त्रिपुरा चुनाव और मूलनिवासी प्रश्न

- मोहम्मद इमरान

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जब भी पूर्वोत्तर के राज्यों के बारे में राजनैतिक चर्चाएँ शुरू होती है, वैसे ही वहां के इतिहास और वहां रहने वाली जनजातियों और उनसे बनने वाले समीकरणों के बारे में बहस शुरू हो जाती है. 2014 के बाद से पूर्वोत्तर के राज्यों में संपन्न हुए अधिकांश विधानसभा चुनावों में बहुत से नए समीकरण उभर कर आये हैं और सारे नए समीकरणों में भाजपा की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर हिस्सेदारी रही है. चाहे वो असम का चुनाव हो या हाल ही में हुए तीन राज्यों के चुनाव हो, हर नये राजनैतिक परिदृश्य को इतिहास और क्षेत्रीय मुद्दों के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन त्रिपुरा के परिणाम जिस तरफ इशारा कर रहे हैं वो केवल सत्ता विरोध का ही नही बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रिया के साथ साथ मूलनिवासी प्रतिरोध का भी हिस्सा है.

1901 की जनगणना के हिसाब से त्रिपुरा (तब त्विपुरा रियासत) में लगभग 53 फीसद आबादी जनजातीय समूहों से बनी थी जो 2001 तक आते आते महज़ 30 फीसदी रह गयी है. विभाजन की राजनीति और बांग्लादेश के निर्माण ने इस राज्य को राजनैतिक और सामाजिक तौर पर एक ‘बंगाली ब्राह्मणवादी प्रभुत्व’ राज्य में परिवर्तित कर दिया. इस सामाजिक परिवर्तन ने वहां के मूलनिवासियों को न केवल सत्ता से बेदखल किया बल्कि उनकी संस्कृति पर बंगाली संस्कृति और भाषा को भी थोपने का मुखर प्रयास किया. हर पार्टी ने जनजातीय समूहों को उनका हक़ और उनकी पहचान को वापस स्थापित करने का वादा तो किया पर वोट के बाद चोट हमेशा उन्हें ही मिलती रही. जनजातीय इलाकों के स्कूलों में स्थानीय भाषा को माध्यम बनाने के बजाय बंगाली और अंग्रेजी पर ही जोर दिया गया हालाँकि 1979 में जाकर कोकबोरोक भाषा (जो कि त्रिपुरा की आबादी के लिहाज़ से प्रमुख जनजाति द्वारा बोले जाने वाली भाषा है) को स्कूलों में माध्यम के तौर पर अपनाया गया इसके उलट मिशनरी द्वारा स्थापित स्कूलों में जनजातीय भाषाओँ को काफी पहले से महत्व दिया जाने लगा था.

2015 में जाकर कोकबोरोक भाषा पर आधारित रेगुलर कोर्स त्रिपुरा विश्वविद्यालय में पढाया जाने लगा पर इससे पूर्व त्रिपुरा की कोई भी जनजातीय भाषा राजकीय विश्विद्यालयों में नियमित पाठ्यक्रम में शामिल नही की गयी थी. भाषा पर आधारित दमन का परिणाम ये हुआ कि बहुत सी भाषाएँ जो अलग अलग जनजातियों द्वारा बोली जाती थी वो विलुप्त होने लगी. परिणामस्वरूप छोटी आबादी वाले जनजातीय समूह के लोगों को विभिन्न स्तर पर अलगाव की भावना का सामना करना पड़ा. इसके साथ ही जब भी कोई राजनैतिक, आर्थिक, और सामाजिक मुद्दा जनजातीय नेताओं की तरफ से उठाया गया, सुनवाई सही तरीके से नहीं हुई और अधिकतर मौकों पर त्रिपुरा के मूलनिवासियों और उनके मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया गया. भाषाई स्वांगीकरण के आलावा जनजातीय समूहों के धार्मिक परम्पराओं को हिन्दू धर्म से जोड़ दिया गया और अधिकाधिक जनजातीय समूह हिन्दू धर्म में सम्मिलित कर दिए गए, इसका प्रमाण 2011 की जनगणना बताती है जिसमे त्रिपुरा की 84 फीसद जनता को हिन्दू प्रदर्शित किया गया है. आरएसएस ने त्रिपुरा में फैले इस प्रतीक को अच्छे से भुनाया और शायद यही वजह रही होगी जिससे आरएसएस को यहाँ जमीन टटोलने में देरी नहीं लगी. इसके आलावा बेरोजगारी, महंगाई और बुनियादी ढांचागत विकास की धीमी रफ़्तार ने न केवल मध्यम वर्गीय बंगाली युवाओं को भाजपा की तरफ खीचा बल्कि क्षेत्रीय मुद्दों पर किये गए समर्थन ने जनजातीय समूहों को भी इनकी तरफ लाने में बड़ी भूमिका निभाई.

