कम्युनिस्ट नहीं बन सकता है उसी प्रकार केवल जय-भीम के उदघोष से ही सच्चे अम्बेडकरवादी होने का सबूत नहीं है; दोनों ही स्थानों पर दोहरेपन और पाखंड की गुंजाइश बनी रहती है । कुछ दिन पूर्व मैंने एक आलेख लिखा था जिसमें अपील की गई थी कि वर्ण संघर्ष और वर्ग संघर्ष के दुश्मन को पहचान कर निर्णायक संघर्ष छेड़ो, साथियों की उत्साही प्रतिक्रिया आई थी परंतु झिझक की झलक भी महसूस की गई थी।

आज कुछ पंक्तियाँ इस मकसद के लिए लिख रहा हूँ शायद आप सभी मेरा मार्गदर्शन कर सको,केवल तोता-रट्ट से बदलाव होने आशा की जा सकती है या फिर बाबासाहेब के सपनों के समाज का निर्माण करने के लिए वैज्ञानिक चेतना से लैस होकर सामाजिक क्रांति की जंग को सड़क से संसद तक लड़ने की आवश्यकता है?

दोस्तों, इतने विकट हालात है कि किसी संवेदनशील व्यक्ति की नींद तक गायब हो जाएँ । सब कुछ छीना जा रहा है, मुट्ठी भर लोगों की सल्तनत चल रही हैं बाकी सब खामौश हैं और ये खामौशियां आने वाली पीढ़ी के लिए बर्बादी का कारण बनेगी।अतः मात्र एक ही संघर्ष हैं कि मानवीय मुल्यों, भाईचारे, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए अपने आपको हर वक्त लड़ने के लिए तैयार करें।

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