बार बार के इस बंद को बंद कीजिए !

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-भंवर मेघवंशी,भीलवाड़ा

अभी 2 अप्रेल के जख्म भी नहीं सूखे कि 9 अगस्त का बन्द बुला लिया गया है।

पिछली बार का भारत बंद जनता का स्वतः स्फूर्त बन्द था ,इस बार का बन्द कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं का शक्ति प्रदर्शन है ।

इस बार के बंद का ऐलान एक राजनीतिक दल के नेताजी ने किया है, जिसे दुसरी पार्टी के मंत्रीपुत्र का समर्थन हासिल हो चुका है।

इस बन्द की तारीख की घोषणा के तुरंत बाद मोदी सरकार से जुड़े अजा वर्ग के 25 सांसदों और कुछ मंत्रियों का रामविलास पासवान के यहां जुटना तथा पासवान का प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना ,साथ ही चिराग पासवान का सड़कों पर उतरने की चेतावनी देना ,यह सब किसी पूर्वलिखित पटकथा को मंचित करने जैसा आभास दे रहा है।

बड़ी अजीब बात है कि जिन सांसदों को संसद में आवाज़ बुलंद करनी चाहिए ,वे जनता से सड़क पर उतर कर संघर्ष करने को कह रहे हैं।

ये लोग लोकसभा या राज्यसभा में आवाज नहीं उठाते,वहां गुलामों की तरह मुंह सिल कर बैठे रहते हैं और अब चाहते हैं कि जनता सड़क पर संघर्ष करे, अपना खून पसीना बहाये और ये आराम से वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सत्ता सुख भोगते रहें ।

जो काम संसद में होना है ,उसके लिए सड़क पर संघर्ष की कोई जरूरत नहीं है, सबसे पहले हमारे सांसद संसद में पुरजोर आवाज़ उठाये, अगर उनकी आवाज़ न सुनी जाए तो संसद ठप्प कर दें ,फिर भी कुछ नहीं हो तो जनता के बीच आये।

तब जनता तय करेगी तारीख, तब सड़कों पर उतरा जाएगा ,वरना सोशल मीडिया पर डीपी चेंज करवा कर हर बार आम लोगों को आंदोलन में झोंकने की रणनीति अनुचित है ।

मेरा स्पष्ट विचार है कि इस बार नेता संघर्ष करें ,जनता तो कर चुकी है ।आगे भी करती रहेगी ।

9 अगस्त को बंद करवा रहे साथी पहले इन बातों पर भी सोचे ,विचारें कि 2 अप्रेल को जो साथी मारे गये, उनके परिजनों को न्याय मिला? मुआवजा राशि दी गई? हत्यारे गिरफ्तार हुये ? ये प्रश्न अनुत्तरित है अभी तक।

2 अप्रेल को देश भर में दलित आदिवासी समुदाय के संघर्षशील लोगों पर हजारों मुकदमे दर्ज किये गए, हजारों लोग गिरफ्तार हुये ,जेल गये ,क्या वो सब रिहा हो गए हैं ? क्या एक भी मुकदमा वापस लिया गया है ? अगर नहीं तो और मुकदमे झेलने को आम जन तैयार है ? सोचना पड़ेगा .

2 अप्रेल को हजारों कर्मचारियों के विरुद्ध द्वेषता पूर्ण कार्यवाही की गई, उनको जेलों में ठूंसा गया,उन पर मुकदमे दर्ज हुए,सैंकड़ों सरकारी कर्मचारी निलंबित किये गए, निलंबन के आदेश भले वापस लिए गए हो ,पर मुकदमे तो कायम है ,उनका क्या होगा ,यह कौन सोचेगा ?

बार बार के बन्द से देश परेशान होता है, नुकसान होता है, जनजीवन अस्त व्यस्त होता है, निर्दोषों का खून बहता है, बेकसूर लोग फंसते है ,नेताओं को कुछ नहीं होता है, उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता है ,वे अपनी अपनी सुरक्षित खोहों में छुपे रहते हैं।

जरा सोचिये ,इन क्रांतिकारी नेताओं के बच्चे कभी आंदोलन में क्यों नहीं आते ,वे कोई मिशन क्यों नहीं चलाते, उन्हें विचारधारा से कोई मतलब क्यों नहीं होता है?

दरअसल वे देश विदेश के मंहगे संस्थानों में अपना भविष्य बनाने में लगे रहते हैं, ताकि भविष्य में हमारे ऊपर नेतागिरी कर सके ,इसलिए मेरा तो यह सुझाव है कि इस बार के बन्द में हमारे स्वनामधन्य नेतागण ,उनकी बीबियां और देश विदेश में पढ़ रहे या नौकरी कर रहे उनके बच्चे भारत बंद करवाएं ,वे सड़क पर सपरिवार उतर कर दिखाएं। तब हम सोचेंगे कि हमें इस बन्द का समर्थन करना है अथवा नहीं।

तब तक के लिए क्षमा कीजिये और बार बार के इस बन्द को बंद कीजिये !

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