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उदयपुर फिल्म फेस्टिवल का तीसरा दिन

उदयपुर, ‘कक्कूस’ देखने के बाद जब एक संवेदनशील दर्शक ने भावविव्हल होकर पूछा कि आखिर इन सफाईकर्मियों के ऐसे हालात के लिए जिम्मेदार कौन है तो फ़िल्मकार दिव्या भारती ने तत्क्षण उत्तर दिया, “आप और मैं दोनों.” ज्ञातव्य है कि दस्तावेजी फिल्म ‘कक्कूस’ हाथ से गंदगी साफ़ करने में जुटे श्रमिकों के हालात बयान करती है. ध्यान रहे कि 1983 से ही भारत में हाथ से विष्ठा,मेनहोल आदि की सफाई ( मैन्युअल स्कैवेंजिंग ) गैर कानूनी है. इसके बावजूद लाखों लोग सरकार,प्रशासन की जानकारी में यह काम करते हैं. उनके कार्य को थोडा और सुविधाजनक बनाने, उनके लिए जीवन रक्षा उपकरण प्रदान करने आदि के कोई कार्य नहीं किये जाते, अधिकाँश श्रमिक स्थाई नहीं हैं, ठेका प्रथा के तहत कार्य करते हैं और इसलिए किसी दुर्घटना या मौत की स्थिति में मुआवजा भी नहीं मिल पाता है. दिव्या ने कहा कि स्वच्छता अभियान के करोड़ों के बजट में एक छोटा हिस्सा भी इन सफाईकर्मियों के हालत सुधारने के लिए नहीं रखा गया.

फिल्म के बाद हुई परिचर्चा में  एआईसीसीटीयू  से जुड़े सौरभ नरूका ने प्रतापगढ़ के जफ़र खान की हत्या का पूरा केस बताते हुए कहा कि स्वच्छता अभियान के नाम पर फोटोग्राफी के जरिये गरीबों को शर्मसार करने का जो तरीका अपनाया गया उसका विरोध करने के कारण ही जफ़र की जान गयी. शिल्पकार भूपेश कावड़िया ने अपने अनुभव बताये. उन्हें दो साल पहले स्वच्छता के लिए लोगों को प्रेरित करने वाली एक कलाकृति बनाने पर धार्मिक भावनाएं भड़काने के जुर्म में आरोपी बना दिया गया था. परिचर्चा में भागीदारी करते हुए कई दर्शकों ने इस फिल्म के गहरे प्रभाव और इसके बाद एक शोक की अनुभूति को व्यक्त किया.

कल देर रात ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ की स्क्रीनिंग के बाद भी दर्शकों ने निर्देशक अविनाश दास के लिए सवालों की झड़ी लगा दी थी. कई दर्शकों ने इस फिल्म की ‘पिंक’ से तुलना करते हुए कहा कि जहाँ पिंक एक मध्यवर्गीय युवती के माध्यम से ना के महत्त्व को समझाती है वहां अनारकली उससे भी एक कदम आगे जाकर उस स्त्री की बात करती है जो बाज़ार में खडी है. कोई भी स्त्री, चाहे वह कैसा भी जीवन जिए, कोई भी पेशा अपनाए, उसकी हां के बिना उसे हाथ भी लगाना उसकी अस्मिता का हनन है. फिल्म निर्देशक अविनाश दास ने कहा कि अपने आप से सवाल करते रहना एक नागरिक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है और यही बेचैनी उन्हें अंततः फिल्म निर्माण की ओर ले गयी.

आज गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह का व्याख्यान प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने पिछले पचास साल में इन्सिफ़ेलाइटिस से देश भर में हुई मौतों के आंकड़े और अपनी दस साल के शोध से जुटाए तथ्यों के बलबूते यह स्थापित किया कि भारत में इन मौतों का मुख्य कारण बीमारी की विकरालता नहीं बल्कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी है. इसके पीछे मुख्यतः सार्वजनक स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सरकार और प्रशासन का लापरवाह रवैया और इसपर अपर्याप्त निवेश के कारण ही इस बीमारी ने एक महामारी का रूप धारण कर लिया.

आज सुबह ईरानियन निर्देशक जफ़र पनाही की फिल्म ‘ऑफ़साइड’ को भी दर्शकों ने बेहद पसंद किया. फिल्म कुछ दुस्साहसी लड़कियों की कहानी है जो स्टेडियम में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी के ईरानी क़ानून को धता बताते हुए भेस बदलकर वर्ल्ड कप मैच देखने घुस जाती हैं पर पकड़ी जाती हैं. आख़िरी फिल्म थी इस साल आयी चर्चित बांग्ला फ़ीचर फिल्म ‘धनंजय’ जो धनंजय चटर्जी के बहुचर्चित केस को नए साक्ष्यों की रोशनी में एक अलग तरह से देखती है और उसकी फांसी को एक त्रासदी के रूप में देखती है जो नहीं होनी चाहिए थी.

समापन समरोह में फेस्टिवल संयोजक मेघा चौधरी और रिंकू परिहार ने आमंत्रित फिल्मकारों, उपस्थित दर्शकों, कार्यकर्ताओं और शुभ्चितकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आप सबका सहयोग और संबल ही हमें हमेशा प्रेरणा देता है. उन्होंने मासिक संध्याओं से जुड़ने और सोसाइटी की गतिविधियों से जुड़ने का सभी से आह्वान किया. अगले साल फिर मिलने के वायदे के साथ तीन दिनी समारोह संपन्न हुआ.

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