आम जन का मीडिया
Two young men came ...!

दो युवा आये थे … !

- भंवर मेघवंशी

11 दिसम्बर 2017 की सुबह मुम्बई से भीलवाड़ा पँहुचने वाली ट्रेन से दो युवा उतरे ,उनकी मंजिल 180 ,अम्बेडकर भवन था ,जो कि भीलवाड़ा शहर से 30 किलोमीटर दूर माण्डल तहसील के एक गांव सिरडियास में मौजूद है ,ये दोनों मराठी युवक यशवंत राव चव्हाण स्कूल ऑफ सोशल वर्क ,सतारा के मास्टर ऑफ सोशल वर्क के अंतिम वर्ष के स्टूडेंट थे जो कि अपनी एक माह की ग्रासरूट ट्रेनिंग का अनुभव लेने यहां पँहुचे थे ।

सोशल सेक्टर की भाषा मे इसे इंटर्नशिप कहा जाता जाता है और एकेडमिक जगत में इसको ब्लॉक प्लेसमेंट ट्रेनिग कहा जाता है ,वर्ष 2007 से अब तक देश भर के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से छात्र छात्राएं अम्बेडकर भवन पंहुचते रहे है ,टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज ,मुम्बई , दिल्ली विश्वविद्यालय , हैदराबाद यूनिवर्सिटी , यशवंत राव चह्वाण स्कूल ऑफ सोशल वर्क सहित विभिन्न लॉ कॉलेज ,मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट ,पत्रकारिता महाविद्यालयों से विद्यार्थियों का आना जाना होता रहा है ,वे एक महीने तक हमारे साथ जो भी हम कर रहे होते है ,उसमें मददगार बनने आते है ,उन्हें जो भी सीखना होता है ,सीखते है ,लिखते पढ़ते है और हमको भी सिखा कर जाते है ।

दरअसल वे आते है डगर में ,यह एक अभियान है ,जिसे अक्टूबर 2006 में गठित किया गया था ,जिसका पूरा नाम ” दलित ,आदिवासी एवम घुमन्तू अधिकार अभियान राजस्थान ” है ,मगर निकनेम डगर है ,जो रास्ते का पर्याय है । यह कोई एनजीओ नहीं बनाया गया ,यह कोई दल भी नहीं है ,ना ही संगठन और आंदोलन भी नही ,बस सिर्फ एक अभियान मात्र ,जिसका न रजिस्ट्रेशन कराया गया ,न कभी प्रोजेक्ट लिया गया और ना ही किसी तरह की फंडिंग ली गयी ,इस अभियान का उद्देश्य रहा कि जहां भी दलित ,ट्राईबल और घुमन्तू विमुक्त समुदायों पर अन्याय ,अत्याचार ,उत्पीड़न ,भेदभाव और शोषण हो उसके खिलाफ आवाज बुलंद की जाये ,बिना किसी सरकारी या ग़ैरसरकारी मदद के । फंड ,फंडा ,झंडा ,डंडा सब समुदाय का स्वयं का हो , जिसकी लड़ाई उसकी अगुवाई और सामूहिक नेतृत्व की टीम भावना के साथ न्याय ,समानता ,स्वतंत्रता और भाईचारे के संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते हुए यह अभियान आगे बढ़ा और जल्दी ही इसने अपनी अलहदा पहचान बनाई ।

कई लोग इससे जुड़े ,कुछ ने इसको पहचान दी और कुछ ने इससे पहचान बनाई ,इस डगर पर चलते हुए हमने महसूस किया कि अच्छे ,बुरे ,ईमानदार ,बेईमान ,दलाल ,एजेंट ,निस्वार्थ भाव वाले निष्काम कर्मयोगी सब तरह के लोग आये ,कईं लोगों को डगर में अच्छी जिम्मेदारी मिली ,उनके सितारे चमके ,फिर अपने ही कर्मो और कुकर्मों से उनके सितारे अस्त व्यस्त हो गये ,जो कल तक डगर के बड़े नेता थे ,वे आजकल अन्य संगठनों में दरियां बिछाने और ज़िंदाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाने अथवा भीड़ बढ़ाने का सामान बन कर रह गए ,साथियों की बेरुखी और कुछ लोगों की अवांछित गतिविधियों के चलते वर्ष 2015 में मैंने डगर को भंग करने की सिफारिश की ,जिसे एकतरफा और तानाशाही पूर्ण फ़ैसला मानते हुए डगर के वास्तविक साथियों ने तय किया कि वे डगर का अस्तित्व कभी खत्म नहीं होने देंगे ,फिर वही हुआ ,जो डगर की विचारधारा एवं उद्देश्यों के विरुद्ध कार्यरत थे ,उन सबका अस्तित्व मिट गया और डगर का अस्तित्व बचा रह गया ।

