क्या हो 2 अप्रैल की नयी रणनीति !

-एच.एल.दुसाध

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एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने के मुद्दे पर हुए पर हुए ऐतिहासिक भारत बंद ने दलितों की साईक में भारी बदलाव ला दिया है. स्वतःस्फूर्त उस असाधारण बंद की सफलता का नशा अब भी उनपर हावी है और वे हर जुल्म और शोषण के खिलाफ 2 अप्रैल, 2018 का इतिहास दोहराना चाहते हैं. फिलहाल वे इस इतिहास को पहले की भांति ही एससी/एसटी के मुद्दे पर दोहराना चाहते हैं, इसका जोरदार संकेत गत 21 मईं को पटना में आयोजित ‘बिहार भीम आर्मी’ के पहले स्थापना दिवस के अवसर पर देखने को मिला. इस अवसर पर बिहार प्रदेश भीम आर्मी के अध्यक्ष डॉ.अमर आजाद ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट पर कोर्ट अड़ा हुआ है. इसके लिए केंद्र सरकार भी कोई अध्यादेश नहीं ला रही है. ऐसे में हालात को देखते हुए दलित आदिवासियों के इस संवैधानिक सुरक्षा के लिए फिर से सड़कों पर उतरेंगे. उन्होंने घोषणा किया कि 2 अप्रैल से भी बड़े आन्दोलन की तैयारी कर दी गयी है. इस घोषणा के साथ ही उन्होंने भीम आर्मी की ओर से एससी/एसटी को पहले की भाँति प्रभावी बनाने, चंद्रशेखर रावण की रिहाई, निजी क्षेत्र, न्यायपालिका तथा प्रमोशन में आरक्षण लागू करने की मांग उठाई. भीम आर्मी से पहले भी कई संगठन इस एक्ट पर 2 अप्रैल दोहराने की बात उठाते रहे हैं. इस विषय में चर्चित एक्टिविस्ट व शिक्षाविद डॉ कौशल पंवार का 4 मई का सोशल मीडिया पर आया बयान लोगों को खासा आकर्षित किया . उन्होंने कहा था,’ दलितों, बहुजनों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को मिलकर एक रणनीति बनाने की बहुत ज़रूरत है अन्यथा हमारे अधिकार ये सरकारें ऐसी ही छिनती रहेगी।‘ उन्होंने कोर्ट और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए आह्वान किया था,’ दोबारा से 2 अप्रैल दोहराने और रणनीति बनाने की ज़रूरत है।‘

इसमें कोई शक नहीं कि विभिन्न दलित संगठन एससी/एसटी के मसले पर फिर से 2 अप्रैल दोहराने का मन बना रहे हैं .इसके लिए वे नयी रणनीति की जरुरत भी महसूस कर रहे है.लेकिन कोई नई रणनीति बनाते समय इस बात को ध्यान में रखना जरुरी है कि एससी /एसटी एक्ट के पीछे मुख्य लक्ष्य हिन्दुओं के अत्याचार का प्रतिकार करना है. अगर लक्ष्य यही है तब तो इस पर बाबा साहेब के चिंतन के आधार पर रणनीति बनाने से श्रेयस्कर और क्या हो सकता है!

जहां तक प्रतिकार का प्रश्न है,डॉ.आंबेडकर ने वर्षों पहले उसका मार्गदर्शन कर दिया था. उन्होंने इस मुद्दे पर दलित समुदाय को बताया था-‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न हैं.एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है,बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म, शोषण तथा उत्पीड़न का प्रश्न है…किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है, इसका विचार करना आवश्यक है. इस वर्ग कलह से अपना बचाव कैसे होगा, इस प्रश्न का निर्णय करना मैं समझता हूँ मेरे लिए कोई असंभव नहीं है.यहाँ इकठ्ठा हुए आप सभी लोगों को एक ही बात मान्य करनी पड़ेगी और वह यह कि किसी भी कलह में,संघर्ष में,जिनके हाथ में सामर्थ्य होती, उन्ही के हाथ में विजय होती है.जिनमें सामर्थ्य नहीं उन्हें अपनी विजय की अपेक्षा रखना फिजूल की बकवास है. इसके समर्थन में अन्य कोई आधार खोजने की बात ही फिजूल है. इसलिए तमाम दलित वर्ग को अब अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकट्ठा करना बहुत जरुरी है.’

