यह समय मन मारकर बैठ जाने का नहीं, अपने प्रतिरोध को व्यक्त करने का है !

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(एच.एल.दुसाध)

H.L Dusadh

मित्रों, समसामयिक मुद्दों पर सोशल मीडिया में जिस तरह वैविध्यपूर्ण टिप्पणियां आ रही हैं, दैनिक पत्रों के प्रति मेरा आकर्षण तो कमतर होते जा रहा है. इस मध्य गत एक माह से ‘डाइवर्सिटी डे’ के आयोजन में अतिरिक्त रूप से व्यस्त रहने के कारण बमुश्किल सरसरी नजरों से ही अख़बार देख पाया. कल  भी ऐसा ही किया. किन्तु दैनिक जागरण और जनसन्देश टाइम्स के सम्पादकीय पेज पर छपी तीन टिप्पणियों ने मुझे एकाधिक बार ध्यान से पढने के लिए विवश कर दिया. इनमे सबसे पहले ‘संघीय ढाँचे पर प्रहार’ शीर्षक से छपी दैनिक जागरण की सम्पादकीय ने चौकाया. भाजपा के मुखपत्र के रूप में पहचान बना चुके इस अखबार ने चन्द्रबाबू नायडू द्वारा केन्द्रीय जांच ब्यूरों के बाद प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को अपने राज्य में बिना इजाजत न आने देने को लेकर गहरी चिंता जाहिर करते हुए आशंका जाहिर की है कि विपक्षी दल मोदी के खिलाफ महा-मोर्चा बनाने के क्रम में अपने-अपने राज्यों में चन्द्रबाबू नायडू के कदम का अनुसरण कर सकते हैं, जिससे देश का संघीय ढांचा प्रभावित हो सकता है. दैनिक जागरण की यह आशंका सही साबित हो सकती है. किन्तु इससे लिए जिम्मेवार कौन है?  क्या संघ परिवार ही पूरी तरह जिम्मेवार नहीं है? निश्चय ही संघ प्रशिक्षित मोदी अपने पितृ-संगठन के कुत्सित इरादों को मूर्त रूप देने के लिए ढेरों ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिससे देश का सामाजिक ताना-बाना तो ध्वस्त हो ही चुका है, संघीय ढाँचे का प्रभावित होना भी अवधारित है.

अख़बार की सम्पादकीय के बगल में ‘सरकार और आरबीआई में सुलह की राह’ शीर्षक से डॉ. भारत झुंझुनवाला का लेख प्रकाशित हुआ था. संघ की आवाज के रूप में पहचान बना चुके झुनझुनवाला को मोदी सरकार की देश-विरोधी नीतियों ने इतना उद्वेलित किया है कि अब वह संघ के प्रति निष्ठां का परित्याग कर निष्पक्ष टिप्पणियां करने लगे हैं.इसी क्रम में मोदी सरकार लोकसभा चुनाव -2019 को ध्यान में रखते हुए  सीआरआर 6.5 प्रतिशत से घटाकर 5.5 प्रतिशत करने लिए रिजर्व बैंक पर जो दबाव बना रही है, उसके कुपरिणामो पर राष्ट्र को अवगत कराते हुए डॉ.झुनझुनवाला ने निष्कर्ष दिया है कि सरकार यदि अपने मंसूबों को पूरा में कामयाब हो जाती है तब बाजार में मुद्रा का चलन बढेगा जिससे महंगाई बढ़ेगी तथा रिजर्व बैंक के लिए अर्थव्यवस्था को सुरक्षा प्रदान करना मुश्किल हो जायेगा. यह लेख प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक को पढना चाहिए,जिससे वे सरकार के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए रिजर्व बैंक को नैतिक बल से पुष्ट कर सकें.

