डूंगरपुर में आदिवासीयों को नहीं मिल रहे जमीन के पट्टे !

जनमंच का दूसरा दिन !

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डूंगरपुर।

सूचना एवं रोजगार अभियान और अन्य जन संगठनों की ओर से शुरू हुए जनमंच का शुक्रवार को दूसरा दिन था। डूंगरपुर में आयोजित इस जनमंच में आदिवासियों ने अपनी जमीन से जुड़े मुद्दों, भूमि के पट्टे नहीं मिलने, कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने, मनरेगा में 100 दिन काम नहीं मिलने सहित गुजरात और महाराष्ट्र में हो रहे पलायन की समस्या को उठाया।

जनमंच में शुक्रवार को राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच के कालूलाल, वागड़ मजदूर किसान संगठन से मानसिंह एवं जया और सामाजिक कार्यकर्ता मधुलिका शामिल हुईं।

इन सभी मेहमानों ने डूंगरपुर सहित पूरे आदिवासी क्षेत्र की समस्याओं को जनमंच के माध्यम से सामने रखा। सबसे बड़े मुद्दे पेसा कानून लागू नहीं होने और जमीन के पट्टे नहीं मिलने,  बड़ी संख्या में यहां के लोगों का गुजरात और महाराष्ट्र में पलायन होना और डूंगरपुर-बांसवाड़ा-रतलाम रेललाइन का पूरा नहीं होना था।

झाड़ोल की ही तरह डूंगरपुर की जनता ने भी राशन वितरण में पॉश मशीनों को हटाने की मांग की और कहा कि पॉश मशीनों से बायो-मैट्रिक नहीं मिलता और कभी सर्वर ही नहीं आते। 5 किलो गेहूं के लिए पूरा दिन खर्च करना पड़ता है।

मनीषा फलेजा ने सवाल बताया कि  डेडली और इसके आसपास के 7 गांवों में वन अधिकार पट्टों का दावा सरकारी विभागों में कई सालों से अटका हुआ है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। गांव के लोग इस मुद्दे को लेकर ब्लॉक स्तर से लेकर कलेक्टर तक को ज्ञापन दे चुके हैं लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है

जानिए किस कार्यकर्ता ने क्या कहा?  

मानसिंह – पेसा कानून 1996 में बना तो दिया गया लेकिन आज तक ठीक ढंग से लागू नहीं किया गया है। दूसरी बड़ी समस्या पलायन की है। रोजगार नहीं होने और मनरेगा के क्रियान्वयन नहीं होने के कारण यहां के लोग गुजरात और महाराष्ट्र में पलायन कर रहे हैं। इन चुनावों में हमारी एक ही माँग है कि जो भी सरकार आए पेसा कानून को ढंग से लागू करे।

जया रोत- जंगल की जमीन पर आदिवासी कई पीढ़ियों से रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं, लेकिन वन विभाग अब कहता है कि यहां से जाओ ये जमीन हमारी है। वन अधिकार मान्यता कानून होने के बावजूद भी हमें हमारा हक नहीं मिल रहा। आदिवासियों को सरकार पट्टे ही नहीं दे रही। इसीलिए डूंगरपुर क्षेत्र की सबसे बड़ी मांग यही है कि वन अधिकार मान्यता कानून के तहत सभी आदिवासियों को उनकी भूमि के पट्टे मिलें।

 कारूलाल – डूंगरपुर जिले में चक राजधानी के 22 गांव हैं। इन गांव की जमीन को अब तक लोगों को आवंटित नहीं किए गए हैं। 3500 परिवारों में से सिर्फ 1500 परिवारों को ही जमीन मिल पाई है। हमारी मांग है कि इन सभी गांव के लोगों को पूरी जमीन दी जाए।

मधुलिका – डूंगरपुर जिले में ज्यादातर आबादी के पास उनके मकानों के पट्टे ही नहीं हैं। विकास कार्यों में जब ऐसे परिवारों के घर आते हैं तो इन लोगों को मुआवजा ही नहीं मिल पाता है। डूंगरपुर-बांसवाड़ा रेल लाइन के मामले में ऐसा ही हुआ है।

धर्मचंद खैर, कारूलाल कोटेड, जया रोत, मानसिंह, मधुलिका और जन संगठनों के सभी साथी।

राजस्थान इलेक्शन वॉच व सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान राजस्थान और समृद्ध भारत फाउंडेशन की ओर से

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