आम जन का मीडिया
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यह खबर दब गई थी !

- माया मृग

कहने को किस्‍सा लंबा था और बात का मन भी पर
खाली चलती चक्कियों का शोर बहुत था
रगड़ रगड़ खा घिस रहे थे पत्‍थर
पिस रहा कुछ नहीं …!

थे तो हम भी उन्‍हीं दो पाटों के बीच
जिसमें पिसता है सब
जो पिसता है वह भूख मिटाता है
जो रगड़ खाये जाने में रह जाए
वह पत्‍थरों का भोज्‍य…!

पाटों पर चिपके आटे में
गंध पत्‍थर की है, अनाज की नहीं
पत्‍थरों की भूख का किसी को अनुमान नहीं
किससे मिटे, कैसे मिटे, मिटेगी ही
भूख तो भूख है…!

जिन रास्‍तों पर नहीं हैं कोई भी निशान
वहां से भी गुज़री तो होगी भूख
एक आदिम हिंसा के साथ
हम चुप क्‍यों थे, इसकी वजह पर भी चर्चा थी…!

यूं अगर चाहते तो
हम भूख को साथ लिए जी सकते थे
पर हमने दूसरा रास्‍ता चुना
हमने पीसा, बारीक पीसा…!

खाली चलती चक्कियों के दौर और शोर में
कुछ खलबली सी थी
बाहर नारे थे, जुलूस थे, चेहरों की भीड़ भी
हम अकेले थे चुपचाप
हम प्रेम में थे
और यह खबर शोर में दब गई थी…..!

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