शोषण-उत्पीड़न का प्रतिकार के लिए बल संचित करने का सुझाव हुए उन्होंने आगे कहा था-‘मनुष्य समाज के पास तीन प्रकार का बल होता है. एक है मनुष्य-बल . दूसरा है धन-बल और तीसरा है मनोबल. मनुष्य बल की दृष्टि से आप अल्पसंख्यक ही नहीं, संगठित भी नहीं हैं. धन-बल की दृष्टि से देखा जाय तो आपके पास थोड़ा-बहुत जनबल तो है भी लेकिन धनबल तो बिलकुल ही नहीं है. सरकारी आकड़ों के अनुसार देश की कुल आबादी में 55 प्रतिशत जो जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही है, उसका 90 प्रतिशत अंश दलित वर्ग का ही है. मानसिक बल की तो उससे भी बुरी हालत है. सैकड़ो साल से हिन्दुओं द्वारा हो रहे जुल्म, छि-थू, मुर्दों की भांति बर्दाश्त करने के कारण प्रतिकार करने की आदत पूरी तरह नष्ट हो गयी है. आप लोगों के आत्मविश्वास,उत्साह और महत्वाकांक्षा की चेतना का मूलोच्छेद कर दिया गया है. हम भी कुछ कर सकते हैं इसका विचार ही किसी के मन में नहीं आता.’
मतलब साफ़ है बाबासाहेब ने हिन्दुओं के अत्याचार से बचाने के लिए एकमेव उपाय दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करना बताया था. वास्तव में डॉ.आंबेडकर ने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो नुस्खा बाताया था वह सार्वदेशिक है. सारी दुनिया में ही जो अशक्त रहे उनपर ही सशक्त वर्ग का अत्याचार व उत्पीड़न होता रहा और सर्वत्र ही ऐसे लोगों को सशक्त बनाकर सबल वर्गों के शोषण-उत्पीड़न से निजात दिलाई गया . किन्तु हिन्दुओं के बर्बर अत्याचार से निजात दिलाने के लिए दलितों को सशक्त बनाना अन्य समाजों की अपेक्षा ज्यादा कारगर हो सकता है. कारण, जो हिन्दू समाज अस्पृश्यों के विरुद्ध बराबर ही आक्रमणात्मक रहता है, उसकी एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक कमजोरी भी है. यह समाज सुदूर अतीत से ही सख्त का भक्त रहा है और अब भी है . अस्पृश्यों को सशक्त बनाकर ही उनके शोषण-उत्पीड़न से निजात दिलाया जा सकता है.

काबिले गौर है कि सारी दुनिया में ही सभ्यता के हर काल में धरती की छाती पर अशक्त समुदायों का वजूद रहा और ऐसा इसलिए हुआ कि जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने जाति, नस्ल, धर्म इत्यादि के आधार बंटे विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक- का असमान बंटवारा कराकर ही अशक्त समूहों को जन्म दिया. सारी दुनिया में अश्वेतों,महिलाओं व अन्य अल्पसंख्यक अशक्त समूहों की समस्या पर ध्यान दे तो पाएंगे कि उनको शक्ति के स्रोतों से दूर रखकर ही अशक्त बनाया तथा उत्पीडित गया. सारी दुनिया की पराधीन कौमों के साथ यही समस्या रही कि विजेताओं ने उन्हें शक्ति स्रोतों से वंचित कर ही उन्हें गुलाम बनाया. यदि सारी दुनिया के विजेता गुलाम बनाए गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब शेयर दिए होते, दुनिया में कहीं भी स्वतंत्रता संग्राम सगठित करने की जरुरत नहीं पड़ती. सदियों से सारी दुनिया में स्वाधीनता और सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई और कुछ नहीं, शक्ति के स्रोतों में अशक्त लोगों को हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई मात्र है.