इसी डगर के अनुभव को सीखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेश तक से रिसर्च स्कॉलर और विद्यार्थियों की आवाजाही आज तक जारी है ,इस बार ये दो युवा राजीराम कोरडा और शैलेश भोंसले आये । उन्होंने 11 दिसम्बर 2017 से 12 जनवरी 2018 तक का पूरा एक महीना डगर के साथ अम्बेडकर भवन को केंद्र बना कर हमारे साथ गुजारा ,उन्होंने कईं अत्याचारपरक गांवों का दौरा किया , तथ्यान्वेषी टीमों का हिस्सा बने ,पीड़ितों से मिले ,उनकी समस्याओं को जान समझ कर समाधान के लिए प्रक्रियाओं ,कानूनों को जाना । वे बहुजन लिटरेचर फेस्टिवल का हिस्सा बने ,उन्होंने संभाजी भगत और सचिन जैसे बहुजन कलाकारों के साथ वक़्त गुजारा ,वे भीम बिजनेस एक्सपो में वॉलिंटियर्स के नाते रहे ,बैनर लगाने से लेकर मीडिया रिपोर्टिंग तक का काम किया ,दलित उद्यमियों से मिले ,उनके संघर्ष एवं सफलता की कहानियां लिखी ,ऐसे घुल मिल गए ,जैसे कि राजस्थान के ही मूलनिवासी हो ,खूब दोस्त बनाये और सबके प्रिय बन गए ।

बाद में उन्होंने देसूरी ,पालनपुर ,रेवदर इलाकों की बड़ी सभाओं में शिरकत कर यह जाना कि मोबलाइजेशन कैसे होते है ,उन्होंने अपने एक माह के छोटे से समय मे दलित अत्याचार निवारण मेकेनिज्म से लेकर अन्य कई प्रकार की चीज़ों को भीतर से जानने समझने का पूरे मनोयोग से प्रयास किया ,इन युवाओं की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उनमें सीखने की ललक बहुत ज्यादा रही और हर वक़्त खुश मिज़ाजी के साथ हर तरह के काम का अनुभव लेते रहे । मेरे परिवार का भी वे हिस्सा बन गये ,उनकी दोस्ती बच्चों से तो हुई ही ,पत्नी ,पिताजी और माँ सहित पूरे गांव के युवाओं से घुल मिल गए ।

कल उनकी इंटर्नशिप का आखिरी दिन था ,उन्होंने अपनी संस्थान का धन्यवाद पत्र मुझे सौंपा ,मेरे परिवार ने उनकी विदाई पर दाल बाटी बनाई और सबने साथ बैठकर भोजन किया , दोनो युवाओं ने दो दिन की मेहनत से एक वरली पेंटिंग बनाई और हमें भेंट में दी ,वे बिल्कुल अपरिचित के रुप में आये ,लेकिन परिवार का अभिन्न अंग बन गये ,हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ , अब तक आये लगभग सब ग्रुप परिजन के रूप में ही लौटे है ,उम्मीद है कि भविष्य में भी इसी अपनत्व का सहज रिश्ता हम और वो निभाते रहेंगे ।

अम्बेडकर भवन में आज उनकी अनुपस्थिति को हमने महसूस किया , लेकिन यही सृष्टि चक्र है ,परिवर्तन और निरन्तरता ही तो जीवन है ,मिलना जुलना इसी भांति चलता ही रहना चाहिये । मैं दोनो युवा दोस्तों का मेरे परिवार ,डगर के विशाल परिवार और सब साथियों की ओर से शुक्रिया अदा करता हूँ कि आपके आने से हमने बहुत कुछ सीखा है ,हम समृद्ध हुए है ,अम्बेडकर भवन सदैव आप जैसे साथियों की प्रतीक्षा में रहेगा ,यह सबका सामूहिक ठिकाना है ,यह बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाने का एक आश्रय स्थल है ,इसे वक़्त बेवक़्त गुलज़ार करते रहिए ,आते रहिये ।

( लेखक डगर के संस्थापक और शून्यकाल के संपादक है )

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