मित्रों, मोदी सरकार ने देश को जिस स्टेज पर पहुंचा दिया हैं, उसमें  हर नागरिक को एक वैसी बड़ी भूमिका में में आना जरुरी है, जिस भूमिका में युद्ध या अन्य आपाद कालीन स्थितियों में दूसरे देशों के जिम्मेवार नागरिक आ खड़े होते हैं. इस संकटजनक स्थिति में आपका और हमारा क्या रोल हो सकता है, इस पर प्राख्यात आलोचक अशोक वाजपेयी ने कल के जनसन्देश टाइम्स में ‘व्यापक लोकतान्त्रिक संघर्ष में शामिल हों’ शीर्षक से छपे अपने बेहतरीन लेख के जरिये प्रबुद्ध नागरिको को अनुकरणीय सन्देश दिया है. इस लेख में उन्होंने मोदी सरकार की लोकतंत्र-विरोधी नीतियों से विस्तार से अवगत करते हुए शेष में लिखा है-‘ यह समय खतरे की घंटी सुनने भर का नहीं है जो काफी देर से बज रही है. यह समय ऐसी घटनाओं को तथाकथित व्यापक परिप्रेक्ष्य में नजरंदाज करने का कतई नहीं है. यह समय मन मानकर बैठ जाने का भी नहीं है. यह समय प्रतिरोध को व्यक्त और व्यापक करने का है. यह समय स्वतंत्रता-समता-न्याय के संवैधानिक मूल्यों को बचाने,असहमति और प्रतिरोध की संस्कृति को लोकहित और लोकतंत्र के हित में सशक्त करने का है. यह समय एक नए अहिंसक सत्याग्रह का है जो लगातार हमारे ऊपर रोजाना लादे जा रहे झूठों का पर्दाफाश करे , सच्चाई सामने लाये. यह समय बुलंद निडर आवाज में ‘नहीं’ कहने का है. चुप की दहाड़ होती है, पर यह समय चुप रहने का नहीं है.यह समय साहस का है, कायरता और कल्पित सुरक्षा का नहीं, यह समय प्रबंधन का नहीं, मूल्यों की राजनीति पर इसरार का है. यह समय बुद्धि और ज्ञान के सहमकर दुबकने का नहीं, उद्धत रूप से अपनी बहुलता और स्थाई उर्जा के इजहार का है. यह समय धर्मों के प्रवक्ता ढोंगियों को, फिर वे पंडित हों या मौलवी, अस्वीकार करने और धर्मों को स्वयं अपने बुनियादी प्रेम-सद्भाव के अध्यात्म पर लौटने के आग्रह का है. यह समय है कि हिन्दू समझें कि उन्हें जिस कट्टरता –संकीर्णता –परघृणा में लगातार धकेला जा रहा है वह हिन्दू परम्परा से कत्तई मेल नहीं खाता. यह समय मुसलमानों को अपनी कट्टरता से बाहर आकर अपनी पूरी नागरिकता पर अधिकार करने का न्योता देने का है.

यह समय लेखकों– कलाकारों को अपने भेदभाव भूलाकर एक व्यापक लोकतान्त्रिक संघर्ष में शामिल होने के लिए आमंत्रण देने का है. यह समय गोदी मीडिया को यह जताने का है कि असहमति और प्रतिरोध की आवाजों के वैकल्पिक मंच है और सुदृढ़ हो रहे हैं. यह समय राजनीति को बताने का है कि उनकी  सर्वग्रासिता समाज-विरोधी है और अस्वीकार्य है.यह समय लुच्चो-लफंगों-हत्यारों आदि को आगाह करने का है कि उनके  साथ राज्य सख्ती से पेश आये तो नागरिक निर्भय होकर पेश आयेंगे. यह समय प्रश्न पूछने, जिज्ञासा करने, दूसरों के आदर करने, उन्हें ध्यान से सुनने, उनकी मदद करने ….’

मित्रों, आप खुद से सवाल करें लेखक अशोक वाजपेयी ने इस संकट काल में हर प्रबुद्ध व जिमेवार नागरिक तथा लेखक-कलाकारों के समक्ष जो आह्वान किया है, उस पर खरा उतरना क्या हमारा अत्याज्य कर्तव्य नहीं बनता ?मैं इस आपातकाल सरीखी स्थिति में विशेषकर बहुजन लेखकों को अपना कर्तव्य स्थिर करने की गुजारिश कर रहा हूँ. आज जबकि कांग्रेस अपने वर्गीय हित में और बहुजनवादी दल विविध कारणों से मोदी एंड कंपनी के खिलाफ वाजिब प्रतिरोध खड़ा करने में कोताही बरतते नजर आ रहे हैं, क्या हम बहुजन लेखकों का फर्ज नहीं बनता कि जिस मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों के कारण बहुजन समाज नए सिरे से गुलाम बनाने जा रहा है, उस मोदी सरकार के खिलाफ हद से गुजरने का मन बनायें!

(एच.एल.दुसाध)

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