जिन मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति दलितों जैसी नहीं रही. मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी कौम को शक्ति के प्रमुख स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक शैक्षिक और धार्मिक- से पूरी तरह बहिष्कृत नहीं किया गया. बाबा साहब के ऐतिहासिक प्रयासों से उनके बहिष्कार के अंत और सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई. उन्होंने संविधान में जो आरक्षण का प्रावधान किया उससे शक्ति के स्रोतों में कुछ –कुछ हिस्सेदारी मिली और वे बाबू, शिक्षक,आइएएस,पीसीएस,डॉक्टर, इंजीनियर इंजीनियर इत्यादि बनकर सशक्त होने लगे. किन्तु शासकों ने आरक्षण के खात्मे के मकसद से 24 जुलाई,1991 को जो नव उदारवादी नीति ग्रहण की, उससे पुनः उनके आरक्षण पूर्व युग में जाने के लक्षण दिखने लगे हैं. इसे समझने के लिए हाल के दिनों में आई कुछ रिपोर्टों पर नजर दौड़ा लेना होगा.

गत 22 जनवरी, 2018 को प्रकाशित ऑक्सफाम की रिपोर्ट ने बहुजन समाज को भयावह संकट से रूबरू करा दिया है. रिपोर्ट से पता चला है कि देश की टॉप की 1% आबादी के हाथ में 73% दौलत चली गयी है. इससे भी बड़ी चिंता का विषय यह है कि टॉप की 10% आबादी का 90% से अधिक धन-संपदा पर कब्ज़ा हो गया है और बाकी प्रायः 90% आबादी 10% से भी कम धन पर गुजर-वसर करने के लिए मजबूर है. इससे दलित,आदिवासी पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित बहुसंख्य आबादी के समक्ष विशुद्ध गुलाम के रूप में तब्दील होने के लक्षण स्पष्ट हो चुके है. इनमें बमुश्किल 1% धन-संपदा पर निर्भर दलित समुदाय के निकट भविष्य में गुलाम बनने में तो बिलकुल ही सन्देह नहीं रहना चाहिए.

जमीन-जायदाद, व्यवसाय-वाणिज्य से शून्य दलित समुदाय का सशक्तिकरण आरक्षण से प्राप्त नौकरियों पर निर्भर था और धनार्जन का यह एकमात्र स्रोत पूरी तरह सूख चुका है. कारण शासकों, विशेषकर मोदी सरकार की साजिश से आरक्षण महज कागजों की शोभा बनकर रह गया है. ऐसे में आगामी कुछ वर्षों में इनकी गुलामी स्पष्ट दिखने लगेगी, इसका कयास कोई भी लगा सकता है. इस बदले हालत में जहाँ वे गुलाम बनेंगे, वहीँ उनके उत्पीड़न का सिलसिला भी तेज होना तय है. ऐसे में आज उत्पीड़न से कई गुना महत्त्व का विषय गुलामी से मुक्ति है. इस बदले हालात में दलित,आदिवासी,पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित तबकों को गुलामी से तभी बचाया जा सकता है जब इनके लिए शक्ति के समस्त स्रोतों में ही वाजिब हिस्सेदारी मिले.

दलित यदि फिर से 2 अप्रैल, 2018 के इतिहास को दोहराना चाहते हैं तो उन्हें आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को साथ लेकर शक्ति के समस्त स्रोतों(न्यायपालिका- मिलट्री सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया, ज्ञान के केन्द्रों, विज्ञापन निधि,पौरोहित्य: ग्राम पंचायत, शहरी निकाय, संसद, विधानसभा की सीटों, मंत्रिमंडलों इत्यादि ) के वाजिब बंटवारे के मुद्दे पर भारत बंद की रणनीति बनानी पड़ेगी. सिर्फ एससी/एसटी एक्ट में सुधार, निजीक्षेत्र – न्यापालिका और प्रमोशन में आरक्षण से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. यह सब चुके हुए मुद्दे हैं: बदले हालत में निर्भूल मुद्दा है विविध सामाजिक समूहों के मध्य ‘शक्ति के स्रोतों का वाजिब बंटवारा ‘.

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