चंद्रबाबू नायडू के बाद दक्षिण में अब बीजेपी का साथी कौन ?

-मोहम्मद इमरान

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अमरावती में बुलाए एक प्रेस कांफ्रेंस में चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया. उनकी तेलुगु देशम पार्टी के पास 16 लोकसभा सीटें हैं और एनडीए में दूसरी बड़ी साझेदार है. इससे पहले इसी साल जनवरी माह में, मुंबई की राजनीति से उठकर पूरे महाराष्ट्र में दबदबा बनाने वाली शिवसेना ने भी भाजपा के साथ अपना 29 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया था. शिवसेना जो 18 सीटों के साथ एनडीए की सबसे बड़ी सहभागी थी ने जनवरी में हुई राष्ट्रीय कार्याकारिणी की बैठक के बाद ये एलान कर दिया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव वो अकेले लड़ेगी.

गौरतलब है कि चंद्रबाबू नायडू अपनी मांगों को लेकर अपना कड़ा रुख अपनाते हुए पिछले कई महीनों से लगातार भाजपा से नाराज़ चल रहे थे और उनकी पार्टी के सांसद लगातार संसद के भीतर और बाहर प्रदर्शन कर रहे थे. विशेष राज्य का दर्ज़ा, राज्य पुनर्गठन अधिनियम को सही तरीके से लागू करने और ज़मीन आवंटन की स्वीकृति जैसे मसले बीजेपी और टीडीपी के बीच लगातार तकरार का कारण बने हुए थे. अपनी मुद्दों को लेकर बार बार उन्होंने ‘मित्र-धर्म’ के नाम से बीजेपी को चेताया था पर अरुण जेटली से मिल रहे जवाबो से वह नाखुश दिखे. इन्ही मुद्दों को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस की तरफ से राज्य सरकार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था. वाई एस जगनमोहन रेड्डी को लगातर मिल रहे जनसमर्थन से जनता और टीडीपी के कार्यकर्ताओं के बीच नायडू सरकार को लेकर सवालिया निशान खड़े हो रहे थे.

इसके अलावा टीडीपी का झुकाव अभिनेता से नेता बने और जनसेना के संस्थापक पवन कल्याण की तरफ भी ज्यादा हो रहा है. पवन कल्याण पिछले चार सालों से आंध्र प्रदेश के कई मुद्दों पर सक्रीय तौर पर भागीदारी दिखाई है और लगातार केंद्र और राज्य की सरकारों की आलोचना कर रहे हैं. युवाओं की भीतर उनकी पैठ लगातार बढती जा रही है, जिसका अनुमान उनके हर कार्यक्रम में भीड़ की लगातार बढती संख्या से लगाया जा सकता है. पवन कल्याण कापू की उपजाति बैल्जास से आते हैं, जोकि रायलसीमा क्षेत्र में काफी प्रभावशाली मानी जाती है और राज्य में हुए कापू आरक्षण आन्दोलन ने उनका कद बढाने में मदद की है. गौरतलब है कि पवन कल्याण ने 2014 का चुनाव नही लड़ा था, पर उन्होंने नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को समर्थन देने के साथ साथ प्रचार भी किया था. हालाँकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पवन कल्याण का झुकाव टीडीपी की ओर बढ़ रहा है, और इस बात को लेकर वो वाईएसआर कांग्रेस के निशाने पर लगातार रहते हैं.

हालाँकि इन दो पार्टियों के बीच खटास 2014 से ही शुरू हो गई थी, जब चंद्रबाबू नायडू की साली और केंद्र की यूपीए सरकारों में 2006 से 2014 तक मंत्री रही डी पुरंदेश्वरी को बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में अपना उम्मीदवार घोषित किया था. विदित है कि, जबसे चंद्रबाबू नायडू ने एनटी रामाराव से सत्ता हथियाई थी तब से पुरंदेश्वरी चंद्रबाबू नायडू की सार्वजनिक तौर पर आलोचना करती आईं हैं और उन्हें चंद्रबाबू नायडू का धुर विरोधी भी माना जाता रहा है. चूँकि भाजपा का कोई कद्दावर नेता आंध्र प्रदेश में मौजूद नही है इसलिए टीडीपी को गठबंधन तोड़ने कोई दिक्कत नही होगी. और अगर चंद्रबाबू नायडू 2019 में बीजेपी का साथ छोड़ते हैं तो बीजेपी न सिर्फ 3-4 सीटों का नुकसान होगा बल्कि लोकसभा के चुनावों में एंटी- इन्कम्बंसी से होने वाले नुकसान की भरपाई भी करना मुश्किल होगा.

(लेखक दलित एंड ट्राइबल स्टडीज एंड एक्शन, स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क ,टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, देवनार, मुंबई के छात्र है ,उनसे imraniramtwit@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )

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