आरक्षित वर्ग के खिलाफ भयंकर साज़िश हो रही है !

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( राजाराम मील )

हाल ही में एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दिनांक 28 मई 2018 और 29 मई 2018 को दो फैसले दिये गये।

आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 के मामले में आरपीएससी द्वारा हर वर्ग के 15 गुना अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिये बुलाया गया था ,जिसमें सामान्य वर्ग की कट आॅफ 250 तथा ओबीसी की कट आॅफ 283 रही थी।

इसी तरह पटवारी भर्ती परीक्षा 2015 में भी सामान्य वर्ग की कट आॅफ 104, एससी की 123, एसटी की 112 एवं ओबीसी की 148 अंक रही थी।

आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 में राजस्थान हाईकोर्ट डीबी बैंच द्वारा आरक्षित एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के पक्ष में फैसला दिया था तथा पटवारी भर्ती परीक्षा 2016 का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा था, उस समय आरएएस भर्ती परीक्षा 2013 के अभ्यर्थी भी उसी रीट याचिका में अपना पक्ष रखा था।

तत्पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड दोनों को तलब किया था और दोनों संस्थाओं ने यह मान लिया था कि दोनों ही भर्ती परीक्षाओं में सामान्य वर्ग की कट आॅफ अंक तक के अभ्यर्थियों को बुलाया जायेगा और आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड ने सामान्य वर्ग की कट आॅफ अंक तक के अभ्यर्थियों को बुलाया भी गया था। दोनों ही भर्ती परीक्षाओं के अभ्यर्थी नौकरी कर रहे है।

यहां पर मैं यह भी उल्लेख करना चाहता हूं कि सामान्य वर्ग का मतलब मैरिट होता है। कुछ लोग सामान्य वर्ग को एससी, एसटी, ओबीसी की तरह का वर्ग मान रहे है अगर यह वर्ग होता तो इसका मतलब यह हुआ कि सामान्य वर्ग को 50 प्रतिशत आरक्षण है जिनकी जनसंख्या मात्र 15 प्रतिशत है ,लेकिन यह वर्ग नही है सामान्य वर्ग में 50 प्रतिशत उन अभ्यर्थियों को लिया जाता है जो मैरिट में आते है उसमें सभी वर्गों के अभ्यर्थी होते है जो मैरिट में है।

उसके बाद 50 प्रतिशत आरक्षित वर्ग (एससी, एसटी एवं ओबीसी) से रिक्तियां भरी जाती है। लेकिन आरपीएससी एवं अधीनस्थ बोर्ड उल्टा कर रही है और राजस्थान हाईकोर्ट भी उनके एवं समता मंच के हिसाब से फैसला दे रहे है।

यूपीएससी भर्ती परीक्षा में ऐसी धांधली कभी भी नही होती है वहां पर हर भर्ती आरक्षण नियमों से होती है इसलिये कोई भी भर्ती कोर्ट में नही जाती। लेकिन राजस्थान में पिछले 20 साल से तो मैं स्वयं देख रहा हूं कि कोई भर्ती हो सभी आरक्षित वर्ग के खिलाफ नियम बनाये जाते है और हर भर्ती कोर्ट में जाती है और अंत तक सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उक्त डाईरेक्शन एवं राजस्थान हाईकोर्ट के डीबी बैंच के फैसले के बाद भी राजस्थान हाईकोर्ट ने समता मंच के साथ मिलकर संविधान और सुप्रीम कोर्ट की डाईरेक्शन के विरूद्ध एवं एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के खिलाफ उक्त दोनों फैसले किये है।

इसका मतलब यह हुआ कि राजस्थान हाईकोर्ट सर्वोच्च न्यायालय से भी बड़ा है और समता मंच की दायर की गई याचिकाओं पर जल्दबाजी में फैसले दे देते है ,फैसले भी ऐसे समय में देते है जब वकील भी हड़ताल पर रहते है ,ताकि सही तथ्य कोर्ट में पेश नही कर सके। इससे यह जाहिर होता है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी (आरक्षित वर्ग) के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट एवं उच्च वर्ग हाथ धोकर पीछे पड़ा हुआ है।

समता मंच तो यह चाहता है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के लोग सरकारी नौकरी ही नही करे और जो अभ्यर्थी सरकारी नौकरी कर रहे है उन्हें कोर्ट में झूठे तथ्य पेश कर ऐसे फैसले करवा लेते है कि उन्हें भी हटाना पड़ेगा।

ऐसा लगता है कि संवैधानिक संस्थाऐं एससी, एसटी एवं ओबीसी वर्ग के लोगों पर अत्याचार करने के लिये बनाई गई है और जो भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी नौकरी लगे हुये है उन्हें हटाने का काम कर रही है।

राजस्थान सरकार भी हाईकोर्ट द्वारा दिये जा रहे फैसलों को आंख मूंदकर देख रही है जिसका परिणाम सरकार को भी भुगतना पड़ेगा। एससी, एसटी एवं ओबीसी में हाईकोर्ट के उक्त दोनों फैसलों के खिलाफ भंयकर रोष है आने वाले दिनों में इसका साफ असर दिखेगा।

(लेखक जाट महासभा राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष है )

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