अब ये आरएसएस की ‘मुख्यधारा’ क्या बला है !

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(भँवर मेघवंशी)

हर कोई हर किसी को मुख्यधारा से जोड़ने में लगा है ।

कोई दलितों को तो कोई आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ रहा है ,किसी को फिक्र है कि देश का अल्पसंख्यक मुख्यधारा से दूर है ।

बरसों बाद आर एस एस को पता चला है कि घुमन्तू समुदाय मुख्यधारा में नहीं है ,उसे मुख्यधारा में लाना है ,इसके लिए मास्टर प्लान तैयार है ।

मैं कईं बार सोचता हूँ कि जब देश का अनुसूचित जाति, जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग ,भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक समूह, कश्मीरी ,पूर्वोत्तर के लोग ,नक्सली आदि इत्यादि मुख्यधारा में नहीं है ,मतलब कि देश की 90 फीसदी से अधिक जनसंख्या इस कथित मुख्यधारा में नहीं है तो महज 10 फीसद से भी कम लोगो की धारा मुख्यधारा कैसे हो गई ?

इस मुख्यधारा का मापदंड क्या है ? क्या देश के सवर्ण समुदाय की वर्चस्ववादी धारा ही मुख्यधारा है या शोषकों की धारा मुख्यधारा है ?

मेहनतकश, संघर्षरत ,शिल्पकारों,हुनरबाज़ों ,निर्माताओं की धारा इस देश की मुख्यधारा नहीं है ,निकम्मे शोषकों की धारा इस देश की मुख्यधारा है तो माफ कीजिये हमें इस मुख्यधारा में आने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है ।

और हां , संघ अपनी धारा को इस देश की मुख्यधारा न समझें ,क्योंकि वह न तो राष्ट्रीय है और न ही उसकी धारा कोई मुख्यधारा है ,यह अलग बात है कि भागवत जी खुद को राष्ट्र समझते हैं और अपने संगठन को राष्ट्रीय ,जबकि वो एक दबाव समूह मात्र है ,आज भी इस देश के सक्षम सवर्ण पुरुषों का ,राष्ट्रीय तो कतई नहीं ।

रही बात घुमन्तुओं को कथित मुख्यधारा में लाने की तो मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि वो जिधर चल पड़ते है ,धाराएं बना लेते है ,हर धारा घुमन्तुओं के पदचिन्हों को खोजते हुये अपनी राह बनाती है ।

घुमन्तुओं को अपनी धारा में लाने के बजाय उनको इस देश की सत्ता,संसाधन में बराबर की भागीदारी दीजिये।

उन्हें आपकी कथित मुख्यधारा की भीख नहीं सम्पूर्ण भागीदारी चाहिए ।

घुमंतुओं के संघीकरण को राष्ट्र की मुख्यधारा मत कहिये।

भंवर मेघवंशी
(लेखक दलित आदिवासी एवं घुमन्तू अधिकार अभियान राजस्थान ‘डगर’ के संस्थापक निदेशक है )

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