आम जन का मीडिया
Violence never, not ever!

हिंसा कभी नहीं ,कहीं नहीं !

हिंसा कतई स्वीकार नहीं है !

दलित एवं आदिवासी संगठनों द्वारा बुलाये गये भारत बंद के दौरान हुई हिंसा अत्यंत दुखद है ,इससे बचा जा सकता था .बार बार यह अपील की गई थी कि आन्दोलन शांतिपूर्ण रहना चाहिए ,किसी भी कीमत पर कुछ भी हिंसात्मक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए ,उसका व्यापक असर भी हुआ कि अधिकांश स्थानों पर अपेक्षाकृत काफी शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुआ ,लेकिन इस दरमियान जहाँ जहाँ भी हिंसा हुई है ,वह ठीक नहीं हुआ .

सवाल है कि हिंसा किसने शुरू की ,कौन हिंसा भड़का रहे थे ,कौन लोगों को उकसा रहे थे ,वो कौन समूह थे ,जो गाड़ियाँ तोड़ रहे थे ,आगजनी कर रहे थे ,आखिर यह क्यों हुआ ? प्रर्दशन कर रहे लोगों के पास नंगी तलवारें नहीं थी ,रायफल नहीं थी ,जैसी कि अन्य भारत बन्दों के दौरान देखने को मिलती रही है .हां डंडे और झंडे जरुर लोगों के हाथों में थे ,अगर उन्होंने आवेश में कुछ तोड़फोड़ की ,ट्रेने रोकी ,बसों में आग लगाई या किसी भी व्यक्ति अथवा सम्पत्ति को नुकसान पंहुचाया गया है तो यह निंदनीय घटनाक्रम है ,इसकी उम्मीद उन लोगों से नहीं थी ,जो संविधान की रात दिन दुहाई देते है ,जो संविधान को ही अपना धर्मग्रंथ और आदर्श मानते है और जो स्वयं को इस देश का मूलनिवासी कहते है .

जिनको संविधान और लोकतंत्र से नुकसान हुआ है ,वो तो कानून तोड़ेंगे ही ,हिंसा करेंगे ही ,लेकिन बाबा साहब के अनुयायियों को हिंसा का रास्ता लेने से बचना होगा .

मैं हिंसा की किसी भी गतिविधि का समर्थन नहीं करता ,जो कुछ भी भारत बंद के दौरान हुआ ,वह दुर्भाग्यपूर्ण है और अस्वीकार्य है ,इसकी कड़ी भर्त्सना करते हुये बेहद विनम्रता से कुछ और बातें कहना चाहता हूँ –

सरकार इस हिंसा की उच्च स्तरीय जाँच करें कि आखिर कौन लोग हिंसा कर रहे थे और कौन इनके पीछे है ,यह भी देश के सामने आना चाहिये कि इस हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित लोग कौन है ? अगर यह हिंसा दलित आदिवासी प्रदर्शनकारियों ने की है ,तो स्वाभाविक है कि इसके शिकार गैर दलित ,गैर आदिवासी लोग या पुलिस के लोग हुये होंगे ? लेकिन ऐसा तो नहीं हुआ .सच्चाई यह है कि इस दरमियान हुई हिंसा का सबसे ज्यादा असर दलितों पर हुआ है ,मारे गये लोग दलित आदिवासी समुदाय से है ,घायलों में 90 फीसदी लोग प्रदर्शनकारियों में से है ,कल हिरासत में लिये गये ज्यादातर लोग दलित आदिवासी है .

इस देश के जातिवादी मिडिया द्वारा दलित आदिवासी आन्दोलनकारियों को उपद्रवी साबित करने की पुरजोर कोशिशें जारी है ,दलित आदिवासी दैत्य और राक्षस के रूप में पेश किये जा रहे है कि उन्होंने रास्ते रोके ,बसों में आग लगाई ,ट्रेन रोकी ,जिससे मुसाफिरों को तकलीफ हुई ,प्रदर्शनकारियों को हत्यारा बनाने की पूरी तैयारी है ,जो लोग पकडे गये है ,उनको पुलिस हिरासत में बेरहमी से मारा जा रहा है ,उनको जातिगत गालियाँ दे कर अपमानित किया जा रहा है ,उनके खिलाफ कड़ी कानूनी धाराओं में मुकदमे दर्ज किये जा रहे है ,ताकि वे कानूनी कार्यवाही में फंसे रहे , कई लोगों को कल पुलिस गोली का शिकार बनाया गया ,उनको इतना मारा गया कि उनके हाथ पांव टूट गये है .कल का दिन पुलिसिया दमन का दिन भी था ,इस देश के गरीब दलित दमित वंचित समुदाय की लोकतान्त्रिक आवाज़ को कुचलने की पूरी कोशिस की गई है .

सबसे भयानक तथ्य यह है कि पुलिस ने अराजक तत्वों को आन्दोलन में प्लांट किया ,जातिवादी तत्वों को खुली छूट दी कि वे दलित आदिवासियों को सबक सिखाये ,मध्यप्रदेश में जो शख्स गोली चला रहा था ,वह दलित नहीं था ,बाड़मेर ,रानीवाडा ,जालोर ,सांचोर ,गंगापुर सिटी ,हिंडौन आदि इलाकों में कथित दबंग जातियों के लोगों को पूरा मौका दिया गया कि वे प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़े ,दरअसल छिटपुट अपवादों को छोड़ दिया जाये तो दलितों ने हिंसा नहीं की बल्कि उन पर भारत बंद के दौरान जबरदस्त हिंसा हुई है और आने वाले दिनों में भी यह हिंसा जारी रहने वाली है .

दुखद बात यह है कि बहुत ही नियोजित तरीके से दलितों और आदिवासियों के स्वतस्फूर्त जनांदोलन को उपद्रव साबित करने के प्रयास किये जा रहे है ,इस साजिश को समझना जरुरी है और यह भी ध्यान रखना जरुरी है कि हिंसा के ज़रिये हम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे ,हिंसा प्रतिहिंसा का अंतहीन सिलसिला कमजोर वर्ग के लिये फायदेमंद नहीं है ,हमें संवैधानिक उपकरणों का उपयोग करते हुये ही न्याय प्राप्ति का आन्दोलन चलाना पड़ेगा ,इसके अलावा कोई चारा नहीं है .

मैं कल के भारत बंद के दौरान पुलिस ,गैरदलित जातिवादी तत्वों और प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई तमाम तरह की हिंसात्मक कार्यवाही की कड़ी निंदा करता हूँ ,मुझे हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है .

हिंसा कभी नहीं ,कहीं नहीं !

– भंवर मेघवंशी
( संपादक – शून्यकाल )

Leave A Reply

Your email address will not be published.