किसानों, मजदूरों, दलितों और आदिवासियों के लिए धोखे और उपेक्षा वाला बजट है !

- मुकेश निर्वासित

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राजस्थान के आज के बजट में केवल सहकारी बैंकों के द्वारा जो ऋण किसानों को अल्पकालीन ऋण जाता है उसी को माफ़ करने की घोषणा की गई है जबकि किसानों के द्वारा किसान क्रेडिट कार्ड द्वारा जो ऋण लिया जाता है वह अधिकतम क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और कमर्शियल बैंक से ही लिया जाता है। सहकारी बैंक राजस्थान में केवल 19 प्रतिशत किसानों तक ही पहुँच रखते हैं। इसलिए किसानों के साथ कर्जमाफ़ी के नाम पर धोखा किया गया है। किसानों के लिए जो 2 लाख कृषि कनेक्शन की घोषणा की गई है वह पूरी नहीं होने वाली है,क्योंकि पिछले वर्ष एक लाख कृषि कनेक्शन दिए जाने की घोषणा की थी जिसमें से अभी तक 30 हजार कृषि कनेक्शन दिये गए हैं.इससे लगता है कि यह घोषणा अगले वर्ष पूरी ही नहीं की जा सकती हैं।

दूसरा सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण विकास है जिसमें सामाजिक सुरक्षा पेंशन में किसी प्रकार की कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है और पिछले बजट घोषणा में जो विधवा महिलाओं के लिए जिनकी उम्र 60 वर्ष से 74 है के लिए 1000 रुपये प्रति माह एवं जिनकी उम्र 75 या उससे अधिक है को 1500 रुपये प्रति किये जाने की घोषणा की थी,वह भी पूरी तरह से अभी लागू नहीं हुई है। विधवा महिलाएं अपनी पेंशन राशि बढवाने के लिए कागज हाथ में लिए अभी भी पंचायत समिति कार्यालयों में मिल जाती हैं। विकलांग संघर्ष समिति 2016 के साथ किये गए समझौते के वादों को भी इस बजट में पूरा नहीं किया गया जो विकलांग साथियों के साथ बड़ा धोखा है.

ग्रामीण विकास के लिए मुख्यमंत्री महोदया ने 30 सेकंड से अधिक बोलना उचित नहीं समझा जहाँ पर राज्य की 68 प्रतिशत आबादी रहती है। ग्रामीण विकास में केवल स्वच्छ भारत अभियान और खुले में शौच मुक्त पंचायतों के बारे में ही बात की गई,कोई घोषणा नहीं की गई है। यह इस बात का द्योतक है कि राज्य सरकार ग्रामीण विकास को लेकर पूरी तरीके से उदासीन है।

जहाँ पर आँगनबाड़ियों में आँगनबाड़ी कार्यकर्त्ता, सहायिका, आशा और साथिन के मानदेय की बात है,बढाया जाना स्वागत योग्य कदम है,लेकिन अभी भी उनको न्यूनतम मजदूरी नहीं दिया जाना यह इशारा करता है कि सरकार महिलाओं से बंधुआ मजदूरी करवा रही है क्योंकि किसी भी कर्मचारी को कम से कम न्यूनतम मजदूरी ना दिए जाना बंधुआ मजदूरी की श्रेणी में आता है। इसी प्रकार राज्य के 60 हजार से अधिक विद्यालयों में एक लाख से अधिक महिला कुकों को महीने का केवल एक हजार रुपये ही दिया जाता है जो उनका पूरी तरह से शोषण है उन्हें भी कम से न्यूनतम मजदूरी दिया जाना चाहिए।

बजट में सरकारी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को 2 वर्ष की चाइल्ड केयर लीव देने की घोषणा की गई है जो अच्छा कदम है परन्तु राजस्थान में 93 प्रतिशत जो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं हैं उनके बारे में जिक्र तक नहीं किया गया है और उन्हीं को सबसे अधिक चाइल्ड केयर लीव की आवश्यकता होती है,क्योंकि प्रसव के कुछ दिन बाद ही वे मजदूरी पर नहीं जाएँ तो उनका परिवार नहीं चलता है इसलिए असंगठित क्षेत्र की मजदूर महिलाओं को चाइल्ड केयर लीव नहीं देकर उनके साथ बड़ा अन्याय किया गया है।

इसी प्रकार जो 1 लाख 8 हजार सरकार के विभिन्न विभागों में भर्ती की घोषणा की गई है वह भी महज एक घोषणा ही है,क्योंकि पिछले 4 साल में राज्य सरकार केवल 66 हजार भर्तियाँ ही कर पाई है जो सरकार अगले एक साल में इतनी भर्तियाँ कैसे कर पायेगी? इस बजट में राज्य कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग का एरियर दिया जायेगा लेकिन मजदूरों के लिए आज तक कोई मजदूरी आयोग नहीं बनाया और ना ही राजस्थान के मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी में कोई बढ़ोतरी की गई है।

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों के अस्पताल चाहे वे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हों या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या उपस्वास्थ्य केंद्र सभी जगहों पर बड़ी तादाद में पद खाली हैं, यहाँ तक कि राजस्थान में 40 प्रतिशत स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स के पद खाली हैं, जिसका कोई जिक्र तक बजट भाषण में नहीं किया गया है।

यह बजट दलितों, वंचितों और गरीबों को रोज़गार दिए जाने पर बिलकुल मौन है और जिस प्रकार राजस्थान दलित अत्याचार में पूरे देश में अव्वल रहा हैं और महिला अत्याचारों के मामले में तीसरे स्थान पर उसको कम किये जाने के लिए राज्य सरकार की कोई योजना नजर नहीं आती है.इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह बजट महज घोषणाओं का बजट है इससे गरीबों, वंचितों दलितों, आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कोई अधिक फर्क नहीं पड़ने वाला है.

( लेखक सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान, राजस्थान के साथ कार्यरत हैं )

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