आम जन का मीडिया
What is the agenda of non-BJP intellectuals in 2019?

2019 में क्या हो गैर-भाजपाई बुद्धिजीवियों का एजेंडा ?

-एच.एल.दुसाध

अप्रतिरोध्य बन चुकी भाजपा के 2019 में पुनः सत्ता में आने की संभावना से तमाम गैर-राष्ट्रवादी, विशेषकर आरक्षित वर्ग के बुद्धिजीवी बुरी तरह त्रस्त है. उनका मानना है कि मोदी राज में जो फैसले लिए जा रहे हैं, वह जन्मजात वंचितों के हिसाब से दु:स्वप्न है. सरकार भारी संख्या में लाभजनक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने में अभूतपूर्व तत्परता दिखलाने के साथ –साथ बेख़ौफ़ होकर सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई लागू किये जा रही है. कुल मिलाकर जिस आरक्षण के चलते देश का जन्मजात वंचित वर्ग (दलित-आदिवासी और पिछड़े) राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ रहा था, उसे 24 जुलाई ,1991 से लागू नव उदारवादी अर्थनीति के जरिये कागजों तक सिमटाने का जितना काम नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने दो दशकों में किया, उतना नरेंद्र मोदी ने प्रायः तीन सालों में कर दिखाया है और यदि वह पुनः सत्ता में आते हैं तो आरक्षित वर्गों का बचा-खुचा संवैधानिक अधिकार पूरी तरह ख़त्म हो जायेगा.

कुछ ऐसा ही विचार पत्रकार वर्ग का है जिसका सही प्रतिबिम्बन गत 7 जनवरी को देश के एक प्राख्यात पत्रकार के प्रकाशित लेख में हुआ हुआ. उन्होंने मोदी राज में फिल्ड रिपोर्टरों में उपजी असुरक्षा की भावना को देखते हुए खुलकर लिख डाला कि यदि यह सरकार 2019 में पुनः सत्ता में आती है तो भारतीय पत्रकारिता की ताबूत में आखरी किल ठुक जाएगी. बहरहाल देश के विभिन्न वर्गों के लिए प्रायः दु:स्वप्न बन चुकी मोदी सरकार को रोकने की रणनीति विचार करते हुए मुख्यधारा के एक पत्रकार ने हाल ही में ‘2019: विकल्प सिर्फ जनांदोलन ‘ शीर्षक से एक लेख लिखकर देश के गैर-राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों को एक बड़ा सन्देश देने का बलिष्ठ प्रयास किया है. उन्होंने लिखा है-:

‘कांग्रेस की हालत आज किसी भी रूप में ठीक नहीं है.सांगठनिक तौर पर कांग्रेस कमजोर है और इसके दूर होने की कोई सम्भावना नहीं नजर आ रही है. ये बात और है कि राहुल गाँधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं, पर कांग्रेस में फिलहाल नेताओं का अकाल दिखाई दे रहा है. वामपंथी और दूसरे क्षेत्रीय दल भी विकल्प की राजनीति से अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं, वहीँ भाजपा का मनोबल लगातार बढ़ता जा रहा है. 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, इसे देखते हुए भाजपा विरोधी दलों की निष्क्रियता हैरान करने वाली लगती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में यदि नरेंद्र मोदी वापस सत्ता में आते हैं तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा और इसके बाद जो कुछ होगा , उसकी कल्पना अभी नहीं की जा सकती है. देश का लोकतांत्रिक खतरे में पड़ सकता है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा को चुनावों में पराजित करने के लिए जनता को जगाना होगा. इसके लिए चुनावी समीकरण साधने से ज्यादा जरुरी है ये है कि देश में छात्रों, युवाओं, मजदूरों-किसानों के आन्दोलन खड़े किये जाएँ. सुविधाभोग की राजनीति से भाजपा को हरा पाना संभव नहीं हो सकेगा. नरेंद्र मोदी का व्यापक विकल्प सिर्फ जनांदोलन ही हो सकता है.’

जाहिर है उपरोक्त टिप्पणी के लेखक राजनीतिक दलों की निष्क्रियता से निराश हैं और वे चाहते हैं कि बुद्धिजीवी वर्ग भाजपा को रोकने की दिशा में आगे बढे एवं मोदी सरकार के खिलाफ जनांदोलन खड़ा करे. पर, यहां सवाल पैदा होता है, क्या बुद्धिजीवी जनांदोलन खड़ा कर भाजपा के हराने लायक माहौल बना पाएंगे! चुनावों में भाजपा को सीधी चुनौती देंगे सिर्फ राजनीतिक दल. ऐसे में क्या बेहतर नहीं होगा कि जनांदोलन खड़ा करने की बजाय बुद्धिजीवी एक मोर्चा बनाकर गैर-भाजपाई दलों पर एकबद्ध होकर सही एजेंडे के साथ 2019 के चुनावी मैदान में उतरने के लिए दबाव बनायें! हलाकि कहना जितना आसान है, व्यवहारिक रूप में विपक्षी दलों को इसके लिए तैयार करना, उतना ही कठिन है. एकता के बिना गैर-भाजपाई दल कुछ भी नहीं कर पायेगे, यह सत्य जानने के बावजूद वे अज्ञात कारणों से महागठबंधन के लिए मन बनाते दिख नहीं रहे हैं. और जब गठबंधन के लिए ही आगे नहीं आ रहे हैं तब उन्हें एजेंडा विशेष पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता. बहरहाल भाजपा विरोधी दलों पर दबाव बनाने के बजाय यदि ऐसी स्थितियां बनती हैं कि हमारे सामने जनांदोलन खड़ा करने के सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं बचता , तब हम वह जनांदोलन खड़ा करेंगे किस मुद्दे पर: देश में छात्रों, युवाओं, मजदूरों-किसानों को आंदोलित करने के मुद्दे क्या होंगे , यह लाख टके का सवाल है!

