हमारा असल धर्म क्या है ?

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(हिमांशु कुमार)

सारे इंसानी समाज का धर्म यह है की दुनिया को तकलीफ से मुक्त बनाया जाये  ,

दुःख से मुक्त यानी ?

कोई भूखा न रहे , कोई बिना इलाज न मरे , किसी को बेईज्ज़त ना किया जाये , किसी के साथ शारीरिक हिंसा ना हो , सभी इंसानों की इज्ज़त , अधिकार और अवसर बराबर हों ,

क्या ऐसा मानना कम्युनिस्ट विचारधारा है ?

नहीं बिलकुल नहीं ? सभी धर्म बराबरी की बात कहते हैं ?

सभी धर्म दुःख से मुक्ति की बात कहते हैं .

लेकिन ऐसी कोशिश तो रूस चीन और दुसरे कम्युनिस्ट देशों में फेल हो चुकी है .

तो क्या हुआ ?

अगर एक बार कोई प्रयोग फेल हुआ तो इसका मतलब यह तो नहीं है कि दुनिया में अब कभी भी इंसानी समाज को दुखों से मुक्त करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ,

ठीक है तो इस तरह की दुनिया बनाने में बाधा क्या है ?

आँखें खोल कर अपने आस पास देखिये,इंसानी समाज को दुःखी रखने वाली चीज़ें दिखाई देनी शुरू हो जायेंगी ,

बल्कि बाहर भी मत देखिये ,

अपने भीतर देखिये ! संसार को दुखी बनाने वाली आपको अपने भीतर मिल जायेंगी

आप मानते हैं कि कुछ लोग जन्म से छोटी ज़ात के होते हैं और कुछ लोग ऊंची ज़ात के होते हैं ,

आप मानते हैं कि आपके धर्म के अलावा दुसरे धर्म वाले वहशी और बेवकूफ होते हैं ,

आप मानते हैं कि आपका देश सबसे अच्छा है और पड़ोसी राष्ट्र सबसे खराब है ,

आप मानते हैं कि मेहनत करने वालों का गरीब रहना ठीक है ,

और आपका सिर्फ कम्प्यूटर चला कर या फोन पर आफिस के कुछ फोन करके लाखों रुपया कमा लेना न्यायोचित है ,

आप ऐसा क्यों सोचते हैं ?

असल में आप हमेशा खुद को ठीक मानते हैं ,

जैसे अगर आप हिन्दू हैं तो आप मुसलमानों को गलत मानते हैं ,

आप अगर सवर्ण हैं तो आप मानते हैं की दलितों नें आरक्षण के बल पर सवर्णों के अधिकार छीन लिए हैं ,

अगर आप भारतीय हैं तो आप पकिस्तान को गलत और उसे अपने देश का दुश्मन मानते हैं ,

लेकिन सच किसी ख़ास परिस्थिति में होने के कारण बदलता नहीं हैं ,

सच को अपनी परिस्थिति से हट कर तभी समझा जा सकता है जब आप को वैज्ञानिक ढंग से किसी मुद्दे का परिक्षण करना आता हो ,

जैसे समाज शास्त्र की पुस्तक होती है ,

वह जाति व्यवस्था के बारे में वैज्ञानिक ढंग से बतायेगी,

क्या आप भी उसी तरह से जाति व्यवस्था के बारे में अपने सवर्ण पूर्वाग्रहों से आज़ाद होकर सोच सकते हैं ?

इसी तरह साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद के बारे में वैज्ञानिक ढंग से सोचने की आदत डालनी पड़ेगी ,

यही तरीका है दुनिया को तकलीफों से मुक्त करने का ,

लेकिन दुनिया के ज़्यादातर लोग गलत ढंग से सोचने की आदत डाल चुके हैं,

वो खुद की परिस्थिति के मुताबिक दुनिया को मानते हैं ,

वो अपने अलावा दूसरों से नफरत करते हैं ,झगड़े करते हैं युद्ध करते हैं , हथियार बनाते हैं ,

आपके राजनेता आपकी गलत तरीके से सोचने की कमजोरी का फायदा उठाते हैं

वो आपको युद्ध के लिए भड़काते हैं , आपमें नकली राष्ट्रभक्ति पैदा करने के भाषण देते हैं ,

ज्यादातर जगहों पर बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़का कर सत्ता पर कब्ज़ा किया जाता है ,

ऐसा भारत में भी होता है , पकिस्तान में भी होता है , अफ्रीका में भी होता है , और अमेरिका में भी इस बार यही खेल खेला गया है ,

क्या इस सब को समझना इतना कठिन है ?

थोड़ी देर के लिए अपने आप को अपनी परिस्थिति वाली सोच से आज़ाद कर के सोचिये ,

जैसे आप मुसलमान हैं तो थोड़ी देर हिन्दू की जगह खड़े होकर सोचिये ,

भारतीय हैं तो खुद को पाकिस्तानी मान कर सोचिये ,

अमीर हैं तो खुद को मजदूर की जगह रख कर सोचिये ,

आपको सच का थोडा प्रकाश मिलने लगेगा ,

आप जिन लोगों को मानवाधिकार कार्यकर्ता कह कर गालियाँ देते हैं वे लोग बस यही तो करते हैं ,

वे खुद को आदिवासी की या दलित की या अल्पसंख्यक की जगह रख कर सोचते हैं ,

लेकिन चूंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता आपके समूह के स्वार्थ से अलग न्याय की बात करते हैं

तो आप कहते हैं कि ये मानवाधिकार कार्यकर्ता विदेशी एजेंट हैं और देशद्रोही हैं या कम्युनिस्ट हैं ,

असली बात यह है कि आपको खुशी देने वाली बातें कर के जो लोग आपको दुसरे धर्म वालों से या पड़ोसी देश के खिलाफ बातें करके सत्ता प्राप्त कर रहे हैं ,

वे लोग आपके बच्चों के लिए एक खतरनाक दुनिया बना रहे हैं ,

एक ऐसी दुनिया जो हथियारों से भरी हो ,

जिसमें लोग एक दुसरे से नफरत करते हों ,

जहां अमीर अपने मुनाफे के लिए हवा समुन्दर और पानी में ज़हर घोलने के लिए आज़ाद हों ,

क्या आप अपने बच्चों को ऐसी दुनिया देकर मरना चाहते हैं ?

हम आपसे कम्युनिस्ट बन जाने के लिए नहीं कह रहे ,

हम चाहते हैं आप खुद सोचें कि इस दुनिया की समस्या क्या है ?

और उनका इलाज क्या है ?

(हिमांशु कुमार)

 

(फोटो क्रेडिट-stickeryou.com)

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