आम जन का मीडिया
When will you talk about this political displacement of Dalits and tribals? When will you talk about this political displacement of Dalits and tribals?

दलितों और आदिवासियों के इस राजनीतिक विस्थापन पर कब बोलेंगे ? 

– त्रिभुवन 
अभी साल भर बाद चुनाव आने वाले हैं। टिकटों की तैयारियां शुरू हो गई हैं। लेकिन मैं अपने दलित और आदिवासी राजनीतिक मित्रों और सभी पॉलिटिकल पार्टियों की टिकट वितरण संस्कृति को देखकर हैरान हूं।
कोई भी पार्टी किसी दलित या आदिवासी को जनरल सीट से टिकट नहीं देती है। कहने के लिए तो यह सीट जनरल होती है, यानी सबके लिए खुली, लेकिन एक लंबे काल खंड से इसका मतलब यह हो गया है कि इन सीटों पर दलितों और आदिवासियों का कोई अधिकार नहीं है। भले ही वे संबंधित सीट के वासी ही क्यों न हों। अगर उन्हें कोई चुनाव लड़ना है तो उन्हें ऐसी सीटों पर जाना होगा, जो रिज़र्व कैटेगरी की हों। यानी उस सीट पर जिस दलित या आदिवासी को टिकट मिलना है, उसे वंचित किया जाना तय है।
देश में रिजर्वेशन का मतलब यह नहीं है कि जितने प्रतिशत आरक्षण है, उतने पर ही उस जाति या वर्ग का अधिकार होगा। यह न्यूनतम आंकड़ा है। अगर आपको सामाजिक न्याय स्थापित करना है तो आपको न्यूनतम इतना तो करना ही होगा। लेकिन अब चालाक लोगों ने न्यूनतम को ही अधिकतम बनाकर उस पर कैपिंग कर दी है।
मुझे हैरानी होती है कि मेरी विधानसभा भले जनरल हो, लेकिन उसमें जीने-मरने और संघर्ष करने वाला दलित कभी वहां टिकट नहीं पाता है। वह उसका घर है। लेकिन वह वहां राजनीति नहीं कर सकता। वह क़ाबिल हो सकता है, लेकिन उसकी उस क़ाबिलियत पर सवालिया निशान लगा ही रहता है। मेरा प्रश्न ये है कि आख़िर मेरे विधानसभा क्षेत्र में मेरे ही दलित मित्रों को चुनाव लड़ने का हक़ क्यों नहीं दिया जाता? क्यों चुनाव में भी अलग दलित बस्तियां बसा दी गई हैं? क्यों आदिवासियों को किसी अन्य सीट पर जाना पड़ता है? क्यों रिजर्व कैटेगरी के इलाकों में वहीं के दलितों या आदिवासियों को टिकट नहीं दिया जाता?
यह कहां का न्याय है?
मेरी तो हैरानी ये है कि इस तरह की मांग न तो कोई दलित संगठन करता है और न ही कभी किसी मानवाधिकारवादी या नागरिक अधिकार संगठन ने ऐसी आवाज़ उठाई। क्यों? क्यों सबके सब दलित और आदिवासी बुद्धिजीवी इस पर चुप हैं? क्यों संविधानविद इस पर कभी नहीं बोलते? यह सही है कि काफी सारे लोग रिजर्वेशन के बहुत ख़िलाफ़ हैं। लेकिन ख़िलाफ़ होते हुए भी वे संगठन सार्वजनिक रूप से कभी इधर और कभी उधर पलटी खाते रहते हैं।
मेरा प्रश्न इतना सा है कि मेरे क्षेत्र में रहने वाले मेरे दलित मित्र या मेरे आदिवासी मित्र मेरे क्षेत्र में क्यों नहीं चुनाव लड़ सकते हैं? क्यों वहां से उन्हें टिकट नहीं मिल सकता है? आख़िर आप किसी को अपने घर से विस्थापित कैसे कर सकते हैं? जो लोग कश्मीर के पंडितों के विस्थापन पर दिन रात कोहराम मचाते हैं या जिन्हें रोहिंग्या की चिंताएं सताती हैं, आखिर उन्हें अपने अड़ोस-पड़ोस के दलित को किसी दूसरे क्षेत्र में भेजकर चुनाव लड़ने की सलाह देते समय, इस विस्थापन की याद क्यों नहीं आती? विस्थापन तो विस्थापन है। चाहे एक परिवार का हो या बस्ती का। चाहे पंडित का हो या अपंडित का! और अगर आप  लोकतंत्र में विस्थापन करते हैं तो यह एक रुग्ण लोकतंत्र है। इसका इलाज और परिष्कार अपरिहार्य है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है ,यह विचार उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में व्यक्त किये है ,उनकी टाइम लाइन से साभार )

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