आज रविदास को याद करते हुये…!

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कोई भी देश,सँस्कृति या सभ्यता उसकी श्रमशील जातियों और लोगों द्वारा बनाई जाती है। बदकिस्मती से इन्ही लोगों के साथ वे लोग भी होते है जो श्रम या उत्पादन की प्रणाली की निंदा करते हैं। वे आलसी निकम्मे और धूर्त लोग हवा हवाई आत्मा परमात्मा को श्रम से ज्यादा मूल्य देकर देश के श्रमिकों और उत्पादकों का शोषण करते हैं।

इस देश की सभी श्रमिक जातियों को देखिये। एक कुम्हार घड़े और बर्तन बनाता है। चर्मकार चमड़े के जूते और अन्य खेती के उपकरण बनाता है। एक सुतार और लोहार लकड़ी या लोहे के उपकरण या सामान बनाता है। एक यादव या अहीर पशुपालन करके पूरे समाज को दूध दही देता है। एक जुलाहा पूरे समाज को कपड़े देता है। किसान पूरे समाज को अन्न और भोजन देता है।उत्पादन से दूर से जुड़ी हुई वणिक जातियां भी उत्पादन नहीं करतीं लेकिन उत्पान के विपणन करके उन्हें दूर दूर तक पहुंचाती हैं।

अब गौर कीजिए कि एक ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य क्या उत्पादन करता है? वो समाज को क्या देते हैं? और मजा ये कि इन तीन वर्णों ने सभी श्रमशील, उत्पादक ओबीसी और दलीतों को अछूत बना रखा है। ये देश विचित्र है, इसका धर्म विचित्र है।

जो लोग सभ्यता और समाज को वास्तव में कुछ उत्पादन करके देते हैं वे नीच कहलाते हैं। और जो कुछ नहीं करते सिर्फ षड्यंत्रपूर्ण कहानियां लिखकर दुसरों को आपस में लड़ाते हैं और उनका खून चूसते हैं – वे लोग धरती के देवता बनकर घूम रहे हैं।

आज सन्त रविदास को याद करते हुए इस विचित्रता पर जरूर गौर किजिएगा।

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