जो अंबेडकर की मूर्ति से घृणा करते है,वे अंबेडकर को पढ़ेंगे,तो नमन करेंगे !

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(डॉ.एम.एल.परिहार)  

आज बहुजन समाज गली गली में अंधाधुंध अंबेडकर की मूर्तियां खड़ी कर अपनी परेशानियों के जाल खुद तैयार कर रहा है.बाबासाहेब नायक पूजा (hero worship)के सख्त खिलाफ थे ,उन्हें यह कभी अच्छा नहीं लगता था कि उनके प्रशंसक उनका जन्मदिन मनाएं या अंधभक्त बनकर सिर्फ जयकारें लगाए. वे तो कहते थे,’मुझसे मिलना हो तो मेरी मूर्तियों में नहीं बल्कि मेरी किताबों में ढूंढना’.

        लेकिन आज हम उन्हें पढने, समझने व जीवन में उतारने की बजाय उनके फोटू वाली टी शर्ट पहनकर जयकारें लगाते है,चंदा इकट्ठा कर गली गली में उनकी मूर्तियां खड़ी करने में लगे हुए हैं.हम उनकी किताबें पढने की बजाय गले में नीला दुपट्टा डाल सवर्णों को चिढाने के लिए मूर्ति खड़ी करने निकल पड़ते हैं. पहले मूर्ति लगाने के लिए आंदोलन करते है, फिर प्रशासन समक्ष मूर्ति की सफाई व सुरक्षा के लिए धरना प्रदर्शन करते हैं यानी आजकल देश में हर रोज अंबेडकर के नाम पर बन रहे संगठनों ,सेनाओ व पार्टियों को साल भर का काम मिल जाता है. फिर विरोधी तो यही चाहते हैं कि हम इस तरह के गैरबुनायादी मुद्दों में उलझे रहे.

      हां, यदि सुरक्षित स्थान है,  गांव, कोलोनी, हॉल या ऑफिस में ज्यादातर लोगों की हामी है तो सुंदर आकृति की प्रतिमा स्थापित किया जाना ठीक है लेकिन सिर्फ दूसरों को चिढाने के लिए या अपनी बात रखने के लिए मूर्ति लगाते है तो भविष्य में यह खुद हमारे लिए दुखदायी होगा. सच्ची घटना है एक कस्बे के मुख्य सर्किल पर  ज्यादातर लोग महान विचारक भगतसिंह की मूर्ति लगाना चाहते थे,अनु. जाति के लोग अंबेडकर की मूर्ति पर अड़ गये ,फिर क्या था विवाद हुआ,झगड़े हुए. कोर्ट कचहरी गये. ओबीसी में जो हमारे शुभचिंतक थे वे भी विरोधी हो गये.सामाजिक वैमनस्य के कारण हमारे लोगों का अदृश्य बहिष्कार हो गया ,मन में गांठें बंध गयी. आखिर हमारे लिए बाबासाहेब जितने आदरणीय है उतने ही फुले और भगतसिंह.जब भगतसिंह को फांसी हुई थी तो बाबासाहेब ने अपने अखबार ‘जनता’ में जो संपादकीय लिखा था वह साबित करता है कि दोनों का लक्ष्य एक ही था.

     ज्यादातर मूर्तियों की शक्ल सूरत देखकर दुख होता है. फिर ऐसी सुनसान व गंदी जगहों पर लगा दी जाती है कि  उनके अपमान की संभावना बनी रहती है. एक कस्बे में चौराहे पर बहुजन समाज के लोगों ने प्रशासन से अंबेडकर की मूर्ति लगवाई,थोड़े दिन बाद शरारतियों ने चेहरे पर काला रंग पोत दिया. फिर प्रदर्शन हुआ, प्रशासन ने सुंदर जाली से मूर्ति को ढक दिया. फिर प्रदर्शन हुआ कि हमारे बाबासाहेब को जाली में कैद क्यों किया. प्रशासन ने जाली हटा दी. अब हर दिन प्रशासन व समाज की चिंता कि कोई कालिख न पोत दे. हम सभी जानते है कि असुरक्षित जगहों पर ऐसा करना कितना सरल है.

