यह सवाल मेरे भी मन में था कॉमरेड !

- हिमांशु रविदास

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बिरादराना संगठन द्वारा एक महत्त्वपूर्ण आयोजन हुआ. आयोजन सचिव एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने इसी फेसबुक पर हमारे दौर की एक महत्त्वपूर्ण कवि के बारे में अनाप शनाप वमन किया था. दरअसल उस वमन को अभद्रता कहना बहुत कम है, वैधानिक रूप से वह अपराध था. जो कुछ उन्होंने लिखा था वह एक सम्मानित कवि के बारे में होने से अपराध नहीं था, वह किसी भी सामान्य महिला यहाँ तक कि किसी यौनकर्मी के बारे में भी लिखा गया होता तो भी अपराध ही होता.

उन्होंने कभी इसके लिए कोई खेद प्रकट भी नहीं किया, अपराध की स्वीकारोक्ति तो दूर की बात है.

दो लेखकों ने इस संयोजकीय चुनाव के प्रतिरोध में लिखा. दोनों मेरे मित्र नहीं हैं. एक ने तो मुझे ब्लॉक भी कर रखा है. इसलिए मुझे ज्यादा नहीं पता कि उन्होंने क्या क्या लिखा ( मैंने सिर्फ एक की चिट्ठी ‘सत्याग्रह’ पर पढी.) पर मैंने बिरादराना संगठन के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों के जवाब जरूर पढ़े. कुछ औपचारिक जवाब, कुछ अश्लीलता की हद को छूते हुए कैरिकेचर.

मैं हर बार पढ़ते हुए हैरानी के साथ सोचता रहा कि ठीक है, ये दोनों वाम विरोधी हैं, कलावादी हैं, और भी कुछ जो हैं सो हैं पर इससे क्या उनके सवाल बेमानी हो जाते हैं ? उनके सवाल का क्या ?

ये सवाल मेरे भी मन में था कॉमरेड. शायद कईयों के मन में था. हम सब इसलिए चुप रहे कि संगठन, व्यक्ति से बड़ा होता है.

पर अफ़सोस, हमने देखा – एक कल्पित ने बहुत से कल्पित बना दिए.

मेरे कई जान से प्यारे दोस्त इस संगठन में हैं. दरअसल यही बड़ी निराशा रही. जो सवाल अपनों से आने चाहिए थे, वह किसी ‘दुश्मन’ ने पूछे. पार्टनर, सोचिये जरा.

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