आम जन का मीडिया
Made interesting by the Malaviya bye election!

माण्डलगढ़ उपचुनाव : गोपाल मालवीय की उम्मीदवारी क्या गुल खिलायेगी ?

- भंवर मेघवंशी

राजस्थान में आगामी 29 जनवरी को अलवर और अजमेर लोकसभा तथा मांडलगढ़ विधानसभा सीट के लिए मतदान होना है ,यह उपचुनाव मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के मध्य है ,क्योंकि तीसरी ताकत अभी भी राजस्थान में हकीकत नही बन पाई है ।
माना यह जा रहा था कि भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ की इस सीट पर दोनों स्थापित दलों के मध्य सीधा मुकाबला होगा ,लेकिन अब यह मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना प्रबल हो गई है ।

एक ओर जहां भाजपा ने भीलवाड़ा के जिलाप्रमुख शक्तिसिंह हाड़ा को मैदान में उतारा है ,वहीं कांग्रेस ने भीलवाड़ा के पूर्व जिलाप्रमुख इंजीनियर कन्हैया लाल धाकड़ के पुत्र विवेक धाकड़ पर ही पुनः भरोसा जताया है , यह भी अजीब संयोग ही है कि भाजपा उम्मीदवार का परिवार पुश्तैनी रूप से कांग्रेसी रहा है और कांग्रेस उम्मीदवार के पिता भाजपाई ! इसलिए दोनों ही पार्टियों के निष्ठावान कार्यकर्ता इन उम्मीदवारों को लेकर काफी असहज महसूस कर रहे है ।

सबसे रोचक स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और टिकिट के प्रबल दावेदार रहे गोपाल मालवीय ने नामांकन पत्र दाखिल कर कांग्रेस की धड़कनें तेज कर दी है ,राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि अगर गोपाल मालवीय चुनाव मैदान में डटे रहते हैं तो कांग्रेस अपनी इस परंपरागत सीट को फिर से गंवा सकती है ,आज जिस तरह से हजारों लोग गोपाल मालवीय के पर्चा दाखिल करते वक़्त मौजूद रहे ,वह कांग्रेस खेमे में भारी हलचल का कारण बन गया है ,लोग यह मान रहे है कि अगर त्रिकोणीय संघर्ष हुआ तो भाजपा उम्मीदवार शक्ति सिंह हाड़ा के विधानसभा में पँहुचने का रास्ता साफ हो सकता है ।

गोपाल मालवीय खानदानी रूप से कांग्रेसी नेता रहे है ,दो बार स्वयं सरपंच रहे है और एक बार उनकी पत्नी सरपंच रह चुकी है ,इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने प्रधान के रूप से काफी लोकप्रिय कार्यकाल पूरा किया है ,मालवीय का जातिगत कोई वोट बैंक नहीं होना भले ही उनके टिकट कटने का कारण बना हो ,मगर यह फैक्टर आम मतदाताओं के मध्य उनकी मजबूती का भी कारण बनता दिखलाई पड़ रहा है ,अन्य दोनो उम्मीदवारों की जाति के लोगों से अन्य समुदाय के आम मतदाताओं की नाराजगी किसी से छिपी हुई नहीं है ।

गौरतलब है कि मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्र में तकरीबन 48 फीसदी मतदाता दलित ,आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से आते है ,जिन्हें कांग्रेस का कोर वोट माना जाता रहा है ,इन मतदाताओं का मानस टटोलने पर जाहिर होता है कि इनका समर्थन धाकड़ या राजपूत केंडिडेट के बजाय गोपाल मालवीय के पक्ष में जाता दिख रहा है ,अगर ऐसा होता है तो इस सीट से कांग्रेस की पराजय तय है ,जबकि अब तक के इतिहास में महज़ दो बार ही अब तक यहां से भाजपा जीत पाई है ,लगभग 11 बार यहां से कांग्रेस जीत दर्ज करवाती रही है ,पिछली बार भी मोदी लहर के बावजूद यहां पर कांग्रेस प्रत्याशी का हार का अंतर जिले की अन्य सीटों से अपेक्षाकृत कम रहा था ,इस तरह देखे तो यह कांग्रेस की लगभग जीती हुई सीट है ,लेकिन अब गोपाल मालवीय की बगावत से यह सुनिश्चित जीत खटाई में पड़ती नजर आ रही है ।

चूंकि कांग्रेस प्रत्याशी विवेक धाकड़ न केवल सुशिक्षित युवा है ,बल्कि उनकी बेदाग छवि भी है और उनके साथ स्वयं की धाकड़ जाति का लगभग 35 हजार संख्या का मजबूत वोट बैंक भी है तथा वे कांग्रेस के अखिल भारतीय महासचिव डॉ सी पी जोशी के पसंद के उम्मीदवार है ,इसलिए इस सीट पर डॉक्टर जोशी की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है ,यह उनके अपने लोकसभा क्षेत्र का भी उपचुनाव है ,इसलिए उन्होंने अपने खासमखास सिपहसालारों के साथ मिलकर इस चुनाव को जीतने के लिए जबरदस्त व्यूहरचना भी कर रखी है ,यह चुनाव उनके राजनीतिक कैरियर के लिए भी काफी अहम भूमिका अदा करेगा इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन हेतु स्वयं जोशी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के साथ मौजूद रहे ,इस मौके पर उनकी उपस्थिति से जिले की जीर्ण शीर्ण कांग्रेस ने भी एकजुटता दिखाने की कोशिश की ,मगर आज जिस तरह से गोपाल मालवीय के पक्ष में निर्दलीय नामांकन पत्र दाखिल करवाने हेतु जनसैलाब उमड़ा उसने सारे समीकरण गड़बड़ा दिये हैं ,अब लोग कह रहे है कि अगर गोपाल मालवीय पीछे नहीं हटे तो यह विवेक धाकड़ के लिए नुकसानदेह साबित होगा और मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया और भाजपा उम्मीदवार के लिए संजीवनी बन सकता है।

यह तो वक़्त ही बताएगा कि गोपाल मालवीय हज़ारों की जनता के इस भरोसे पर टिके रहेंगे या पार्टी और उसके नेताओं के दबाव में आ कर नाम वापसी करके अपने समर्थकों की उम्मीदों पर पानी फेर देंगे या अंत तक डटे रह कर अपने वजूद को साबित करेंगे ! अगर वे मैदान में अंत तक मौजूदगी दर्शाएंगे तो उन्हें न केवल सहानुभूति मिल सकती है बल्कि दलित ,आदिवासी ,घुमन्तू ,अल्पसंख्यक और अतिपिछड़ी जातियों का भारी समर्थन हासिल हो सकता है । चूंकि भाजपा में गहरा असन्तोष शक्तिसिंह की उम्मीदवारी को लेकर व्याप्त है और कांग्रेस में तो खुलेआम बगावत हो ही चुकी है ,ऐसे में अगर गोपाल मालवीय के रणनीतिकार इस चुनाव को सुदृढ़ प्रबंधन से लड़ पाये तो कोई आश्चर्य नहीं कि परिणाम गोपाल मालवीय के पक्ष में भी जा सकते है ! यह दोनों पार्टियों के लिए एक सबक बन सकता है.

( लेखक शून्यकाल के संपादक और स्वतंत्र टिप्पणीकार है )

Leave A Reply

Your email address will not be published.