ये दुकानदार ‘सामान्य वर्ग’ के है ,इनसे सामान न खरीदें !

387
ये दुकानदार ‘सामान्य वर्ग’ के है , इनका मतलब शायद यह है कि इनके अलावा बाकी सब लोग ‘असामान्य’ है । इस देश मे गजब की चीजें चलती है ,जैसे कि जनरल कैटेगरी अर्थात – सामान्य वर्ग ,जबकि सच्चाई यह है कि सामान्य असामान्य जैसे कोई वर्ग है ही नही ।
यहां पर आरक्षित और अनारक्षित दो तरह के वर्ग है , 50 परसेंट रिजर्व है ,शेष अनरिजर्व है ,मतलब खुला है ,उसमें मैरिट है,खुली प्रतिस्पर्धा है । मगर देश की 85 फीसदी आबादी को रिजर्व कैटेगरी में डाल कर 15 फीसदी के लिए 50 फीसदी मौके रिजर्व कर दिए गये है ।
इस असामान्य घटनाक्रम को सामान्य कहा जा रहा है । जो कि कतई उचित नहीं है ।
50 प्रतिशत मौके 15 प्रतिशत अनारक्षितों के लिए आरक्षित किये जा चुके है ,ऊपर से धौंस यह कि तुम लोग तोे आरक्षण से आते हो ..!
गजब की दादागिरी है ,भारत मे मैरिट का मतलब अंक लाने की क्षमता है,तोते की तरह रट्टा लगाकर ज्यादा याद रख लेने की क्षमता को यहां पर प्रतिभा कहा जाता है .कुछ लोग पूरी रामायण याद कर लेते है तो कुछ कुरान को हिफ़्ज़ कर लेते है,फिर तो ये हाफिज साहब और कथाकार महोदय सबसे ज्यादा प्रतिभावान साबित हुये ,इस मेरिटोक्रेसी का क्या कहें ?
भाई भतीजावाद ,जातिवाद और डोनेशन ,जैक और चैक के जरिये अवसर हथिया लेने वाले लोग जीवन भर आरक्षण पर बहस करते है और खुद को बड़ा प्रतिभावान समझते है ।
भारत दुनिया का एकमात्र मुल्क है ,जहां हजारों साल से जन्म आधारित जाति के आधार पर आरक्षण मौजूद है,यह पैदा होते ही शुरू हो जाता है,पंडित का बेटा पंडित, बनिये का बेटा बनिया ,ठाकुर का बेटा ठाकुर !
मंदिरों में पुरोहिताई हो या जमीन पर ठकुराई ,मार्केट पर कब्जा हो अथवा न्यायपालिका,मीडिया और फ़ौज हर जगह जन्मना जाति आधारित आरक्षण अपने सबसे नग्न रूप में मौजूद रहता है ,उससे किसी को तकलीफ नहीं है,कोई उसे हटाने की बात नहीं करता ।
हम सिर्फ इतना कहना चाहते है कि आपको जाति आधारित आरक्षण से दिक्कत है तो इस आरक्षण की मां जाति को क्यों नहीं हटा देते,जब जाति नहीं रहेगी तो जातिगत आरक्षण कैसे रहेगा ?
बोलिये ,हटाने को तैयार हो ? जाति मिटाने को कोई राज़ी है ? कोई भी समस्या के मूल को नहीं मिटाना चाहता, बीमारी के लक्षणों पर सब चर्चा करते है,बीमारी कोई मिटाना नहीं चाहता ,अजीब हिप्पोक्रेसी है !
जिन लोगों को यह गलतफहमी है कि आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए था,उन्हें अपना ‘सामान्य ज्ञान’ बढ़ाना पड़ेगा,संविधान पढ़ना पड़ेगा,संविधान में आरक्षण जैसा कोई शब्द नहीं है ,वहां प्रतिनिधित्व की बात कही गयी है ।
जो राजनीतिक प्रतिनिधित्व है ,वह 10 साल के लिए लागू किया गया था, जिसकी हर दस बरस समीक्षा होती है और अवधि आगे बढ़ा दी जाती है, लेकिन शिक्षा और नौकरियों में प्रतिनिधित्व (आरक्षण ) की कोई समय सीमा तय नहीं की गई ,यह सामाजिक पिछड़ेपन और भेदभाव के खत्म होने तक है .
मतलब साफ है –
जातिगत शोषण और भेदभाव जब तक -आरक्षण तब तक !
इसलिए सामान्य लोगों से एक सामान्य सी अपील है कि आप दुकानों पर यह भी लिखवा दीजिये कि हम सामान्य वर्ग के लोग है ,कृपया हमारी दुकान से एस सी /एस टी /ओबीसी वर्ग के लोग सामान न खरीदें ।
आजकल ‘अजा जजा अत्याचार निवारण अधिनियम’  का पुरजोर विरोध किया जा रहा है ,समाज को ध्रुवीकृत किया जा रहा है,ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सारे दलित आदिवासी इस कानून का दुरुपयोग कर रहे है,इस देश के 25 करोड़ से ज्यादा एससी /एसटी लोग अपने जीवन मे कथित सामान्यों को फंसाने का असामान्य काम करते है !
तथ्य क्या कहते है ? क्या इस देश से जातियां विदा हो गई है ? क्या जातिगत भेदभाव समाप्त हो चुका है ? क्या आज भी जातिय छुआछूत और शोषण,अन्याय अत्याचार की घटनाएं नहीं होती है ? जातिय नरसंहार नहीं हो रहे? जातिय श्रेष्ठता की बातें नहीं हो रही है ,क्या देश जातिगत ऊंच नीच की घृणित मानसिकता से ऊपर उठ चुका है ? क्या इस देश मे सामाजिक गैरबराबरी खत्म हो चुकी है ? क्या सोशल डेमोक्रेसी आ चुकी है ?
हालात अब भी बुरे है, आज भी दलित दूल्हे घोड़ी से जाति के आधार पर नीचे उतारे जा रहे है ,आज भी मिड डे मील में भेदभाव है,दलितों की जमीनें छीन रहे है,आदिवासी औरतों का यौन शोषण आम बात है ,गांव से लेकर यूनिवर्सिटी तक हर तरफ जातिजन्य भेदभाव व शोषण जारी है और आप कहते है कि आरक्षण हटाओ,एससी एसटी कायदा हटाओ !
हटा दो दम है तो ..कौन मना कर रहा है ?  सब हटा दो ,यह देश आपकी बपौती है ,हमारा यहां क्या है ? जो चाहो करो ,अन्याय ,अत्याचार, बलात्कार ,शोषण सब जारी रखो, मारो और रोने भी मत दो ..यही तो समरसता है ,यही तो सामान्यों का हिंदुत्व है ,यही तो महान स्वर्णिम संस्कृति की पहचान है ।
पर याद रहे कि अब आरक्षण नहीं भागीदारी की बात शुरू हो चुकी है ,जिसकी जितनी संख्या भारी ,उसकी उतनी हिस्सेदारी हर क्षेत्र में सुनिश्चित करनी होगी ,वरना बगावत हो जाएगी,अगर सब कुछ शांतिपूर्ण और सामान्य   चाहते है तो धन ,धरती ,सत्ता और संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा कीजिये,जाति का समूल नाश कीजिये और इसी के साथ आरक्षण का भी अंत कर दीजिए,हमें कोई आपत्ति नहीं है ।
-भंवर मेघवंशी
(लेखक शून्यकाल के संपादक है और दलित आदिवासी घुमन्तू समुदाय के प्रश्नों पर राजस्थान में सक्रिय है )

Leave A Reply

Your email address will not be published.