विधानसभा चुनाव 2018: इस बार किधर जाएंगे दलित आदिवासी मतदाता ?

विधानसभा चुनाव- 1

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(भंवर मेघवंशी)


साढ़े चार साल तक संगठित रहने की बात कहने वाले अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के मतदाताओं की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चुनाव नजदीक आते ही वे बिखरने लग जाते है,जबकि अन्य समुदाय साढ़े चार साल झगड़ते है और चुनाव से 6 माह पहले एक होने लग जाते है।

दलित व आदिवासी समुदाय विभिन्न जातियों,संगठनों व विचारधाराओं के नाम पर छिन्न भिन्न हो जाता है,जबकि उसके वर्गशत्रु इन सब अवरोधों को पार करके एकजुट हो जाता है और सत्ता का स्वामी बन जाता है।

राजस्थान में 7 दिसम्बर 2018 को विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होने जा रहा है, जिसे लेकर एक सवाल मीडिया व सियासी पार्टियों में जेरे बहस है कि दलित आदिवासी तबका इस बार किसको सपोर्ट करेगा ?

किधर जाएगा राज्य का 31.3 प्रतिशत आबादी वाला यह समाज ? इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब शायद ही कहीं मिल पाएं । आज़ादी के बाद यह स्थिति संभवतः पहली दफा है,जब इतना बड़ा समुदाय निर्णायक भूमिका में नजर नहीं आ रहा है ।

राजस्थान में आज़ादी के बाद लगभग 4 दशक तक कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक रहा यह वर्ग 90 के दशक में छिटकने लगा,इसकी शुरुआत पंचायत राज संस्थाओं में दिये गए राजनीतिक प्रतिनिधित्व से हुई ।

त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था में चुने गए सीआर ,डीआर पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़े,इससे भाजपा को भी अपना आधार वंचित वर्गों में बढ़ाने का अवसर मिल गया,इस तरह कांग्रेस के मजबूत वोट आधार में सेंधमारी प्रारंभ हुई जो फिर कभी नहीं रुक पाई।

दलित आदिवासी समुदाय की नवजवान पीढ़ी के पास बसपा भी मजबूत विकल्प के रूप में उभरी,उसने भी कांग्रेस की जड़ें कमजोर की , इन वर्गों का इन्हीं बरसों में तेज़ी से भगवाकरण भी हुआ ।

आरएसएस ,बजरंगदल ,विहिप आदि ने दलित आदिवासी वर्ग को भाजपा के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका अंतिम फलित यह हुआ कि 2013 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सभी 34 सीटें कांग्रेस हार गई और लोकसभा की भी एक भी दलित आदिवासी रिजर्व सीट नहीं बच पाई ।

कुलमिलाकर दलित आदिवासी नवजवानों को भी हर हर मोदी-घर घर मोदी जैसे जुमलों ने बहुत प्रभावित कर दिया और भाजपा संघ की दलित आदिवासी हितैषी की ब्रांड निर्मित होने लगी ।

हालांकि भाजपा अपनी यह ब्रांडवैल्यु बचा नही पाई और शीघ्र ही वंचित वर्गों में आक्रोश फैल गया ,जिसने बीजेपी की चूलें हिला दी …

(जारी…….)

भंवर मेघवंशी (सम्पादक-शून्यकाल)

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