  सोच विचार की बात है कि क्या हम मूर्तियां लगवाने, उनकी सुरक्षा करवाने, दूसरों की सिर्फ आलोचना करने में और हर बात पर धरना प्रदर्शन में ही अपना कीमती समय, धन व ऊर्जा खर्च कर दे? जबकि आज सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में हमारे सामने भारी संकट खड़ा हो गया हैं. हम दस फीट की मूर्ति खड़ी करते है तो विरोधी दस लाख गुना बड़ा परेशानियों का पहाड़ खड़ा कर देते हैं क्योंकि वे हर क्षेत्र में  सक्षम ,समृद्ध व शक्तिशाली हैं. अपने घरों में बाबासाहेब की तस्वीर लगाएं ताकि बच्चों को प्रेरणा मिलें. घर की अलमारी में शराब की बोतलों या अंधविश्वास की किताबों का कबाड़ा भरने की बजाय महापुरुषों का साहित्य रखें. न कोई तोड़ेगा और न चोरी करेगा. अब समय लड़ने झगड़ने की बजाय हमारे बुनियादी हकों के लिए वैचारिक व बौद्धिक स्तर से संघर्ष करने की जरुरत है जो रास्ता बाबासाहेब ने बताया था.कई जगहों पर बहुत कीमती मूर्ति लगाई जाती है जबकि उस धन से उस क्षेत्र में शिक्षा व विचारधारा का वो काम किया जा सकता है जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.

     दुनिया बहुत छोटी हो गई है वैज्ञानिक चेतना बढी है ,दलितों पिछड़ों आदिवासियों के शुभचिंतक सवर्ण समाज में भी बहुत हैं, लोग हर महापुरुष व हर क्षेत्र के बारे में पढना ,जानना व अच्छे विचार को अपनाना चाहते हैं. बस जरूरत है उन तक विचार पहुंचाने की. हमारे पास बुद्ध ,कबीर,रैदास, नानक, फुले, बिरसा बाबासाहेब, भगतसिंह आदि की मानवतावदी विचारधारा का सागर भरा हुआ है. इनकी वाणी विचारधारा को घर घर पहुंचाने की जरूरत हैं.इन महापुरुषों पर अपनी जाति का लेबल मत लगाओ और न अपनी बपौती बनाओ. आपको जानकर हैरानी होगी कि आज ऑनलाइन साहित्य की खरीद द्वारा बुद्ध बाबासाहेब को खूब पढा जा रहा है और इसमें अधिकतर जिज्ञासु पाठक उस धर्म व जातियों के हैं जिन्हें हम सिर्फ कोसते रहते हैं. वे अंबेडकर को पढने जानने के लिए आगे आते हैं जबकि हम पहले ही ब्राह्मण बनिया ठाकुर के चश्मे से देखकर गालियां देना शुरु कर देते हैं. विचार में बहुत ताकत होती है.

इतिहास गवाह है कि संसार में सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन वैचारिक क्रांति से ही आता है और सम्पूर्ण समाज मे खुशहाली आती है.बुद्ध के ज्यादातर भिक्षु व अनुयायी ब्राह्मण व वणिक थे.इसलिए सकारात्मक सोच रखें, सबके भले,सबके कल्याण का भाव लेकर आगे बढे.अज्ञान का अंधेरा मिट कर रहेगा. उस सुनहरे कल के लिए हम सभी मिलकर काम करें जिसका सपना हमारे आदर्श महापुरुषों ने संजोया था.

 इसलिए मुझे फिर दोहराने की अनुमति दे कि, चौराहे पर खड़ी अंबेडकर की मूर्ति को देखकर जो व्यक्ति घृणा करता है वह अंबेडकर को पढने के बाद नमन करेगा. देश की खुशहाली के लिए अंबेडकर के योगदान को जानकर वह जरूर कहेगा कि बाबासाहेब अंबेडकर देश के सच्चे राष्ट्रभक्त थे.

  (डॉ.एम.एल.परिहार)

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