अबतक विभिन्न बुद्धिजीवियों की ओर से भाजपा को घेरने के लिए जो मुद्दे सुझाये गए हैं, वे हैं महंगाई, बेरोजगारी, 100 प्रतिशत विदेश निवेश, कार्पोरेटपरस्त नीति और साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने जैसे मुद्दे. हाल ही में एक नयी सम्भावना के रूप उभर रहे कन्हैया कुमार ने एक बड़े चैनल को साक्षात्कार देते हुए कहा है,’इस में जो राजनीतिक हालात हैं,उसमे जो शोर-गुल है , वह मुद्दा ही नहीं है.आसल मुद्दा है महंगाई, बेरोजगारी ,जाति-धर्म और लिंग के आधार पर उंच-नीच का भेदभाव’. हो सकता है जिस तरह 28 दिसंबर, 2017 से महंगाई, बेरोजगारी, जीडीपी आधारित विकास के मुद्दे पर मसाद से शुरू हुआ अन्दोलाद धीरे-धीरे पुरे ईरान को अपने चपेट में लेते जा रहा है, उससे उत्साहित होकर भाजपा विरोधी बुद्धिजीवी भी और शिद्दत के साथ मंहगाई, बेरोजगारी, मोदी की कार्पोरेटपरस्त नीतियों, साम्प्रदायिकता, और दलित-पिछड़ों के खिलाफ हो रहे हमलों के आधार पर भाजपा के खिलाफ जनांदोलन संगठित करने का मन बनावें . लेकिन ऐसा करने के पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना बहुत जरुरी है.

पहला, उग्र मार्क्सवादी दीपंकर भट्टाचार्य के शब्दों में,’मोदी का नया गरीब समर्थक राज गरीबों की विपन्न स्थितियों में सुढार की योजनाओं,आर्थिक समावेशन और डिजिटल सशक्तीकरण के वादों आदि ने भी मिलकर कुछ अलग प्रभाव छोड़ा है.इसमें मोदीराज के गरीब समर्थक दिखावे को चुनौती देने के काम पर विपक्ष को ध्यान देना होगा’. दूसरा, यह कि विपक्ष तो कुम्भकर्णी निद्रा में सोया है, पर भाजपा देश की दिशा तय करने वाले यूपी की सत्ता योगी को सौंपकर ध्रुवीकरण की जमीन तैयार कर ली है और योगी 2019 को ध्यान में रखते हुए अपने कर्तव्य निर्वहन में अक्लांत भाव से मुस्तैद हैं. एक खास बात यह भी है कि भाजपा सामाजिक विभाजन के अपने एजेंडे को विस्तार देते हुए दलित और पिछड़ी जातियों में आपसी विभाजन की दिशा में सधे कदमों से आगे बढ़ रही है. इस दिशा में उसने एक पिछड़ा वर्ग आयोग गठित कर दिया है ,जो पिछड़ा वर्ग की केन्द्रीय सूचि की जातियों को तीन उपवर्ग में विभाजित करेगा और तीनों उपवर्गों के लिए अलग-अलग से आरक्षण का प्रतिशत तय किया जायेगा. परिणामस्वरूप जहाँ पिछड़ी जातियों में परस्पर दूरी बढ़ेगी , वही मोदी सामाजिक न्याय के एक नए मसीहा के रूप में उभरेंगे.

एक अन्य बात जिसे ध्यान में रखना जरुरी है, वह यह कि आजाद भारत की राजनीति के सपनों के सबसे बड़े सौदागर नरेंद्र मोदी 2019 का महामुकबला जीतने के लिए ‘न्यू इंडिया का विजन’ प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिसके सम्मोहन से निरीह मतदाताओं को बचाना आसान नहीं होगा.और सर्वोपरि 19 राज्यों की सत्ता पर काबिज भाजपा के साथ साधु-संतों -मिडिया और कार्पोरेट के साथ भारत के प्रभु समाज ने अपना भविष्य जोड़ लिया है.

ऐसे हालात में क्या महंगाई , बेरोजगारी, कार्पोरेटपरस्त नीतियों, एफडीआई, धर्मनिरपेक्षता इत्यादि जैसे हर चुनावों में उठाये जानेवाले मुद्दों के सहारे भाजपा के खिलाफ जनांदोलन खड़ा किया जा सकता है? कोई भी व्यक्ति यदि इमादारी से इस पर विचार करेगा तो उसका जवाब होगा,’नहीं’! ऐसे में क्या सामाजिक न्याय के विस्तार अर्थात मिलिट्री और न्यायपालिका सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों , सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, आउट सोर्सिंग जॉब, पौरोहित्य इत्यादि सभी क्षेत्र में दलित, आदिवासी,पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित तबकों के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में बंटवारे से बेहतर कोई मुद्दा हो सकता है! स्मरण रहे भाजपा की एकमेव कमजोरी सामाजिक न्याय विरोधी इसका चेहरा है. और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव लालू प्रसाद यादव ने उसे इसी मुद्दे गहरी शिकस्त देकर भाजपा विरोधियों को एक नयी राह दिखाने का दृष्टान्त स्थापित कर दिया है.

( लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष हैं )

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