बीते कुछ वर्षों में भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ हिंदुत्व के एजेंडे को हल्का करके और क्षेत्रीय मुद्दों को अहमियत देकर बनाई है. चाहे वो असम का बोडोलैंड का मुद्दा हो, स्वतंत्र नागालैंड की या स्वतंत्र त्रिपुरा की मांग हो, भाजपा ने हमेशा इन मुद्दों को सिरे से कभी नही नाकारा, और शायद यही वजह रही होगी जिसकी वजह से इन क्षेत्रीय मुद्दों पर बनी पार्टियां केंद्र की सत्ता पर काबिज़ भाजपा के साथ चुनावी समीकरण बैठाने के लिए तैयार हो गयी. कोकबोरोक भाषा को सभी राजकीय स्कूलों में माध्यम बनाने का सवाल इसी चुनाव में बड़े पैमाने पर बहस हुई और भाजपा ने मौका न चूकते हुए इस मुद्दे को समर्थन दिया. 2015 में हुए त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्‍ट कौंसिल के चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने जनजाति मोर्चे (राजेर उपजाती गणमुक्ति परिषद्) की सहायता से जीत तो हासिल कर ली लेकिन इसी बीच भाजपा विपक्ष के तौर पर उभर कर सामने आ गयी. उसने न केवल कांग्रेस के वोटों को अपने पाले में किया बल्कि खुद को लेफ्ट विरोधी वोटों के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर आकर्षित किया. पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के एलान के बाद ही त्रिपुरा में भाजपा ने अपनी जगह और मजबूत करने के लिए जनजातियों और इंडिजीनिस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ गठबंधन किया.

आईपीएफटी पिछले कई दशको से त्रिपुरा की जनजातियों के लिए अलग त्विपुरा राज्य की मांग कर रही है और भाजपा के साथ उसके गठबंधन ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का मौका दिया है. इसके अलावा अगर भाजपा के नज़रिए से देखे तो इस गठबंधन ने न केवल भाजपा को त्रिपुरा की पहाड़ी और सुदूर इलाकों तक पहुँचाया बल्कि सारी अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 20 सीटों पर क्लीन स्वीप करने में मदद भी की. इन सारी वजहों से इस गठबंधन ने 60 में से 43 (35 भाजपा और 8 आईपीएफटी) सीटें अपने नाम की और वहीँ 25 साल से सत्ता में रही लेफ्ट फ्रंट 16 सीटों पर सिमट कर रह गयी. वोट प्रतिशत के हिसाब से देखे तो भाजपा और आईपीएफटी गठबंधन को लगभग 50 फीसदी वोट मिले और दूसरी तरफ लेफ्ट फ्रंट को 42.7 प्रतिशत वोटों से ही संतोष करना पड़ा. इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में कांग्रेस का सूपडा साफ़ हो गया और पिछले चुनाव के मुकाबले वोट प्रतिशत 36.5 से 1.8 प्रतिशत पर आ गिरा है.

आरएसएस और भाजपा को जो समर्थन जमीनी स्तर पर मिला, वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या सरसंघचालक मोहन भगत का कोई करिश्मा या बड़ी पहल का हिस्सा नहीं बल्कि पीछे कई दशको से विभिन्न सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर लेफ्ट और कांग्रेस की सरकारों की नज़रअंदाज़ी का फल है. हालाँकि ये आने वाला वक़्त ही बताएगा कि त्रिपुरा के मूलनिवासियों की कितनी मांगे पूरी होंगी और कितनी मांगे उसी दशा में रह जाएंगी जैसे पहले थीं. इन सबके बीच त्रिपुरा की राजनीति में ‘बंगाली ब्राह्मणवादी प्रभुत्व’ जोकि प्रमुख पार्टियों (लेफ्ट, भाजपा, कांग्रेस) का अभिन्न हिस्सा है और आरएसएस के हिन्दुत्ववादी एजेंडे से निश्चित तौर पर मूलनिवासियों और उनके मौलिक मुद्दों के लिए अडचने पैदा होंगी, बस देखना ये होगा कि इन मुद्दों की गंभीरता को भाजपा और आईपीएफटी की सरकार किस तरह से हल करने की कोशिश करेगी.

( लेखक सेण्टर फॉर सोशल जस्टिस एंड गवर्नेंस,टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान,मुंबई के विद्यार्थी है )

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