कल सर्वव्यापी भागदारी के लिए मैं भी भूख हड़ताल पर रहूँगा और आप ?

- एच एल दुसाध

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अगर 1960 के दशक के आरपीआई के भूमि सुधार आन्दोलन को अगर अपवाद मान लिया जाय तो आर्थिक मुद्दों से जुड़े तमाम दलित आन्दोलन, खासकर नयी सदी के, आरक्षण अर्थात नौकरियों के मुद्दे पर केन्द्रित रहे.इस क्रम में समय-समय पर प्रमोशन में आरक्षण, निजी क्षेत्र में आरक्षण, न्यायपालिका में आरक्षण इत्यादि मांगों को लेकर दलित आन्दोलित होते रहे: व्यापक आर्थिक मुद्दों को लेकर कभी मैदान में उतरे ही नहीं. लेकिन जो अबतक नहीं हुआ, वह 8 अगस्त, 2018 को होने जा रहा है. 8 अगस्त से आंबेडकर महासभा के बैनर तले विद्या गौतम के नेतृत्व में सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण, सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन, ; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोग व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार के मंत्रिमंडलों, संविदा पर भर्तियों इत्यादि एससी/एसटी और ओबीसी की संख्यानुपात में भागीदारी के लिए अनिश्चित एक शांतिपूर्ण आन्दोलन शुरू हो रहा है. .

केंद्र सरकार से अपनी उपरोक्त मांगों को मनवाने के लिए एक खास एक्सन-प्लान के तहत 8 अगस्त से यह आन्दोलन पूरे देश में एक साथ दो चरणों में शुरू हो रहा है. पहला चरण 8 अगस्त से 15 अगस्त तक जबकि 16 अगस्त से दूसरा चरण शुरू होगा जो अनिश्चित काल अर्थात विद्या गौतम के शब्दों में जीत या मौत तक चलेगा.

दोनों चरणों में दो प्रकार के लोग शामिल रहेंगे. एक वो भूख हड़ताल करेंगे, दूसरे वो जो भूख हडतालियों के समर्थन व सहयोग में उनके साथ बैठेंगे. पहले चरण में भूख हड़ताल पर बैठने वाले आन्दोलनकारी जूस,दूध,सूप का सेवन करेंगे.यदि केंद्र सरकार प्रथम चरण में नहीं झुकती है तो 16 अगस्त से आन्दोलनकारी जूस, दूध, सूप का सेवन बंद कर सिर्फ शहद, पानी, नीबू, नमक के सहारे भूख हड़ताल जारी रखेंगे.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भूख हड़तालियों को अपने आन्दोलन के लिए सरकारी जगह का इस्तेमाल का निषेध करते हुए हिदायत दी गयी है कि आन्दोलनकारी क्षेत्राधिकारी को सूचना देकर अपने समाज के मंदिरों, बुद्ध विहारों, आंबेडकर भवनों या समाज के किसी व्यक्ति के बड़े घर में बैठ कर भूख हड़ताल करेंगे. जो कामकाजी बंधू हड़ताल में समय नहीं दे सकते वे बांह में काली पट्टी बांधकर अपने काम पर जाएँ. किसी भी प्रकार की निजी या सरकारी संपत्ति का तोड़-फोड़ या जाम लगाने जैसा कार्य नहीं करना है. पूर्णतः संवैधानिक दायरे में रहकर काम करना है.

एक ऐसे दौर में जबकि देश की टॉप की 10 % आबादी का संपदा-संसाधनों तथा राजसत्ता की तमाम संस्थाओं पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका है, बहुजन समाज को ऐसे आन्दोलन की जरुरत थी जिससे उसे धनार्जन के समस्त स्रोतों सहित शासन-प्रशासन में संख्यानुपात में हिस्सेदारी का मार्ग प्रशासस्त हो सके. भीख नहीं भागेदारी आन्दोलन इस जरुरत को पूरा करता दिख रहा है.

ऐसे में इस आन्दोलन को तन-मन-धन से सपोर्ट करना हमारा अत्याज्य कर्तव्य बनता है. इसके तहत मैं कल अपनी पत्नी मेवाती के साथ लखनऊ के अपने ‘डाइवर्सिटी हाउस’ में भूख हड़ताल पर रहूँगा. बाद में समय निकाल विद्या गौतम के साथ धरने पर बैठने का प्रयास करूँगा. क्या आप भी नयी सदी के पहले परफेक्ट आर्थिक आन्दोलन को सपोर्ट देने के लिए कुछ करेंगे ?और कुछ नहीं तो कम से कम घर में बैठे-बैठे भूख हड़ताल ही करें !

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