TISS मुंबई में प्रथम कांशीराम मेमोरियल लेक्चर की शुरुवात की गई !

2

– नीरज बुनकर, TISS,मुंबई

आज ही के दिन 15 मार्च 1934 को मान्यवर साहेब कांशीराम का जन्म पंजाब के रूपनगर ज़िले में हुआ था , उनको याद करते हुए आज टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई में प्रथम कांशीराम मेमोरियल लेक्चर की शुरुवात हुयी जिसमे मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ट  पत्रकार दिलीप मंडल ने की और कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. स्थाबिर खोरा ने की जो कि। कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर लोगों ने हिस्सा लिया और वक्ता से बहुत सरे सवाल भी पूछे।

मंडल जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इतिहास से कांशीराम साहेब को अगर निकाल दिया जाए तो भारत की तस्वीर जो थोड़ी बहुत भी बहुजनों के पक्ष में है वो नहीं होती. वो आगे कहते है कि कांशीराम साहेब ने भारत के लोकतंत्र को बचाया है और इसके लिए न केवल बहुजनों को उनका धन्यवाद करना चाहिये बल्कि सवर्णों को भी इसके लिए बराबर उनका आभारी होना चाहिये। पुरे व्याख्यान में मंडल जी ने न केवल कांशीराम साहेब के बारे में  बात कि बल्कि उनके पहले के भारत की दशा और बाद के भारत की तस्वीर का घटनावर ब्यौरा भी दिया।

जहाँ आज के दौर में राजनीति में तमाम तरह के बदलाव देखने को मिल रहे है वहीं बहुजन वर्ग अपनी भूमिका स्पष्ट कर पाने में असफल साबित हो रहा है. विचारधारा और राजनीती का समन्वय थोडा मुश्किल है क्योंकि बहुजनों का वैचारीक आन्दोलन उनमें जागरूकता तो ला पाने में सफल रहा पर सत्ता में अपनी जगह बनाने में थोडा कमजोर रहा है. इस कमी को पूरा करने के लिए मान्यवर कांशीराम साहेब ने सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के साथ-साथ राजनितिक परिवर्तन की भी बात की उनका मानना था कि बिना राजनितिक सत्ता हासिल किए बहुजन समाज अपने आप को सामाजिक बन्धनों से मुक्ति नहीं दिला सकता है।

आज का कार्यक्रम इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब पुरे भारत में बहुजन को आपस में लड़ाने की राजनीती ज़ोरों शोरो से चल रही है वहीं कांशीराम साहेब की इस परिस्थीती में बहुत ज्यादा प्रसांगिक हो जाते है। अभी तक अकेडमिक स्पेसेस में इस तरह का लेक्चर नहीं हुआ जिसमे कांशीराम साहेब पर इतनी  सैद्धांतिक रूप से बात हुयी हो इसलिए भी ये लेक्चर अपने आप में एक अनोखा कार्यक्रम साबित हो जाता है. खासकर युवा वर्ग जो बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे है उनके लिए ऐसे विचारको के बारे में जानना बहुत जरुरी हो जाता है जिन्होंने भारतीय राजनीती की परिभाषा को ही पूरी तरह से बदल , और साथ ही बहुजन युवाओं की ये जिम्मेदारी भी बन जाती है कि मान्यवर साहेब जैसे सामाजिक एवम् राजनितिक सुधारको को अकेडमिक में लाये और उनके विचारो व कार्यप्रणाली का सैद्धांतिकरण करे जिससे कि आने वाली राजनीती को एक नयी दिशा मिल सके।

कार्यक्रम के सफल समापन के लिए में सभी आयोजकों को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने TISS जैसे संस्थान में मान्यवर कांशीराम साहेब को लाने का अधम्य साहस किया।

Leave A Reply

Your email address will not be published.